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क्यों ज्यादा अच्छे होते हैं लड़के विज्ञान की पढ़ाई में?

6th Jan 2018
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एक सवाल उठाया जाता है कि आखिर इतनी मेधावी लड़कियां चली कहां जाती हैं, आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में उनकी उपस्थिति कम कैसे रह जाती है। विज्ञान के क्षेत्र में शोध करते हुए क्यों नहीं दिखाई देतीं। इस बात का जवाब विज्ञान के ही गर्भ में है...

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


एक शोध के मुताबिक, लड़के लड़कियों की तुलना में कुछ खास विज्ञान के टेस्ट में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, उनका बेहतर स्टूडेंट होना नहीं है।

यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के रिसर्चर्स ने पाया है कि शिक्षकों ने जिस परीक्षा के बारे में ज्यादा या कम महत्व बच्चों के बीच रखा, परिणाम हर बार उसी के हिसाब से अच्छे या खराब हुए।

एक आम धारणा है कि लड़के विज्ञान के क्षेत्र में ज्यादा आगे बढ़ते हैं। जब दसवीं या बारहवीं के बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आते हैं तो हर साल की सुर्खियां यही होती हैं कि लड़कियों ने फिर से मारी बाजी। इसके बाद एक सवाल उठाया जाता है कि आखिर इतनी मेधावी लड़कियां चली कहां जाती हैं, आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में उनकी उपस्थिति कम कैसे रह जाती है। विज्ञान के क्षेत्र में शोध करते हुए क्यों नहीं दिखाई देतीं। इस बात का जवाब विज्ञान के ही गर्भ में है।

एक शोध के मुताबिक, लड़के लड़कियों की तुलना में कुछ खास विज्ञान के टेस्ट में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, उनका बेहतर स्टूडेंट होना नहीं है। बल्कि उनका परीक्षाओं को लेकर होने वाले डर या रोमांच का सामना करने के अलग तरीकों की वजह से है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के रिसर्चर्स ने पाया है कि शिक्षकों ने जिस परीक्षा के बारे में ज्यादा या कम महत्व बच्चों के बीच रखा, परिणाम हर बार उसी के हिसाब से अच्छे या खराब हुए। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के मुताबिक 9 अलग नई बॉयोलॉजी कोर्स के साथ बच्चों पर एक साल तक शोध किया गया। 

जर्नल प्लोस वन में प्रकाशित अध्य्यन के अनुसार छात्राओं ने कहीं से कम प्रदर्शन नहीं किया, खास उन कोर्सेज़ में जो पहले सिर्फ आधे से कम के लिये परीक्षा में शामिल किया जाते थे। दूसरे अध्य्यन में पाठ्यक्रम को 3 अलग भीगों में बांट दिया गया और उनकी वैल्यू कम और ज्यादा कर बच्चों के सामने रखी गई, ताकि वो मिड-टर्म और फाइनल के लिये अलग तैयारी कर सकें और रिसर्च में रिज़ल्ट ने जेंडर गैप की बात को उजागर कर दिया। यूनिवर्सिटी ऑफ मेनिसोटा के एसोसिएट प्रोफेसर सेह्या कोटनर के मुताबिक, जब परीक्षाओं के स्तर को बढ़ा या घटा दिया जाता है, तब परिणामों में अंतर भी साफ तौर पर देखा जा सकता है।

इसलिये एक छात्रा के ऊपर खास तौर पर जब परीक्षा के मूल्यों को बदला जाता है तो उनके परिणाम भी उसी तरह से आते हैं। परिणामों के इस अंतर को दूर करने के लिये एक तरीका ये पाया गया कि परीक्षाओँ को कम स्ट्रेस में कराया जाए। जैसे क्विज़ और साइनमेंट इसके बेहतर विकल्प हो सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा करने से प्रदर्शन में जो अंतर छात्र और छात्राओं के बीच है उसे दूर किया जा सकता है विज्ञान जैसे विषय के लिये खास तौर पर। 

द एक्टिव लर्निंग अप्रोच के शोधकर्ताओं ने बताया कि जो लेक्चर और परीक्षाएं ग्रुप वर्क और साझा प्रयासों के तौर पर लिये जा सकते हैं, उनके माध्यम से जेंडर गैप को भरा जा सकता है। शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि छात्र जब खुद किसी तरह की रिसर्च करते हैं, तो उनका प्रदर्शन और ज्यादा बेहतर हो सकता है। शिक्षक किसी भी तरह विषय को अगर ज्यादा कॉम्प्लीकेट ना कर आसान बनाएं, तो कई रोड़े जो बच्चों के रिज़ल्ट को खराब करते हैं, उन्हें दूर किया जा सकता है। 

ये भी पढ़ें: ऐसे निपटें 'फॉल्स हंगर' से

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