"पीपल ट्री" के तले संवर रहे हैं कई ग्रामीण युवाओं के सपने

By Ashutosh khantwal
March 26, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
"पीपल ट्री" के तले संवर रहे हैं कई ग्रामीण युवाओं के सपने
एक आईटी प्रोफेशनल ने नौकरी छोड़कर बनाई "पीपल ट्री"गरीब और कम पढ़े-लिखे युवाओं की मदद और मार्ग-दर्शन करती है ये संस्था "पीपल ट्री" दे रही है गरीब युवाओं को निर्माण क्षेत्र में बेहतर ट्रेनिंगबीस हजार से ज्यादा छात्र पा चुके हैं प्रशिक्षण
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भारत एक विकासशील देश है। पिछले 15-20 वर्षों में यह विकास कार्य बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। शहरों में जहां नए नए हाउसिंग प्रोजेक्ट, मॉल्स व ऑफिस के लिए आधुनिक इमारतों का निर्माण हो रहा है, वहीं गांव देहातों तक भी पक्की सड़कों का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। यही वजह है कि बुनियादी ढांचा और निर्माण क्षेत्र में कुशल कारीगरों की भारी मांग है। एक अनुमान के मुताबिक आने वाले दस वर्षों में करीब पचास लाख श्रमिकों की आवश्यकता होगी और इतनी बड़ी संख्या में हमारे पास श्रमिक नहीं हैं। हालांकि बहुत से छात्रों को पढ़ लिख जाने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती लेकिन इसके बावजूद भी कम छात्र ही इस क्षेत्र की तरफ अपना रुख करते हैं। जिसका मुख्य कारण है इस उद्योग की प्रकृति और स्वभाव। इसी जरूरत को पूरा करने और गांव के युवाओं को एक सुनहरा भविष्य प्रदान करने का प्रयास किया है संतोष पारुलेकर ने।

संतोष ने अपने कैरियर की शुरुआत एक सफल आईटी प्रोफेशनल के तौर पर की लेकिन उन्होंने नौकरी छोड़कर गरीब परिवारों के कम पढ़े-लिखे लोगों को रोज़गार दिलाने के लिए प्रयास करने लगे। उन्होंने पीपल ट्री की नींव रखी। आज पीपल ट्री निर्माण क्षेत्र में कई युवाओं को प्रशिक्षण दे रहा है।

संतोष पारुलेकर का जन्म और पालन पोषण मुंबई में हुआ। उन्होंने बीजेआईटी मुंबई से इंजीनियरिंग की और बाद में टाटा कंपनी में नौकरी की। नौकरी के दौरान उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन करने की सोची और कंप्यूटर साइंस में स्नातकोत्तर किया। उसके बाद फिर उन्होंने सिटी कॉर्प में काम किया जहां कुछ समय बाद उन्हें विदेश भेज दिया गया। छह साल बाद संतोष ने थिंक सिस्टम नाम की कंपनी ज्वाइन की, जहां बहुत कम समय में संतोष ने कंपनी के दो सौ से अधिक ग्राहक बनाए। यह संतोष की एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। नौकरी के दौरान ही संतोष मैनेजमेंट का हिस्सा भी बन गए। यहां नौकरी के दौरान ही उन्होंने एमबीए भी किया और तुरंत एसकेएस नाम के माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूट से जुड़ गए। यहां संतोष को माइक्रोफाइनेंस के कारोबार को फैलाना था। उन्होंने तय किया की वे सबसे पहले इस कारोबार को अच्छी तरह समझेंगे। इसके लिए उन्होंने आंध्र प्रदेश की यात्रा की और जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़े। उन्होंने कुछ समय गांव में भी बिताया। 

