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खुल के हँसने के दिन, गीत गाने के दिन

20th Nov 2017
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फ़ैज़ की लिखावटों में सरहदें मुल्क की नहीं, इंसानियत और हुकूमतों के बीच हुआ करती हैं। उनकी किताबों की राह वही है, जो शहीदे आजम भगत सिंह की। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के लफ्जों की अपनी एक अलग बिरादरी रही है, जिसके एक मुल्क का नाम रहा अमीरी, दूसरे का गरीबी।

फैज अहमद फैज और केदारनाथ

फैज अहमद फैज और केदारनाथ


"तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी तेरे जाँ-निसार चले गए, तेरी रह में करते थे सर तलब सरे-रहगुज़ार चले गए, तेरी कज़-अदाई से हार के शबे-इंतज़ार चली गई, मेरे ज़ब्ते-हाल से रूठ कर मेरे ग़मगुसार चले गए"

 उम्रदराज कवि केदारनाथ सिंह भी कमोबेश फ़ैज़ की ही राहों के राही हैं, जिनकी आवाज देश की सरहदों से बाहर दूर-दूर तक गूंजती है। हमारे बीच कल को जब केदारनाथ सिंह नहीं होंगे, तब विश्वास करना कठिन होगा कि हिंदी कविता की धरती पर कोई ऐसा आदमी भी चलता था! 

आज (20 नवम्बर) हिंदी और उर्दू के दो प्रख्यात साहित्यकारों का यादगार दिन है। कवि केदारनाथ सिंह का जन्मदिन और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पुण्यतिथि। तरक्की पसंद शायर फ़ैज़ उस वक्त के बेजोड़ कलमकार रहे हैं, जब मुल्क के दो टुकड़े नहीं हुए थे। वतन के दो हिस्से हुए तो भले वह पाकिस्तान की सरहदों में घिर गए लेकिन उनके आवाज की बुलंदी आज भी आदमीयत के कारवां में बामुलाहिजा हिंदुस्तान समेत पूरी दुनिया में गूंजा करती है।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के लफ्जों की अपनी एक अलग बिरादरी रही है, जिसके एक मुल्क का नाम रहा अमीरी, दूसरे का गरीबी। आज भी उनके शब्द रफ्ता-रफ्ता कुछ इस तरह उन्हें चाहने वालों के सिरहाने बिछ जाया करते हैं- 'तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी तेरे जाँ-निसार चले गए, तेरी रह में करते थे सर तलब सरे-रहगुज़ार चले गए, तेरी कज़-अदाई से हार के शबे-इंतज़ार चली गई, मेरे ज़ब्ते-हाल से रूठ कर मेरे ग़मगुसार चले गए, न सवाले-वस्ल न अर्ज़े-ग़म न हिकायतें न शिकायतें, तेरे अहद में दिले-ज़ार के सभी इख़्तियार चले गए..।'

फ़ैज़ की लिखावटों में सरहदें मुल्क की नहीं, इंसानियत और हुकूमतों के बीच हुआ करती हैं। उनकी किताबों की राह वही है, जो शहीदे आजम भगत सिंह की। आजादी के आंदोलन के जमाने में उनका भी मानना था कि अंग्रेजों की जगह सांवले शासकों के हमारे सर पर सवार हो जाने से मेहनत-मशक्कत करने वालो की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आने वाला है, बदलाव तो तभी दिखेगा, जब श्रम की दुनिया राज करे- 'निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ, चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले, जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले, नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले...।' फ़ैज़ का मानना था कि कुर्सियों पर चेहरे के हेरफेर से हमारी जमीन का स्वाद नहीं बदलना, इसके लिए तो वो मुट्ठियां हवा में लहरानी होंगी, जिनसे पसीना टपकता है -

