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बेटे के सपने को पूरा कर रही है उसकी मां

Geeta Bisht
15th May 2016
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एक बेटे ने सपना देखा था दूसरों को पढ़ाकर बड़ा करने का, वो बेटा ऐसा कर पाता उससे पहले ही वो दुनिया छोड़ गया। लेकिन वो सपना आज तक जिंदा है और अब उसे पूरा करने की जिम्मेदारी उठाई है उसकी मां ने। जो लगातार 8 साल से गरीब और कमजोर बच्चों को पढ़ाने का काम कर रही है। ताकि वो बच्चे उस ऊचांई तक पहुंच सकें जिसका सपना उनके बेटे ने देखा था। पश्चिम बंगाल की रहने वाली निप्रा मजूमदार जो दिल्ली से सटे वैशाली में रहती हैं वो अब तक आठ सौ से ज्यादा बच्चों को पढ़ा चुकी हैं। फिलहाल वो 70 बच्चों को ‘समृद्धि’ संगठन पढ़ाने का काम कर रही हैं। निप्रा के इस काम में मदद करते हैं कई रिटार्यड जज, एलआईसी अफसर, इनकम टैक्स अफसर, डॉक्टर और रिटार्यड इंजीनियर जैसे लोग।

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करीब 13 साल तक शिक्षा विभाग में सब इंसपेक्टर ऑफ स्कूल की पोस्ट में काम करने वाली निप्रा मजूमदार बताती हैं कि उनका बेटा संदीप जब 5 साल का था तो उसे ब्लड कैंसर हो गया। इसलिए वो उसे इलाज के लिए कोलकाता से दिल्ली ले आई। अस्पताल ले जाते समय जब संदीप अक्सर रास्ते में गरीब बच्चों को काम करते हुए देखता तो वो उनकी हालत देखकर बोलता कि “जब मैं बड़ा होउंगा तो इन बच्चों को पढ़ा लिखा कर इन्हें डॉक्टर, इंजीनियर बनाउंगा।” लेकिन 13 साल की उम्र में साल 1995 में वो इस दुनिया को छोड़ कर चला गया। बेटे के इस तरह चले जाने के बाद निप्रा ने साल 2008 में ‘संदीपन म्यूजिकल एंड एजूकेशन सोसीइटी’ की स्थापना की। इसके माध्यम से वो बच्चों को संगीत सिखातीं हैं। वहीं साल 2009 में उन्होने अपने बेटे की इच्छा को पूरा करने का फैसला किया। इसकी शुरूआत उन्होने वैशाली के चित्रगुप्त पार्क से शुरू की। इसके लिए उन्होने आसपास की झुग्गियों में रहने वालों 4-5 बच्चों को लिया। उनके इस नेक काम के साथ धीरे धीरे और लोग भी जुड़ने लगे। तब “रोटरी क्लब ऑफ डेल्ही आकाश” भी उनकी मदद को आगे आया और उनकी मदद से वो किराये के एक मकान में बच्चों को पढ़ाने का काम करने लगीं। जिस जगह वो बच्चों को पढ़ाने का काम करती थी उस जगह को उन्होने नाम दिया ‘समृद्धी’ ये संदीपन म्यूजिकल एंड एजूकेशन सोसाइटी की अन्तर्गत ही काम करता है। शुरूआत में इनके पास 25 बच्चे थे जो आज बढ़कर 70 हो गये हैं। हालांकि ये 8सौ से ज्यादा बच्चों को पढ़लिख कर काबिल बना चुकी हैं।

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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं अभियान से प्रेरित होने के कारण इनके पास 80 प्रतिशत लड़कियां हैं। इनका स्कूल कक्षा 1 से कक्षा 5 तक का है और ये सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक चलता है। 9 से 10 बजे तक बच्चों को कई तरह की एक्टिविटी कराई जातीं हैं उसके बाद इनकी कक्षाएं चलतीं हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिये निप्रा ने 7 टीचर रखे हैं। कक्षा 5 तक की पढ़ाई पूरी करने वाले ये उन बच्चों का दाखिला पास के सरकारी स्कूलों में कर देती हैं। इन बच्चों का खर्च उठाने के लिए वो सोशल मीडिया और अपनी वैबसाइट के माध्यम से लोगों से गुजारिश करती हैं कि वो इन बच्चों को गोद लेकर इनका स्कूल का खर्चा उठाएं। अभी तक इन्हें 7 डोनर मिले हैं जो कि छठी और 7 वीं के बच्चों का खर्चा उठा रहे हैं। निप्रा बताती हैं कि समृद्धी स्कूल में सीबीएससी पैर्टन से पढाई कराई जाती हैं। दूसरे स्कूलों की तरह यहां भी साल में 4 सेमेस्टर होते हैं। इन बच्चों को वो स्कूल की ड्रेस, किताबें, स्टेशनरी, जूते, लंच बांक्स, वाटर बोतल देती हैं। साथ ही ये इन बच्चों को दिन का खाना भी देती हैं। इसके अलावा वो हर महीने बच्चों के अभिभावकों के साथ पीटीएम करती हैं। जिससे की उनके माता पिता को लगे कि उनके बच्चे भी अच्छे स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे बच्चों के 95 प्रतिशत माता पिता इस मीटिंग में उपस्थित होते हैं। इन बच्चों के अधिकतर माता पिता पढ़े लिखे नहीं होते इसलिए इन बच्चों के बर्थ सार्टिफिकेट भी नहीं होता है। ऐसे में इन बच्चों के इस तरह की कागजी कार्रवाई का काम भी निप्रा खुद ही संभालती हैं।

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निप्रा अपने स्कूल में हर शनिवार और रविवार को वोकेशनल ट्रेनिंग देने का भी काम करती हैं। इसमें इनके स्कूल की लड़कियों के अलावा और दूसरी महिलाएं भी यहां पर सिलाई कढ़ाई का काम सिखतीं हैं। अपनी परेशानियों के बारे में इनका कहना है कि इनके सामने सबसे ज्यादा समस्या फंडिग की है। इस कारण ये अपने स्टाफ को बहुत कम सैलरी दे पातीं हैं जबकि यहां पर पढ़ाने वाली टीचरें एमए, बीएड हैं। वो कहती हैं कि एक बच्चे पर महीने भर का पंद्रह सौ रुपये खर्च आता है जिसे वो बहुत मुश्किल से पूरा कर पाती हैं। कई बार तो उन्हें अपने संदीपन म्जूजिकल स्कूल के पैसे लेकर काम चलाना पड़ता है। वो कहती हैं कि अगर इन्हें फंडिग मिल जाये तो उनकी कोशिश है कि वो खुद की इमारत में ऐसे बच्चों के लिए स्कूल चलाएं। जहां पर वो 200 से ज्यादा बच्चों को पढ़ा सकें क्योंकि गाजियाबाद में बहुत से स्लम इलाके हैं जहां के बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पाते हैं।

वेबसाइट : www.samriddhischool.org

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