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यह कविता से साहित्य की मुक्ति का समय: राजेंद्र यादव

13th Oct 2017
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कम ही लोगों को मालूम है कि कथाकार राजेंद्र यादव कविताएं भी लिखते थे। उनसे कई मुलाकातें हुईं, कभी 'हंस' के कार्यालय में, कभी मयूर विहार वाले उनके आवास पर। 

राजेंद्र यादव के साथ

राजेंद्र यादव के साथ


 कविता के बारे में राजेंद्र यादव का कहना था कि देश की आजादी के बाद का 60 साल का समय कविता से साहित्य का क्रमशः मुक्त होने का समय रहा है।

जिन विचारों की दृढ़ता के साथ आप कोई संघर्ष करते हैं, लड़ते हैं, युद्ध करते हैं, युद्ध जीत जाने के बाद जब आप शासन में आएंगे, तो उसी एक-पक्षीय वैचारिक नृशंसता के साथ अपनी शासन प्रणाली चलाना चाहेंगे।

एक बड़े साहित्यकार की यह टिप्पणी कथाकार राजेंद्र यादव पर भी लागू होती है कि 'जो छंद में अच्छी रचनाएं नहीं कर पाते हैं, मुक्तछंद में दौड़ने लगते हैं, जो दोनों में नहीं चल (लोकप्रिय हो) पाते, गद्य की ओर मुड़ जाते हैं।' राजेंद्र यादव का कहना था कि देश की आजादी के बाद का 60 साल का समय कविता से साहित्य का क्रमशः मुक्त होने का समय रहा है। गद्य का विकास कविता के चंगुल से मुक्त होने के साथ हो रहा है। कम ही लोगों को मालूम है कि कथाकार राजेंद्र यादव कविताएं भी लिखते थे। उनसे कई मुलाकातें हुईं, कभी 'हंस' के कार्यालय में, कभी मयूर विहार वाले उनके आवास पर। हर मुलाकात के बाद उनका एक संदेश मन में मेरे पीछे-पीछे साथ चला आता था कि वह मीडिया में बने रहना चाहते थे। इसके लिए विवादों में, चर्चाओं में बने रहना, उनके उसी उद्देश्य में काम आने वाली एक कला थी। वह चाहते थे, जो कहें, दूर तक पढ़ा-सुना जाए। यद्यपि मीडिया के बारे में उनकी राय अच्छी नहीं थी। राय तो कविता के बारे में भी अच्छी नहीं थी। भले ही उन्होंने अपने लेखन का प्रारंभ कविताओं से किया और बाद में उनको महत्त्वहीन मान कर नष्ट कर दिया।

उनकी कविताएँ 'आवाज तेरी है' नाम से 1960 में ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुईं। काफी कविताएं उनके रहते अप्रकाशित रह गईं थीं। एक बड़े साहित्यकार की यह टिप्पणी उन पर भी लागू होती है कि 'जो छंद में अच्छी रचनाएं नहीं कर पाते हैं, मुक्तछंद में दौड़ने लगते हैं, जो दोनों में नहीं चल (लोकप्रिय हो) पाते, गद्य की ओर मुड़ जाते हैं।' कविता के बारे में राजेंद्र यादव का कहना था कि देश की आजादी के बाद का 60 साल का समय कविता से साहित्य का क्रमशः मुक्त होने का समय रहा है। गद्य का विकास कविता के चंगुल से मुक्त होने के साथ होता रहा तो वहीं जीवित रहने के लिए कविता को या तो गद्यात्मक होना पड़ा या फिर वो पश्चिम का सीधा-साधा अनुवाद हो गई।

समय के साथ-साथ कुछ चीजें मुरझा जाती हैं, एक ओर सरकती चली जाती हैं और कुछ हैं जो मुख्यधारा में आ जाती हैं। आज से 50 साल पहले या फिर 20-25 साल पहले किसी भी साहित्यिक बहस में या खंडन-मंडन में या प्रतिवादन में अक्सर कविता का जिक्र हुआ करता था, उसे 'कोट' किया जाता था, जबकि अब सारे विश्व में कविता इन सबसे अलग हो चुकी है। हिंदी में आज जितने वैचारिक विमर्श होते हैं, उनमें क्या कहीं कविता है?... क्या तुलसी, कबीर या फिर किसी और ने भी हिंदी साहित्य को समझने के लिए कोई अवधारणा विकसित की?

