संस्करणों

हर बच्चा पढ़ेगा, तभी तो जयति 'जय' बनेगा इंडिया

Ashutosh khantwal
29th Jun 2015
Add to
Shares
1
Comments
Share This
Add to
Shares
1
Comments
Share

गरीब परिवार से उठकर गरीब बच्चों के लिए काम कर रहे हैं जय मिश्रा...

अपने पिता को अपना आदर्श मानते हैं जय मिश्रा...

360 से ज्यादा बच्चों से जुड़कर उन्हें शिक्षित कर रहे हैं जय...


जय मिश्रा ने जिंदगी के शुरुआती 16 साल बहुत ज्यादा गरीबी में काटे। इस दौरान वे झोपड़ी में रहे। जय का परिवार इतना गरीब था कि जिंदगी की मूलभूत जरूरतें जैसे खाना-पीना, कपड़े व छत तक उन्हें ठीक से नसीब नहीं हो पा रही थी। बावजूद इसके जय के पिताजी की इच्छा रहती थी कि वे बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। जय अपने पिताजी को अपना रोल मॉडल मानते हैं। उनके पिता ने हमेशा जय की पढ़ाई पर जोर किया। घोर गरीबी के बावजूद उन्होंने जय के अंदर हमेशा यह उम्मीद जगाए रखी कि अपने कर्म पर विश्वास रखो और अपनी शिक्षा पर फोकस रखो। उन्होंने हमेशा जय को सही दिशा दिखाने का काम किया। जय के पिताजी ने पीडब्लूडी में एक चपरासी के रूप में नौकरी से अपने कैरियर की शुरुआत की और अपनी मेहनत के बलबूते वे ग्रामीण बैंक के मैनेजर के पद तक पहुंचे। उन्होंने जय को हमेशा एक बात बोली कि शिक्षा ही एक मात्र ऐसा साधन है जो एक इंसान की जिंदगी बदल सकता है। यह बात जय के मन मस्तिष्क में हमेशा के लिए बैठ गई।

जय ने टीच फॉर इंडिया क्लब में बतौर टीचर पढऩा शुरु किया। उत्तर प्रदेश के जौनपुर में जय का जन्म हुआ और उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं से प्राप्त की। पैसे की तंगी भी झेली लेकिन वे कमजोर नहीं पड़े, डटे रहे। जय ने मेकैनिकल इंजीनियरिंग 89 प्रतिशत अंकों के साथ पास की और कॉलेज में तीसरे स्थान पर रहे। इतने अच्छे अंक पाने के बावजूद जय को नौकरी नहीं मिली। क्योंकि उनके 10वीं कक्षा में अच्छे अंक नहीं थे। एक आम आदमी के लिए इंजीनियरिंग करने के बाद भी नौकरी न मिल पाना बहुत दुखदायी अनुभव हो सकता है लेकिन जय ने इसे बहुत सकारात्मक रूप में लिया। जिंदगी की हर चुनौती उन्हें एक राह दिखाती है। जय हमेशा से देश के लिए और देशवासियों के लिए कुछ करना चाहते थे। वे लोगों की समस्याओं का समाधान खोजना चाहते थे और यही उनकी सकारात्मकता का कारण भी रहा।

image


जब जय इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे तब उन्हें टीच फॉर इंडिया के बारे में पता चला। जब जय ने इस विजन के बारे में जाना तो जय को बहुत अच्छा लगा। इस मिशन का विजन था एक दिन भारत के सभी बच्चे बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त करेंगे। जय उस समय एक रिसर्च प्रोजेक्ट 'क्वालिटी ऑफ हायर एजुकेशन इन इंडिया' पर काम कर रहे थे। जय ने जब इस विषय पर सोचा तो पाया कि यह संभव है लेकिन इसके लिए खुद पर भरोसा और कमिटमेंट होना जरूरी है। ठीक उसी समय जय ने 'टीच फॉर इंडिया' विजन के लिए अपनी तरफ से कुछ सहयोग करने का मन बनाया। जय बताते हैं कि वे खुद गरीब थे केवल यही कारण नहीं था कि वे इस प्रोजेक्ट से जुड़कर कुछ करना चाहते थे बल्कि वे भी यह चाहते थे कि देश का हर बच्चा अच्छी एजुकेशन ले।

image


इस प्रकार सन 2013 में जय टीच फॉर इंडिया से जुड़ गए। जय मानते हैं कि एक दिन बहुत जल्द ऐसा आएगा जब हर बच्चा बहुत अच्छी शिक्षा प्राप्त करेगा। टीच फॉर इंडिया प्रोजेक्ट से जुड़कर जय बहुत गर्व का अनुभव कर रहे हैं। वे इस दिशा में ज्यादा से ज्यादा काम करना चाहते हैं ताकि यह मिशन सफल हो। वे इस प्रोजेक्ट में बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर काम कर रहे हैं। जय के इस काम से उनके पिता जोकि हमेशा शिक्षा पर जोर दिया करते थे, बहुत खुश हैं।

