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पान की दुकान से किताबें बेचने का ‘सपना’, 7 बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में शुमार

सुरेश शाह ने 1967 में अपनी पान की दुकान पर बेची थी पहली किताबसपना बुक डिपो लगातार सात सालों से लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में है शामिलबदलते समय के साथ खुद को सुचना प्रौद्योगिकी के अनुरूप ढालकर की तरक्कीवर्तमान में सपना बुक डिपो के देशभर में हैं कुल 12 रिटेल स्टोर

Pooja Goel
6th Nov 2016
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वह 1967 का साल था जब बैंगलोर के गांधीनगर इलाकी की एक छोटी सी पान की दुकान पर मसालों के साथ किताबों की बिक्री भी शुरू की गई। 10 गुणा 10 फुट की यह दुकान इतना सब सामान बेचने के लिये छोटी थी और फैलकर सड़क के किनारे तक आ गई थी। पहली पुस्तक के रूप में लिलिपुट की डिक्शनरी को बेचा था। बेचते समय दुकान के मालिक ने सोचा भी नहीं था उनके द्वारा रोपा गया यह बीज एक दिन देश के बड़े प्रकाशनों में शुमार होगा।

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सपना बुक हाउस की सफलता की कहानी किसी परीकथा से कम नहीं है जो एक मामूली सी पान की दुकान से प्रारंभ होकर वर्तमान मुकाम तक पहुंची है। यह देखना काफी प्रेरणादायक है कि एक छोटी सी शुरूआत के बाद ये आज देश के शीर्ष प्रकाशन संस्थाओं में से एक हैं। 1967 में पहली किताब बेचने के बाद इन्होंने बहुत तेजी से तरक्की की राह पकड़ी। 10 साल बाद 1977 में इन्होंने गांधीनगर में ही 1200 वर्ग फुट की अपनी जगह खरीदकर पहला रिटेल आउटलेट शुरू किया। 2015 की बात करें तो, सपना बुक हाउस के बेंगलोर के 8 रिटेल स्टोर सहित कुल 12 रिटेल स्टोर हैं। इसके अलावा उनके तीन अन्य स्टोर जल्द ही शुरू होने वाले हैं। वर्तमान में यह समूह सफलता के उस मुकाम पर है जिसका सपना इसके संस्थापक सुरेश शाह ने इसे शुरू करते वक्त देखा था। सपना इन्फोवेज़ प्राईवेट लिमिटेड के संस्थापक और सीईओ निजेश शाह कहते हैं, ‘‘हमारी सफलता ने शायद उनकी उम्मीदों को भी पार कर दिया होगा। आज हम 1000 से भी अधिक व्यक्तियों की एक मजबूत टीम हैं और हमारा नाम लगातार सात बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस में आ चुका है।’’

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ऐसे समय में जब देश के अधिकतर प्रकाशक अपना अस्तित्व बचाने के लिये जूझ रहे हैं, सपना की इस सफलता के राज के बारे में कहते 25 वर्षीय निजेश कहते हैं ‘‘सही समय पर कारोबार का विविधीकरण। एक लोकप्रिय अमरीकी प्रकाशक बान्र्स एण्ड नोबल्स समय के साथ खुद को बदल नहीं पाए और उन्हें भारी नुकसान हुआ। हाल ही में उन्होंने अपनी नीतियों में बदलाव किया और अब वे दोबारा बाजार में अपने पैर जमाने के प्रयास कर रहे हैं। कहानी का सार यह है कि आप खुद को आधुनिक समय के अनुसार ढालें और बाजार की बदलती मांग के साथ अनुकूल हो जाएं अन्यथा नष्ट होने के लिये तैयार रहें।’’


निजेश ने बैंगलोर के प्रसिद्ध सेंट जोसेफ कॉलेज ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन से फाइनेंस में पोस्ट ग्रेजुएट किया है। अपने संचालन और देखरेख में आने के लगभग डेढ़ वर्ष के छोटे से समय में इस 25 वर्षीय युवा ने छोटे से कमरे से शुरू की कंपनी सपना इन्फोवे को एक मिलियन डॉलर से अधिक का उपक्रम बना दिया है। वर्तमान में सपना समूह खुदरा, प्रकाशन, प्रौद्योगिकी, वितरण और यहां तक कि ई-कॉमर्स के क्षेत्र में भी अपने पांव पसार चुका है। लगभग 35 साल पहले 1980 में प्रकाशन के काम में आने के बाद से इनके खाते में 5 हजार से अधिक शीर्षक हैं वह भी प्रतिदिन प्रकाशित 1.5 पुस्तकों के औसत के साथ। वर्ष 2012 में ई-कॉमर्स को अपनाने के बाद इनके काम में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की हुई और इन्हें वापस मुड़कर नहीं देखना पड़ा। ‘‘यह लोगों के लिये काफी सुविधाजनक होता है कि उनकी आवश्यकता की चीज उन्हें सिर्फ माउस के एक क्लिक पर ही मिल जाए। वे निश्चित रूप में इसे ही चुनेंगे,’’ निजेश कहते हैं।