राजेंद्र यादव, फोटो साभार: सोशल मीडिया

राजेंद्र यादव, फोटो साभार: सोशल मीडिया


एक दिन वह पहले से लंबी बातचीत के लिए मन बनाकर बैठे हुए थे। जब उनसे मैंने पूछा कि 'हंस' के संपादक के रूप में आपको ऑनलाइन (सोशल) मीडिया, ब्लॉगिंग आदि का कैसा भविष्य दिखता है, वह बोले- 'इसका भविष्य तभी मजबूत होगा, जब ये एकजुट हो जाएंगे। तभी हस्तक्षेप संभव हो सकता है। अलग-अलग रहकर नहीं। पैरलल तभी बनेंगे, जब एकजुट होंगे। हजारों-लाखों ब्लॉग, पोर्टल देखना किसी एक के लिए संभव नहीं। न किसी के पास इतना समय है। लेकिन हां, पैरलल हस्तक्षेप बहुत जरूरी है, इसको कामयाब और एकजुट होना ही चाहिए। इस दिशा में कोशिश करनी चाहिए।'

यादवजी से जब मैंने पूछा कि आपने कहीं कहा है, विचारधारा नृशंस बनाती है, कैसे? तो उनका कहना था कि 'देखिए, उस बातचीत के दौरान मुझे ऐसा लगा था। अभी भी लगता है। लड़ने के लिए, युद्ध के लिए, और उसके बाद उन विचारों के हिसाब से जो शासन प्रणाली बनती है, तो वह उस राज्य के माध्यम से अपने विचारों को लोगों पर लागू करने की अवांछित कोशिशें ज्यादा करती है। जिन विचारों की दृढ़ता के साथ आप कोई संघर्ष करते हैं, लड़ते हैं, युद्ध करते हैं, युद्ध जीत जाने के बाद जब आप शासन में आएंगे, तो उसी एक-पक्षीय वैचारिक नृशंसता के साथ अपनी शासन प्रणाली चलाना चाहेंगे।

शासन में आ जाने के बाद वह उसी मजबूती से अपने विचारों को लागू करना चाहेंगे। जहां-जहां इस्लामी शासन प्रणाली आई, वहां भी ऐसा हुआ। उनकी नजर में, उनके विचारों के हिसाब से जो काफिर थे, दमन का शिकार हुए। लेकिन हमारे यहां बात दूसरी है। जब संग्राम होता है तो उसके नायक दूसरे होते हैं, सत्ता में आ जाने के बाद दूसरे। जैसे महात्मा गांधी। जब स्वतंत्रता सेनानी गांधीवादी तरीके से संग्राम जीत कर राजसत्ता में आए तो गांधी चले गए। हमने जो प्रजातंत्र की शासन प्रणाली अपनाई, वो शब्दशः वैसी नहीं थी, जैसा गांधी जी चाहते, कहते थे। गांधी जी व्यक्ति-केंद्रित थे। वह उस समय की पैदाइश थे, जब सारी चीजें व्यक्ति-केंद्रित होती थीं। अहिंसा तो सिर्फ कहने को उनका राजनीतिक अस्त्र था।'

जब उनसे पूछा गया कि प्रेमचंद्र की कहानियों में गांव ही गांव हैं, 'हंस' से गांव नदारद क्यों रहता है? इस सवाल ने उन्हे किंचित विचलित किया, फिर सहज होते हुए बोले - 'बात सही है। चूंकि मैं गांव का सिर्फ रहा भर हूं, लेकिन सचेत जीवन शहरी रहा है। सीधे संपर्क नहीं रहा। मेरे संपादक होने के नाते 'हंस' के साथ एक बात यह भी हो सकती है। हालांकि ऐसी कोई बात नहीं कि अपने समय के गांव को रचनाकार के रूप में मैंने महसूस नहीं किया है। पैंतालीस सालों से शहर में रह रहा हूं। हंस के साथ सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन भी शहरी मध्यवर्ग का है।'

