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मानवता का अविकल पाठ है बच्चों की पढ़ाई

शिक्षक दिवस के मौके पर बारबियाना स्कूल के उन आठ बच्चों की चिट्ठियों बारे में नहीं पढ़ा, जो उन्होंने अपने शिक्षकों को लिखी थीं, तो कुछ नहीं पढ़ा...

5th Sep 2017
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ज्ञान शब्दों में कैद नहीं होता है। वह तो मानवता का अविकल पाठ है। पहले अभिभावक, फिर शिक्षक बच्चे को ‘ज्ञान’ का वह अविकल पाठ कराता है। अभिभावक तो बच्चे को नवजात वय से जानता, समझता है, अध्यापक को एक साथ अनेक बच्चों के मनोविज्ञान का अध्येता होते हुए उसकी खुली प्रकृति के अनुकूल उसके ज्ञान की परिधि में जीवन भर के लिए साधना-बांधना होता है। ऐसे में शिक्षक का आचरण, अनुभव, शिक्षा की योग्यता, सब एक साथ उसमें निहित होना आवश्यक है, वरना बारवियाना स्कूल के बच्चे जो कहते हैं, वह हमारे समाज, हमारी शिक्षा समूची व्यवस्था और प्रणाली के लिए स्वीकार्य होना चाहिए, अन्य़था बच्चे को मानवता का पाठ विकलांग होगा, अविकल नहीं। शिक्षक दिवस पर एक विश्वख्यात वृत्तांत के साथ प्रस्तुत है स्कूली बच्चों की व्यथा-कथा।

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1950 के दशक में डॉन लोरेंजो मिलानी नाम के एक पादरी ने देखा कि इस समुदाय के अधिकतर बच्चे या तो स्कूल छोड़ देते थे, फेल हो जाते थे या शिक्षा से असंतुष्ट थे। इन बच्चों को शिक्षित करने के लिए उन्होंने एक समानांतर स्कूली शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी। 1960 के दशक में स्कूल के 11 से 15 साल तक के आठ बच्चों ने अध्यापक के नाम पत्र लिखा। अपने पत्रों में उन बच्चों ने अपनी समझभर सरकारी स्कूल में फेल हो जाने, निष्कासित कर दिए जाने, शिक्षा, शिक्षक, स्कूल, पाठ्यक्रम प्रशिक्षण, गरीबी, भाषा आदि को लेकर अनेक अहम सवाल खड़े कर दिए।

शिक्षक दिवस के इस मौके पर बात करते हैं, बारबियाना स्कूल के उन आठ बच्चों की, जिन्होंने अपने शिक्षक के नाम ऐसी चिट्ठियां लिखीं, जो आगे चलकर दुनिया की बेस्ट सेलर बुक में शुमार हो गईं...

दिन पांच सितंबर का हो या 14 सितंबर का, जब भी भाषा, शिक्षा और समाज की बात होती है, बच्चों उसमें प्राथमिक होते हैं। इसलिए कि, बच्चों से जीवन की शुरुआत होती है और वे देश-समाज का भविष्य होते हैं। आज पांच सितंबर है, शिक्षक दिवस। तो आइए इस बार बात करते हैं, बारबियाना स्कूल के उन आठ बच्चों की, जिन्होंने अपने शिक्षक के नाम ऐसी चिट्ठियां लिखीं, जो आगे चलकर दुनिया की बेस्ट सेलर बुक में शुमार हो गईं।

बारबियाना समुदाय, इटली में टस्कनी प्रदेश में दूरदराज के क्षेत्र में रहने वाले एक समुदाय का नाम है। 1950 के दशक में डॉन लोरेंजो मिलानी नाम के एक पादरी ने देखा कि इस समुदाय के अधिकतर बच्चे या तो स्कूल छोड़ देते थे, फेल हो जाते थे या शिक्षा से असंतुष्ट थे। इन बच्चों को शिक्षित करने के लिए उन्होंने एक समानांतर स्कूली शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी। 1960 के दशक में स्कूल के 11 से 15 साल तक के आठ बच्चों ने अध्यापक के नाम पत्र लिखा। अपने पत्रों में उन बच्चों ने अपनी समझभर सरकारी स्कूल में फेल हो जाने, निष्कासित कर दिए जाने, शिक्षा, शिक्षक, स्कूल, पाठ्यक्रम प्रशिक्षण, गरीबी, भाषा आदि को लेकर अनेक अहम सवाल खड़े कर दिए।

बच्चों की शिकायत थी कि अध्यापक पहाड़ और गांव में रहने वाले बच्चों के प्रति शहरी बच्चों की तुलना में अनादर और उपेक्षा का भाव रखते हैं। वे सवाल पूछते हैं, कि क्या स्कूल में फेल होना जीवन में फेल होने के बराबर है? स्कूल में उन्हें फेल कर दिया जाता है तो उसकी कीमत उन्हें जीवन भर चुकानी पड़ती है। शिक्षक किसी को भाषा में, किसी को गणित में तो किसी को अन्य विषय में कमजोर बताने लगते हैं। वे यहां तक कहने लगते हैं कि यह बच्चा तो पढ़ ही नहीं सकता है। कोई भी शिक्षक यह नहीं सोचता है कि यह तो शिक्षा व्यवस्था की असफलता है। उन बच्चों ने सवाल उठाया कि क्या शिक्षा प्रणाली शिक्षक के हाथ का हथियार होती है, जिससे वह चाहे जिस बच्चे को सजायाफ्ता घोषित कर देते हैं?