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सपना के ऑनलाइन संस्कारण सपना ऑनलाइन डॉट कॉम के आठ लाख से अधिक उपयोगकर्ता हैं। दिसंबर 2014 की स्थिति के अनुसार, समुह के ऑनलाइन संस्करण ने लगभग 7 करोड़ से अधिक का व्यापार किया। यह और भी उत्साहजनक है कि इनका ऑनलाइन संस्करण सालाना 20 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ लगातार आगे बढ़ रहा है। वे रोजाना करीब 1800 से 2000 ऑर्डर को पूरा करते हैं। अबतक इन्होंने एक दिन में सबसे अधिक 4300 ऑर्डर पूरे किये हैं।

ऑनलाइन बिक्री के अलावा इनके रिटेल स्टोर भी रोजाना लगभग 3 लाख से अधिक आगंतुकों की मांग को पूरा करने का प्रयास करते हैं। सपना का यह सफल व्यापार का नमूना पूरी तरह से स्वयं वित्त पोषित है। शिक्षा का बढ़ता क्षेत्र सपना की तरक्की में एक बहुत बड़ा कारक है। निजेश का कहना है ‘‘हमने शिक्षा को एक बढ़ते हुए क्षेत्र के रूप में देखा और हमें इसमें सही समय पर निवेश करने का फायदा भी मिला। हम कई स्कूलों ओर कॉलेजों सहित लगभग 11 हजार संस्थानों को पाठ्य सामग्री की आपूर्ति कर रहे हैं। इसके अलावा हमने घाना की राजधानी अकरा में भी एक कार्यालय स्थापित किया है और हम वहां भी किताबें निर्यात कर रहे हैं। इस कार्यालय के द्वारा हम वहां के 4 विश्वविद्यालयों तक अपनी पहुंच बना रहे हैं और लगभग एक साल पहले स्थापित हुए डीपीएस के लिये पाठ्य सामग्री भी उपलब्ध करवा रहे हैं।’’

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दिसंबर 2014 में विस्तार करते हुए सपना ऑनलाइन डॉट कॉम ने इशिता टेक्नोलॉजीज़ प्राइवेट लिमिटेड का बुक अड्डा डॉट कॉम, एकैडज़ोन डॉट कॉम और कूलस्कूल डॉट कॉम सहित अधिग्रहण करने में सफलता प्राप्त की। कहने की जरूरत नहीं लेकिन यह अधिग्रहण भी शिक्षा के क्षेत्र पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने के लिये किया गया था। निजेश बताते हैं कि वर्तमान में लोगों का रुझान स्व-प्रकाशन की ओर भी काफी बढ़ा है। इसे देखते हुए उन्होंने लगभग चार महीने पहले साधारण लेखक से साहित्यकार बनने का सपना देखने वालों के लिये एक मंच उपलब्ध करवाया और उसके बाद से वे 22 ऐसे लेखकों की किताबों को प्रकाशित कर चुके हैं। चूंकि इनके पास अपनी कोई संपादकीय टीम नहीं है इसलिये ये प्रकाशित सभी पुस्तकों में पहले ही लेखन सामग्री के लिये लेखक को जिम्मेदार बताते हैं। ‘‘हम लेखकों को साहित्यकार की श्रेणी में लाने में उनकी सहायता कर रहे हैं। शर्त बस यह है कि बुनियादी लेखन सामग्री गैर-विवादास्पद होनी चाहिये।’’


इस काम से जुड़ी लागत के बारे में बताते हुए निजेश कहते हैं कि ऐसे प्रकाशनों का खर्चा 10 हजार रुपये से लेकर कुछ लाख तक का हो सकता है जो विभिन्न स्थितियों और शर्तों पर निर्भर करता है। निजेश बताते हैं कि ‘‘हमने ऐसे ही एक 12 वर्षीय लेखक की कहानियों की एक किताब की 200 प्रतियां प्रकाशित कीं। इस पुस्तक को प्रकाशित करना अपने आप में एक बहुत ही सुखद प्रयास रहा।’’


भारतीय प्रकाशन उद्योग लगभग 40 अरब डॉलर से अधिक का है जिसका तकरीबन 4 प्रतिशत हिस्सा ई-किताबों का है। विकास की दर लगभग 70 से 80 प्रतिशत पर स्थिर है और प्रौद्योगिकी के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से इसमें गिरावट की कोई गुजाइश नहीं दिखती। वर्तमान परिदृश्य पर नजर डालें तो सपना बुक हाउस निश्चित रूप से एक ऐसे पायदान पर खड़ा है जहां से वह प्रकाशन के बाजार के एक बड़े हिस्से को अपने कब्जे में ले सकता है।

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