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शिमला के ज़रूरतमंद लोगों की जी-जान से सेवा करने वाले बॉबी भाई

शिमला का ‘वेल्ला’ सरबजीत सिंह बॉबी...

28th Mar 2018
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शिमला की सड़कों पर यदि कोई शख़्स नि:स्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करता हुआ दिख जाये, तो आप समझ जाईयेगा, कि ये सरबजीत हैं।40 वर्षीय सरबजीत को शिमला के लोग प्यार से बॉबी भाई बुलाते हैं। शिमला की ये हंसमुख और जिंदादिल शख़्स पिछले 11 सालों से शिमला में रहने वाले लोगों के दिलों में अपनी एक खास जगह बना चुके हैं।

सरबजीत सिंह बॉबी

सरबजीत सिंह बॉबी


आज बॉबी भाई "Almighty's Blessings" नामक संस्था के साथ मिलकर अनगिनत जीवन को एक आश्रय प्रदान कर रहे हैं। वो शिमला के कैंसर अस्पताल में भी नि:स्वार्थ भाव से रोगियों की सेवा करते रहते हैं और साथ ही लोगों के लिये रक्तदान शिविर का आयोजन भी करते रहते हैं।

जब लोग ठण्ड के मौसम में रजाई ओढ़े हुए सुबह न होने का इंतज़ार कर रहे होते तब वहीं शिमला का एक शख्स वहां के कैंसर अस्पताल में बीमार लोगों को चाय और बिस्कुट खिला रहा होता है। जब लोग शिमला में दिल को खुश कर देने वाली बर्फ़बारी का आनंद ले रहे होते हैं उस वक्त एक शख्स मृत लोगों के शरीर को शमशान तक ले जा रहा होता है। जब सब शाम के वक्त शिमला की खूबसूरती का लुफ्त ले रहे होते तब एक शख्स शिमला के गुरूद्वारे में भूख से विचलित लोगों को लंगर का प्रसादा चखा रहा होता। ये शख़्स कोई और नहीं शिमला के सबसे बड़े वेल्ले सरदार सरबजीत सिंह बॉबी हैं। 

शिमला की सड़कों पर यदि कोई शख़्स नि:स्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करता हुआ दिख जाये, तो आप समझ जाईयेगा, कि ये सरबजीत हैं।40 वर्षीय सरबजीत को शिमला के लोग प्यार से बॉबी भाई बुलाते हैं। शिमला की ये हंसमुख और जिंदादिल शख़्स पिछले 11 सालों से शिमला में रहने वाले लोगों के दिलों में अपनी एक खास जगह बना चुके हैं।

सरबजीत अपनी वैन के साथ

सरबजीत अपनी वैन के साथ


जिस उम्र में अधिकतर लोग अपने और अपने परिवार के लिए खुशियां सहेजने में व्यस्त होते हैं, उस उम्र में बॉबी भाई अपने परिवार के लिये ही नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिये काम कर रहे हैं। पिछले 11 सालों से 24 X 7 किसी भी मृत की अंतिम यात्रा में शमिल होने को तैयार रहते हैं। बॉबी भाई को वैन चलाने का विचार उस वक्त पर आया जब सरकारी अस्पतालों में ऐसी सेवाओं की भारी मात्रा में कमी थी। आज बॉबी भाई "Almighty's Blessings" नामक संस्था के साथ मिलकर अनगिनत जीवन को एक आश्रय प्रदान कर रहे हैं। वो शिमला के कैंसर अस्पताल में भी नि:स्वार्थ भाव से रोगियों की सेवा करते रहते हैं और साथ ही लोगों के लिये रक्तदान शिविर का आयोजन भी करते रहते हैं।

बॉबी भाई के लिए सेवा ही सब कुछ है। उनसे पूछा गया कि आपकी जीविका का साधन क्या है ? तो वह कहते हैं, "मेरा जूते का व्यवसाय मेरे और मेरे परिवार के लिए पर्याप्त है, जो कि मेरे परोपकारी कार्यों के लिए समर्थन का एक आधार है।" 

बॉबी भाई की एक योजना के अनुसार शिमला के कैंसर अस्पताल में सुबह मुफ्त चाय बिस्किट और शाम को दाल चावल खाने के लिए दिया जाता है। यह सेवा रोगियों और विशेष रूप से गरीबों को बहुत राहत प्रदान करती है, जो इलाज की लागत में पहले ही फंस गए हैं। सरबजीत का कहना है कि "मुझे रोगियों और उन गरीब लोगों को देखकर हमेशा ही दुःख होता है, जिनके पास दो वक्त के भोजन के लिए पैसे नहीं होते हैं।"

सरबजीत के शब्दों में "गरीब का मुँह, भगवान का गुल्लक है।"

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