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पुराने जूते-चप्पल को नया लुक देकर गरीबों की मदद कर रहे हैं ये दो युवा

1st Sep 2017
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बेकार जूते चप्पलों को फिर से नया लुक देकर ऑनलाइन बेचने का स्टार्टअप शुरू किया है श्रीयंस और रमेश ने। उनकी कंपनी का नाम है 'ग्रीनसोल'

श्रीयंस और रमेश धामी

श्रीयंस और रमेश धामी


ग्रीनसोल एक ऐसा स्टार्टअप जो अब तक 25,000 से अधिक पुराने जूते-चप्पलों की मरम्म्त कर महाराष्ट्र और गुजरात के जरुरतमंदों तक पहुंचाने का नेक काम कर चुका है।

एक आंकड़े के मुताबिक उदेशभर में लगभग 35 करोड़ जूते-चप्पल ऐसे हैं, जो प्लास्टिक या अन्य किसी मटीरियल से बने होते हैं और इनसे पर्यावरण को भारी मात्रा में क्षति पहुंचती है।

जब आपके महंगे और ब्रांडेड जूते-चप्पल घिस कर पुराने हो जाते हैं तब आप उनका क्या करते हैं? या तो आप उसे फेंक देते होंगे या फिर किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दे देते होंगे? इन्हीं बेकार जूते चप्पलों को फिर से नया लुक देकर ऑनलाइन बेचने का स्टार्टअप शुरू किया है श्रीयंस भंडारी और रमेश ने। उनकी कंपनी का नाम है 'ग्रीनसोल'। इन्होंने वर्ष 2014 में अपनी कंपनी की शुरुआत की थी। ग्रीनसोल ने अब तक 25,000 से अधिक पुराने जूते-चप्पलों की मरम्मत कर महाराष्ट्र और गुजरात के जरुरतमंदों तक पहुचाने का कार्य किया है।

इनकी पहल से प्रभावित होकर लोगों ने भारी मात्रा में बेकार और रद्दी जूते-चप्पलों को दान किया। जिसके लिए एक्सिस बैंक, इंडियाबुल्स, टाटा पॉवर और DTDC जैसे बड़े-बड़े कॉर्पोरेट्स ने उनकी मदद की और प्रत्येक जोड़े के लिए 200 रूपये का भुगतान भी किया। ग्रीन्सोल के सीईओ और को-फाउंडर श्रीयंस ने कहा कि उनके प्रमोटर्स अपने काम को ले कर काफी उत्सुक हैं और वे चप्पलों को 500 से 1500 रुपये के बीच खरीद कर उसे 10 से 20 प्रतिशत प्रॉफिट के साथ मार्केट में बेच देते हैं। श्रीयंस रद्दी हो चुके जूतों को नया लुक देकर फिर से उपयोग में लाकर हमारे पर्यावरण को प्रदूषित होने से भी बचाने का काम कर रहे हैं।

गरीब परिवार के साथ रमेश और श्रीयंस

गरीब परिवार के साथ रमेश और श्रीयंस


श्रीयंस और रमेश के मन में जब गैरज़रूरी जूतों को नया लुक देकर काम में लाने का आईडिया आया, तो उन्होंने इसके लिए सबसे पहले जूते बनाने वाली फैक्ट्रियों में जाकर जूतों की मरम्मत का काम देखा और उसे सीखने की कोशिश की।

श्रीयंस राजस्थान के उदयपुर से आते हैं वहीं रमेश उत्तराखंड के गढ़वाल के रहने वाले हैं। रमेश 12 साल की उम्र में अपना गांव छोड़कर मुंबई चले आए थे। दोनों की मुलाकात एक ट्रेनिंग के दौरान मुंबई के प्रियदर्शिनी पार्क में हुई थी। दोनों के मन में खराब पड़े जूतों को फिर से नये लुक में कर के बेचने का आइडिया आया था। इसके लिए दोनों ने जूते की फैक्ट्रियों में जाकर जूता-चप्पल मरम्मत करने का काम देखा और सीखने की भी कोशिश की। एक आंकड़े के मुताबिक उन्हें मालूम चला कि देशभर में लगभग 35 करोड़ जूते-चप्पल ऐसे हैं जो प्लास्टिक या अन्य किसी मटीरियल से बने हैं, जिनसे पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचती है।

दूसरी तरफ उन्होंने देखा कि देश में न जाने कितने लोग ऐसे हैं जो पैसों के आभाव में बिना जूता-चप्पल न पहनकर नंगे पांव चलने को मजबूर हैं। इन दोनों ने काफी सोचने और विचार करने के बाद इस स्टार्टअप को शुरू किया और 'ग्रीनसोल' नाम की एक कंपनी बनाई। सबसे पहले उन्होंने मुंबई में जगह-जगह लोगों को खराब जूते-चप्पल दान करने के लिए ड्रॉप बॉक्स स्थापित किए और बाद में कोरियर से भी उन्हें मंगवाना शुरू किया।

आज की तारीख में श्रीयंस और रमेश का ग्रीनसोल नाम का ये बिज़नेस चल निकला है। दोनों अपने सपने को साकार करने में लगे हुए हैं और इस काम से काफी खुश भी हैं। दोनों की कोशिश है कि हर जरूरतमंद इंसान के पैर में जूते-चप्पल तो होने ही चाहिए। देखा जाए तो गरीबों की मदद करने के साथ ही पर्यावरण बचाने का भी काम कर रहे हैं श्रीयंस और रमेश और यह एक बेहतरीन पहल है। देश के बाकी लोग भी यदि इसी तरह सोचना शुरू कर दें, तो कोई नंगे पांव नहीं रहेगा।

यह भी पढ़ें: पीसीओ बूथ को आर्ट गैलरी में बदल देने वाले सुरेश शंकर

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