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कृषि वैज्ञानिक का बड़ा आविष्कार, भारत में पपीते के उत्पादन को देगा नया आयाम!

कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सीड कंपनियों में बतौर वैज्ञानिक काम कर चुके देश के प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक सुब्रमणि देश के किसानों को इस तरह कर रहे हैं जागरुक...

16th Mar 2018
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पपीता एक ऐसा फल है, जिसकी उपलब्धता साल भर रहती है। पपीते का फल लीवर से लिए बेहद सेहतमंद माना जाता है। इसके अलावा इसका इस्तेमाल च्युंग गम और कॉस्मेटिक आइटम्स बनाने में और सिल्क रिफाइनिंग आदि में भी होता है। आंकड़ों के मुताबिक़, पूरे विश्व में हर साल 6 मिलियन पपीते का उत्पादन होता है, जिसमें से अकेले भारत की हिस्सेदारी आधी यानी 3 मिलियन टन की है।

सुब्रमणि 

सुब्रमणि 


 भारत में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में पपीते की अलग-अलग क़िस्मों का भारी मात्रा में उत्पादन हो रहा है और इन्हें मुख्य रूप से खाड़ी देशों को निर्यात किया जाता है। 

कर्नाटक के मांड्या जिल़े में स्थित ऐग्रीमा बायोसाइंस कंपनी ने पपीते की रेड लेडी ड्वार्फ़ (आरएलडी) प्रजाति के बीजों के विकल्प के तौर पर इस वैराएटी के ही एफ़-1 हाइब्रिड बीज तैयार किए हैं। आपको बता दें कि पपीते की 12 मुख्य प्रजातियों में से इस वैराएटी का उत्पादन भारत में सबसे अधिक होता है और अभी तक भारत इन बीजों के आयात पर पर्याप्त पैसा खर्च कर रहा है। देश के प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक और कंपनी के संस्थापक केके सुब्रमणि कहते हैं कि उनके द्वारा विकसित बीज से हर साल देश के करोड़ों रुपए बच सकते हैं।

57 वर्षीय सुब्रमणि ने जानकारी दी कि पिछले 30 सालों में भारत ने 2000 किलो तक पपीते के बीज आयात किए, जिसपर कई सौ करोड़ रुपए खर्च हुए। सुब्रमणि द्वारा विकसित बीजों की उपलब्धता में देश को बड़ा फ़ायदा होगा। ऐग्रीमा बायोसाइंस, कई वर्षों से पपीते और मैरीगोल्ड (गेंदे के फूल) की अलग-अलग प्रजातियों के किफ़ायती बीज विकसित करने का काम कर रही है। सुब्रमणि द्वारा विकसित आरएलडी के हाईब्रिड बीज की कई और ख़ासियतें भी हैं। इनकी मदद से पपीते के पौधे को सिर्फ़ 8 महीनों में फलदार बनाया जा सकता है और ये फल कटाई से 15 दिनों तक ताज़े बने रहते हैं।

भारत में पिछले दो दशकों से लगातार पपीते की अलग-अलग प्रजातियों (ब्रीड) के उत्पादन में बढ़ोतरी देखने को मिली है। भारत में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में पपीते की अलग-अलग क़िस्मों का भारी मात्रा में उत्पादन हो रहा है और इन्हें मुख्य रूप से खाड़ी देशों को निर्यात किया जाता है। पपीते का पौधा, कई तरह की बीमारियों के लिए बेहद संवेदनशील होता है। ऐग्रीमा द्वारा विकसित बीजों और तकनीक के माध्यम से पपीते के पौधे को इन बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सकता है और अच्छे फलों का उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकता है।

पपीता एक ऐसा फल है, जिसकी उपलब्धता साल भर रहती है। पपीते का फल लीवर से लिए बेहद सेहतमंद माना जाता है। इसके अलावा इसका इस्तेमाल च्युंग गम और कॉस्मेटिक आइटम्स बनाने में और सिल्क रिफाइनिंग आदि में भी होता है। आंकड़ों के मुताबिक़, पूरे विश्व में हर साल 6 मिलियन पपीते का उत्पादन होता है, जिसमें से अकेले भारत की हिस्सेदारी आधी यानी 3 मिलियन टन की है। पपीता, एक ख़ास क़िस्म की फ़सल होती है, जिसमें मेल और फीमेल, दोनों ही तरह के फूल होते हैं।

पपीते के बीज, बेहद संवेदनशील होते हैं और सही निगरानी के अभाव में जल्द ही अपनी अपनी उत्पादकता खो देते हैं। इसके साथ-साथ इन पपीते के बीजों और पौधों को जल्द ही रोग भी घेर लेते हैं और फ़सल ख़राब हो जाती है। समस्या यह भी है कि इनको रोगों से बचाने के लिए कोई भी नैचुरल वायरस-रेसिस्टेंट नहीं होता है। केके सुब्रमणि और उनकी टीम द्वारा विकसित बीजों ने इन सभी समस्याओं और चुनौतियों का कारगर विकल्प खोज निकाला है।

केके सुब्रमणि बताते हैं कि पिछले कई सालों से इस क्षेत्र में काम करते हुए उनकी कंपनी ने मैरीगोल्ड और पपीते के एफ-1 बीजों की एक विस्तृत रेंज विकसित की है, जो हमारे देश और उसके आस-पास के देशों के वातावरण की परिस्थितियों के हिसाब से बिल्कुल उपयुक्त हैं। उन्होंने बताया कि प्रोडक्ट को मार्केट में लाने से पहले उसे मौसम की अलग-अलग परिस्थितियों में परखा जाता है ताकि लगातार अच्छे उत्पादन और फल की अच्छी गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जा सके। सुब्रमणि की टीम परंपरागत ब्रीडिंग तकनीक के साथ नवीनतम टेक्नॉलजी का भी इस्तेमाल करती है।

सुब्रमणि देश के एक प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक हैं और कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सीड कंपनियों में बतौर वैज्ञानिक काम कर चुके हैं। उन्होंने सीके सीड्स ऐंड सीडलिंग्स प्राइवेट लि. नाम की कंपनी स्थापित की थी। जिसे बाद में फ्रांस की लीमाग्रेन (विलमोरी) कंपनी ने ख़रीद लिया। सुब्रमणि, भारत सरकार के सलाहकार भी हैं। उनके बेटे अविनाश, अपने पिता से बेहद प्रभावित हैं और कंपनी की मार्केटिंग का जिम्मा संभालते हैं। देश के किसानों को अपने नए प्रयोगों से समर्थन देने के साथ-साथ सुब्रमणि की कंपनी सामाजिक दायित्वों पर भी पूरा ध्यान देती है। कंपनी अपने मुनाफ़े का एक बड़ा हिस्सा, कावेरी कन्या गुरुकुल को देती है, जहां पर पिछले 5 सालों से लड़कियों को निशुल्क शिक्षा दी जा रही है।

यह भी पढ़ें: मिलिए एमबीबीएस करने के बाद 24 साल की उम्र में गांव की सरपंच बनने वाली शहनाज खान से

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