बहुत हैं ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिए

जो चंद अहले-जुनूँ तेरे नामलेवा हैं

बने हैं अहले-हवस मुद्दई भी, मुंसिफ़ भी

किसे वकील करें, किससे मुंसिफ़ी चाहें

जिस वक्त में माखनलाल चतुर्वेदी लिख रहे थे- 'मुझे तोड़ लेना वन-माली, उस पथ पर तुम देना फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक', जिस वक्त में भगत सिंह लिख रहे थे - 'उसे यह फ़िक्र है हरदम, नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है? हमें यह शौक देखें, सितम की इंतहा क्या है? दहर से क्यों खफ़ा रहें, चर्ख का क्यों गिला करें, सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबिला करें। कोई दम का मेहमान हूँ, ए-अहले-महफ़िल, चरागे सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ। मेरी हवाओं में रहेगी, ख़यालों की बिजली, यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे', उसी दौर में फ़ैज़ के लफ्जों के तीर कुछ इस तरह चल रहे थे-

'आज के दिन न पूछो मेरे दोस्तो दूर कितने हैं ख़ुशियाँ मनाने के दिन

खुल के हँसने के दिन, गीत गाने के दिन, प्यार करने के दिन, दिल लगाने के दिन

ज़ख़्म कितने अभी बख़्ते-बिस्मिल में हैं, दश्त कितने अभी राहे-मंज़िल में हैं

तीर कितने अभी दस्ते-क़ातिल में हैं, आज का दिन जबूँ है मेरे दोस्तो

जैसे दर्द-ओ-अलम के पुराने निशाँ, सब चले सूए-दिल कारवाँ कारवाँ

हाथ सीने पे रक्खो तो हर उस्तख़्वाँ, से उठे नाला-ए-अलअमाँ अलअमाँ

कब तुम्हारे लहू के दरीदा अलम, फ़र्क़-ए-ख़ुर्शीदे-महशर पे होंगे रक़म

अज़ कराँ ता कराँ कब तुम्हारे क़दम, लेके उट्ठेगा वो बहरे-ख़ूँ यम-ब-यम

जिसमें धुल जाएगा आज के दिन का ग़म, सारे दर्द-ओ-अलम सारे ज़ोर-ओ-सितम

दूर कितनी है ख़ुर्शीदे-महशर की लौ, आज के दिन न पूछो मेरे दोस्तो।'

आज के उम्रदराज कवि केदारनाथ सिंह भी कमोबेश फ़ैज़ की ही राहों के राही हैं, जिनकी आवाज देश की सरहदों से बाहर दूर-दूर तक गूंजती है। हमारे बीच कल को जब केदारनाथ सिंह नहीं होंगे, तब विश्वास करना कठिन होगा कि हिंदी कविता की धरती पर कोई ऐसा आदमी भी चलता था! वह कहते हैं- 'देखो, समय बदल चुका है। आज देश में जो निजाम है और मैं चाहूं या न चाहूं, अभी यहीं निजाम रहनेवाला है, तो इस निजाम में साहित्य-संस्कृति के लिए कोई न तो जगह है, न उम्मीद। पर देश भर में साहित्य लेखन बंद नहीं हुआ है। पर उसकी कोई बड़ी या सामूहिक उपस्थिति नहीं है। और यह सब सारी दुनिया में हुआ है। हो सकता है कि भविष्य में कुछ नये तरह का साहित्य आए, जिसके बारे में मैं अभी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं।'

केदारनाथ सिंह देश पर, इंसानियत पर, साहित्य पर, कविता पर तो ढेर सारी बातें कहते, लिखते रहते ही हैं, वह उन कायनातों पर भी रोशनी बिखेरा करते हैं, जहां से आमतौर पर नजरें चुरा ली जाया करती हैं। मसलन, वह कवि अर्नेस्तो कार्डेनाल द्वारा हॉलीवुड की ड्रीमगर्ल मर्लिन मुनरो की आत्महत्या पर लिखी उस कविता की भी बात करते हैं- 'हे ईश्वर/ तुम तो जानते हो / वह किससे बात करना चाहती थी। जब तुम नहीं होती न्यूयार्क में/ तो कोई नहीं होता न्यूयार्क में। जब तुम होती हो न्यूयार्क में/ तो कोई नहीं होता न्यूयार्क में।'; और इटली के एक बेमेल प्रेमी जोड़े की भी।