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संतोष भारत के युवा वर्ग को साथ लेकर कुछ करना चाहते थे, जिससे उन्हें कमाई का साधन मिल सके। यह वह दौर था जब माइक्रोफाइनेंस का विस्तार हो रहा था। रिलायंस और भारती जैसी बड़ी कंपनियां भी इस कारोबार में उतर चुकी थीं। संतोष एमएफआई की कार्यप्रणाली से नाखुश थे। उन्होंने पाया कि माइक्रोफाइनेंस कंपनी बेरोजगार लड़कों के हितों के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठा रही है और युवकों को लोन देने हेतु भरोसेमंद नहीं माना जा रहा है। तब संतोष ने तय किया कि अब वे कुछ ऐसा काम करेंगे जिससे कम पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं को पैसा कमाने का मौका मिल सके। इस प्रकार संतोष ने अपने दो मित्रों शैलेन्द्र और विक्रम के साथ पीपल ट्री की शुरुआत की। संतोष ने तय किया कि वह पीपल ट्री में युवाओं को नौकरी के लिए प्रशिक्षित करेंगे ताकि युवाओं को अलग-अलग कंपनी में आसानी से नौकरी मिल सके। लेकिन ट्रेनिंग किस क्षेत्र में दी जाए, इसके लिए उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में नजर रखनी शुरू कर दी। अनुसंधान के बाद यह तय किया गया कि युवाओं को निर्माण क्षेत्र के लिए तैयार किया जाना चाहिए। इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। गांव के लड़के आसानी से काम कर सकते हैं। बस जरूरत है सही दिशा और प्रशिक्षण की।

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संतोष और उनके दोनों साझेदारों ने 50-50 लाख रुपयों का निवेश किया दो स्ट्रेटर्जिक इंवेस्टर और एक वेंचर कैपिटिलिस्ट ने बाकी का पैसा लगाया। इस तरह नवंबर 2007 में 8 करोड़ रुपये के फंड के साथ पीपल ट्री का पंजीकरण हुआ। हैदराबाद में 25 एकड़ जमीन पर इसका कैंपस तैयार किया गया और पीपल ट्री में युवाओं ने ट्रेनिंग लेनी शुरू की। एक समय में लगभग 200 लड़कों को प्रशिक्षित किया जाने लगा। पीपल ट्री ने ऑस्ट्रेलिया की एक कंपनी टीएफई के साथ भी करार किया। कंपनी के लोग पीपल ट्री में आकर युवाओं को प्रशिक्षण देते हैं। पीपल ट्री में छात्रों को निर्माण उद्योग के कौशल के लिए एक हफ्ते का आवासीय प्रशिक्षण दिया जाता है इसके बाद छात्रों को पीटीवीपीएल टीमें के साथ 6 महीने की अवधि के लिए निर्माण स्थलों पर तैनात किया जाता है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें स्थायी नौकरी दी जाती है। दो साल के कार्य अनुभव के बाद इन छात्रों के समूह बनाए जाते हैं और लाभ में साझेदारी के आधार पर छोटे सिविल ठेके दिए जाते हैं।

पीपल ट्री अब तक 20 हजार से ज्यादा छात्रों को प्रशिक्षण दे चुका है आज देश भर में पीपल ट्री के 27 ट्रेनिंग सेंटर खुल चुके हैं यहां शुरुआती वेतन के रूप में लड़कों को 7,600- 10,000 रुपए तक मिलते हैं। यानी ट्रेनिंग के दौरान ही छात्र कमाना शुरू कर देते हैं। प्रशिक्षण के बाद लगभग सभी छात्रों को नौकरी मिल जाती है।

संतोष का सोशल एंटरप्राइज आज कम पढ़े लिखे ग्रामीण युवाओं के लिए एक वरदान है क्योंकि पीपल ट्री में ट्रेनिंग लेकर वह सफल कंस्ट्रक्शन वर्कर बन रहे हैं। हमारे देश में जहां इतनी असमानता है वहां एक व्यक्ति अपने कठोर परिश्रम और विजन के साथ आगे बढ़ रहा है जो कि अपने आप में एक मिसाल है।

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