अब सवाल उठता है कि हम गांव के बारे में लिखें या गांव के लोग लिखें। यदि गांव से कोई गांव के बारे में लिखे तो बहुत ही अच्छा, लेकिन ऐसा हो कहां रहा है? ऐसा संभव भी नहीं लगता है। प्रेमचंद ने होरी के बारे में लिखा। किसी होरी को पता ही नहीं कि उसके बारे में भी किसी ने कुछ लिखा है। ये तो शहरों में बैठकर हम लोग न उसकी करुणा और दुर्दशा की फिलॉस्पी गढ़ रहे हैं। 'आज गांवों से कुछ लोग लिख रहे हैं। वे कौन-से लोग हैं? वे, वह लोग हैं, जो गांव में फंसे हैं, किसी मजबूरी या अन्य कारणों से। या कहिए कि जिन्हें शहरों में टिकने की सुविधा नहीं मिल पाई, गांव लौट गए और वहीं रह गए हैं। मजबूरी में वही गांव में रह कर गांव के बारे में लिख रहे हैं। और ये वे लोग नहीं हैं, जो गांवों में रम गए हैं। फिर भी, हमारे यहां 'हंस' में आज भी सत्तर फीसदी कहानियां गांव पर होती हैं।

मैं अपने को प्रेमचंद, टॉलस्टॉय और गोर्की की परंपरा में मानता हूं। तो मुझे तो रूसी समाज पर लिखना चाहिए। क्यों? या मेरे समय में प्रेमचंद का गांव तो नहीं? मेरे लिए अपने समय के मानवीय संकट ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, वह गांव के हों या शहर के। प्रेमचंद ने गांव पर लिखा। यहां प्रेमचंद के गांव से ज्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण होती है 'प्रेमचंद की चिंता' गांव के बारे में। यशपाल ने गांव पर नहीं लिखा, लेकिन मैं उन्हें प्रेमचंद की परंपरा का मानता हूं, क्योंकि उनकी रचना में जो मानवीय संघर्ष, मानवीय स्थितियां परिलक्षित होती हैं, हमे सीधे उसी गांव के सरोकारों तक ले जाती हैं। तो 'हंस' के साथ गांव की बात जोड़कर एक लेखक के विषय को लेकर हम कंफ्यूज कर रहे हैं। आज मेरा समाज वो नहीं है, जो प्रेमचंद का था। मैंने 'प्रेमचंद की विरासत' के नाम से एक किताब भी लिखी है। आज आवागमन दोनों तरफ से है। गांव शहर में बढ़ता जा रहा है, शहर गांव में घुसता जा रहा है।'

राजेंद्र यादव कविताएं भी लिखते थे। उन्होंने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत कविताओं से ही की थी। लगता है, कविता उनके संस्कार में जमी नहीं तो चल पड़े कथा-कहानी, गद्य की ओर। प्रस्तुत है राजेंद्र यादव की एक कविता 'अक्षर' -

हम सब अक्षर हैं

अक्षर हरे कागज़ पर हों या सफ़ेद पर

खुरदरे में हो या चिकने में

टोपी पहने हों या नंगे सिर

अँग्रेज़ हों या हब्शी

उन्हें लिखने वाला क़लम पार्कर हो या नरसल

लिखने वाली उँगलियों में क्यूटैक्स लगा हो या मेंहदी

अक्षर, अक्षर ही है

शब्द वह नहीं है

अमर होते हुए भी अपने आप में वह सूना है...

अक्षर अर्थ वहन करने का एक प्रतीक है, माध्यम है

अक्षर अक्षर का ढेर, टाइप-केस में भरा सीसा मात्र है

शब्द बनाता है अक्षर-अक्षर का सम्बन्ध

वही देता है उसे गौरव, गरिमा और गाम्भीर्य

क्योंकि शब्द ब्रह्म है

और सभी मिलकर एक सामाजिक-सत्य को अभिव्यक्ति देते हैं

सत्य जड़ नहीं, चेतन है।

सामाजिक सत्य एक गतिमान नदी है

वह अपनी बाढ़ में कभी हमें बहा देती है, बिखरा देती है।

कभी नदी बह जाती है

तो घोंघे की तरह हम किनारों से लगे झूलते रहते हैं।

इधर-उधर हाथ-पाँव मारते हैं...

लेकिन फिर मिलते हैं

शब्द बनते हैं-वाक्य बनते हैं

और फिर नये सामाजिक सत्य को वाणी देते हैं

क्योंकि करते हम नहीं हैं

हम अक्षर जो हैं

शब्द बनकर सत्य को समोना हमारी सार्थकता है

वाक्य बनना हमारी सफलता!

हमें पढ़ो,

हमारा एक व्याकरण है।

यह भी पढ़ें: रुहानी इश्क के कलमकार निदा फ़ाज़ली

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