ऐसे ही एक वाकये पर वह अजित राय को बताते हैं - 'एक बार रोम और वेनिस के बीच पादुआ गाँव में प्रधान के घर ठहरा था। एक उन्नीस-बीस साल की लड़की मेरी दुभाषिया थी। उसी गांव में माइकेल एंजेलो की पहली दीवार पेंटिंग थी। उस लड़की का एक पचहत्तर साल का प्रेमी था, जो कवि था। हम एक ऐतिहासिक इमारत को देखने गए। हमें 120 सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुंचना था। हम उपर पहुंच गए । वहां जो हुआ, सो हुआ। कुछ देर बाद अचानक उस लड़की को याद आया कि उसका बूढ़ा प्रेमी तो नीचे छूट गया। वह नीचे की ओर भागी। पीछे पीछे मैं भी भागा। मैं क्या देखता हूं कि वह बूढ़ा रेंगता हुआ जैसे-तैसे बीस सीढ़ियाँ चढ़कर सुस्ता रहा था और उदास आँखों से ऊपर की सीढ़ियों की ओर देख रहा था। वह लड़की भागती हुई उसके पास गई और उसे बेतहाशा चूमने लगी। मैंने महसूस किया कि यह दृश्य दुनिया की किसी भी महान कही जानेवाली प्रेम कविता से कम नहीं है।'

केदारनाथ सिंह इसी क्रम में लेव तोलस्तोय के फक्कड़पन, सार्त्र और सीमोन द बोऊआ के विलक्षण प्रेम और 'मेरा दागिस्तान' के विश्व प्रसिद्ध लेखक रसूल हमजातोव से हुई मुलाकात के दुर्लभ क्षणों से भी गुजरते हैं। वह बताते हैं कि किस तरह एक प्रोग्राम में रसूल को इसलिए अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बिठाया गया कि वह अभिजात बिरादरी के नहीं थे। तब उन्हें लगा था कि जात-पांत का रोग हिंदुस्तान में ही नहीं, नस्लीयता के रूम में, काली-गोरी चमड़ी के रूप में, ईसाइयत और इस्लाम के रूप में बंटवारों की अपनी-अपनी सरहदे खींचे खड़ा है। आइए, केदारनाथ सिंह की एक कविता के बहाने उनके विचारों की गहराई से रू-ब-रू हो लेते हैं -

मेरी भाषा के लोग

मेरी सड़क के लोग हैं

सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग

पिछली रात मैंने एक सपना देखा

कि दुनिया के सारे लोग

एक बस में बैठे हैं

और हिन्दी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस

हवा में गायब हो गई

और मेरे पास बच गई सिर्फ़ मेरी हिन्दी

जो अन्तिम सिक्के की तरह

हमेशा बच जाती है मेरे पास

हर मुश्किल में

कहती वह कुछ नहीं

पर बिना कहे भी जानती है मेरी जीभ

कि उसकी खाल पर चोटों के

कितने निशान हैं

कि आती नहीं नींद उसकी कई संज्ञाओं को

दुखते हैं अक्सर कई विशेषण

पर इन सबके बीच

असंख्य होठों पर

एक छोटी-सी खुशी से थरथराती रहती है यह !

तुम झाँक आओ सारे सरकारी कार्यालय

पूछ लो मेज़ से

दीवारों से पूछ लो

छान डालो फ़ाइलों के ऊँचे-ऊँचे

मनहूस पहाड़

कहीं मिलेगा ही नहीं

इसका एक भी अक्षर

और यह नहीं जानती इसके लिए

अगर ईश्वर को नहीं

तो फिर किसे धन्यवाद दे !

मेरा अनुरोध है —

भरे चौराहे पर करबद्ध अनुरोध —

कि राज नहीं — भाषा

भाषा — भाषा — सिर्फ़ भाषा रहने दो

मेरी भाषा को ।

इसमें भरा है

पास-पड़ोस और दूर-दराज़ की

इतनी आवाजों का बूँद-बूँद अर्क

कि मैं जब भी इसे बोलता हूँ

तो कहीं गहरे

अरबी तुर्की बांग्ला तेलुगु

यहाँ तक कि एक पत्ती के

हिलने की आवाज़ भी

सब बोलता हूँ ज़रा-ज़रा

जब बोलता हूँ हिंदी

पर जब भी बोलता हूं

यह लगता है —

पूरे व्याकरण में

एक कारक की बेचैनी हूँ

एक तद्भव का दुख

तत्सम के पड़ोस में ।

यह भी पढ़ें: मनुष्य होने की बुनियादी शर्त है कविता

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