उन बच्चों ने लिखा कि परीक्षा का सिस्टम खत्म कर देना चाहिए। यह सिस्टम तो फेल करने का शस्त्र लगता है। वह सिस्टम बच्चों के अधिकारों का हनन करता है। छात्र गियान्नी ने अपने पत्र में लिखा था कि मुझे परीक्षा में निबंध का जो विषय दिया गया, उसके लिए मैं चाहता तो सरल और विश्वस्त लेखन नियमों का पालन करके निबंध लिख सकता था मगर यदि मैंने ईमानदारी निभानी चाही तो कागज कोरा छोड़ दिया। बच्चों ने सीधे सीधे शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया कि स्कूल में बच्चे नहीं फेल होते हैं, फेल होता है शिक्षक। बच्चे उसकी अयोग्यता से फेल होते हैं। यह पूरे एजुकेशन सिस्टम की हार होती है, बच्चे की नहीं।

बच्चे पूछते हैं- आखिर स्कूल कौन है? हम ही तो स्कूल हैं। हम पर शिक्षक उस तरह ध्यान नहीं देते, जैसे उन्हें देना चाहिए। उनका ध्यान स्कूल की घंटी पर रहता है, पाठ्यक्रम पूरा कराने पर रहता है। ऐसे हर बच्चा कैसे पूरी और बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकता है?

अध्यापक के नाम चिट्ठियां लिखने वाले वे बच्चे फेल कर विद्यालय से निकाल दिए गए थे, इस लिए भी उनका सारा गुस्सा अपने शिक्षकों के प्रति था। उनकी नजर में शिक्षक ही पहले दोषी थे। उनका मानना था कि वे शिक्षक उन्हें ठीक से पढ़ाना तो दूर, उन्हें अपने बच्चों की तरह प्यार भी नहीं करना चाहते हैं। जबकि हम बच्चे अपने हर शिक्षक को अपने माता-पिता से ज्यादा सम्मान देते हैं। उन शिक्षकों को देखिए कि बदले में वे हमे क्या देते हैं। हमें फेल कर देते हैं। हमें स्कूल से निकाल देते हैं। हमे भविष्य में गलाजत की जिंदगी जीने के लिए खदेड़ देते हैं। अमीर घरों के बच्चों को शिक्षक जितना सम्मान देते हैं, उतना सम्मान वह गरीब घरों के बच्चों को क्यों नहीं देते हैं? हम गरीब परिवारों में पैदा हुए हैं तो उसमें हमारा क्या दोष है। क्या हमें अच्छी शिक्षा से इसलिए वंचित कर दिया जाना चाहिए कि हमारे माता-पिता गरीब हैं? यह कहां का न्याय है? सरकार शिक्षकों को पढ़ाने का वेतन देती है। जब वे हमे नहीं पढ़ा पाते हैं, हमे योग्य नहीं बना पाते हैं, तो सरकार को तो उन्हें दंडित करना चाहिए, स्कूल से उन्हें निकालना चाहिए, हमे क्यों? तो इस तरह तो सरकार और शिक्षक दोनों मिलकर हमारे साथ अन्याय करते हैं। उनकी कमजोरियां हमारे ऊपर थोप कर हमें स्कूल से निकाल दिया जाता है। हमें स्कूल में सताया जाता है। ऐसा सभी स्कूल करते हैं। मजदूरों और गरीब किसानों के बच्चों से उन्हें पता नहीं क्यों पूर्वाग्रह होता है। जब उन्हें पढ़ाना नहीं आता है तो बच्चों को कहते हैं कि इसे पढ़ना नहीं आता है, ये बच्चा बिगड़ गया है। गरीब बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार कर शिक्षक स्कूल में अमीरी और गरीबी की खाई को और चौड़ी करने की नींव मजबूत करते रहते हैं।

इसलिए शिक्षा के सम्बन्ध में बुनियादी विचारों की जानकारी एवं दुनिया भर में चल रहे शिक्षायी विमर्श की जानकारी शिक्षक को उसकी अकादमिक परिस्थितियों से जूझने में मदद पहुँचाती है। एक शिक्षक सिर्फ अध्यापक भर नहीं होता, उसमें दार्शनिक और समाजविद की भी योग्यता होनी चाहिए। अध्यापक-शिक्षा का एक अनिवार्य अंग है। बच्चों को समझना (उनके विकास और सीखने की प्रक्रिया के साथ) बच्चों के विभिन्न पहलुओं जैसे मानसिक, सामाजिक, नैतिक, शारीरिक विकास को समझने की उसमें पर्याप्त योग्यता होनी चाहिए। जरूरी है कि हम उन अनुभवों को जानें, जिसे बच्चों के साथ काम करते हुए उद्धृत किया जाता रहा है। 

जैसे टॉलस्टाय का अनोखा स्कूली प्रयोग, गिजुभाई का दिवास्वप्न, डेविड ऑसब्रो का नील-बाग का अनुभव, ए एस नील के समरहिल का अथवा बारबियाना स्कूल के बच्चों का अनुभव। बच्चों की कुछ श्रेणियां भी रेखांकित हैं, जैसे, उनमें सुनने और बोलने की दिक्कत, मानसिक दिक्कत, शारीरिक और मांसपेशीय दिक्कतें, दृष्टि सम्बन्धी दिक्कतें, सीखने सम्बन्धी दिक्कतें। अध्यापक इन सारी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए बच्चे को मानवता की भाषा में शिक्षा का पाठ पढ़ाता है, तभी वह बच्चा देश-समाज के भविष्य का बेहतर नागरिक हो पाता है।

पढ़े: अव्यवस्था और दुर्व्यवस्था के दरम्यान प्राथमिक शिक्षा की कदमताल 

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