जय मानते हैं उन्होंने किसी बड़ी कंपनी में जॉब करने को प्राथमिकता न देकर गरीब बच्चों के लिए काम करने का मन बनाया यह उनका बहुत अच्छा निर्णय था। एक मल्टीनेशनल की जॉब बैंक बेलैंस तो बढ़ा सकती थी, अच्छी लाइफ स्टाइल भी दे सकती थी लेकिन जो खुशी व संतुष्टी जय को यहां काम करके मिल रही है उससे वे बहुत ज्यादा गर्व महूसस करते हैं। जब वे छोटे-छोटे बच्चों से मिलते हैं, उन्हें पढ़ाते हैं। उनसे बातें करते हैं। उनका लंच शेयर करते हैं तो यह पल उनके लिए सबसे सुखद पल होते हैं। इन पलों का जय बहुत आनंद लेते हैं।

image


जय मानते हैं कि हर बच्चा अलग होता है। हर बच्चे की कुछ खासियत होती है लेकिन जब वे साथ मिल जाते हैं तो एक खूबसूरत संसार बनता है। जय ने अपनी फेलोशिप 32 बच्चों के साथ शुरु की और आज 360 से ज्यादा बच्चे उनके साथ हैं। इन बच्चों को जय अपना अच्छा दोस्त भी मानते हैं। यह बच्चे बहुत गरीब हैं। इन बच्चों के लिए जिंदगी की मूलभूत चीज़ें पाना भी मुश्किल होता है। इनमें से ज्यादातर बच्चे मिड डे मील के भरोसे रहते हैं। कई बार छोटे-छोटे बच्चे उस खाने को पैक करके अपने घर के लिए भी ले जाते हैं क्योंकि उनके घर में खाना नहीं होता। इन बच्चों को प्यार और केयर भी उतना नहीं मिलता जितना उन्हें चाहिए। क्योंकि इनके माता-पिता घर चलाने के लिए दिन-रात काम में लगे रहते हैं इसलिए उनके पास बच्चों के साथ समय बिताने की फुर्सत ही नहीं है। न ही वे इस बात को महसूस करते हैं कि बच्चों के साथ समय बिताना कितना जरूरी है।

बच्चों के साथ सबसे बड़ी बात यह होती है कि बच्चे अच्छी चीज़ों से भी बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं तो बुरी चीज़ों से भी। इसलिए हमारा यह फर्ज बनता है कि हम बच्चों के सामने ज्यादा से ज्यादा अच्छे उदाहरण पेश करें।

यह बच्चे जय के साथ अपनी खुशी व अपने दुख शेयर करते हैं। अपनी दिनचर्या से लेकर अपने दोस्तों और अपने घर की समस्याओं को भी शेयर करते हैं। जिसका कारण यह है कि जय केवल उनके अध्यापक ही नहीं बल्कि उनके दोस्त बनकर उनकी बातें सुनते हैं और सहायता करते हैं। जय इस बात का भी ख्याल रहते हैं कि यहां बच्चों का मानसिक विकास भी हो। उनके भीतर समझ पैदा हो।

भविष्य में जय अपने गांव में एक स्कूल खोलना चाहते हैं। साथ ही जय राजनीति भी ज्वाइन करना चाहते हैं ताकि वे बच्चों की ज्यादा से ज्यादा मदद कर सकें। फैलोशिप के दौरान जय ने पुणे में 'परिवर्तन' संस्था की शुरुआत की। यह संस्था बच्चों के लिए काम करती है। परिवर्तन के तहत वे एक मासिक कॉनफ्रेंस करते हैं जिसका नाम उन्होंने 'संवाद' रखा है। जिसमें वे बच्चों के माता-पिता से बातचीत करते हैं। फौलोशिप के दौरान उन्होंने पांच संवाद इंवेंट्स आयोजित किए जिनमें अलग-अलग विषयों पर चर्चा की गई।

Add to
Shares
1
Comments
Share This
Add to
Shares
1
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

    Latest Stories

    हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें