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जीवन की मुश्किलों को रंग दिया, कला की दुनिया में किया नाम रोशन

51 साल की उम्र में किया फाइन आर्ट में ग्रेजुएशन...देश भर में अब तक 12 सोलो प्रदर्शनियां....अंग्रेजी-हिंदी बनी शुक्ला चौधरी के लिए चुनौती...

Harish Bisht
8th Oct 2015
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कहते हैं कि उड़ान इतनी ऊंची हो कि बादलों का कद भी छोटा पड़ जाए। कुछ ऐसा ही किया शुक्ला चौधरी ने। जिन्होने अपनी जिंदगी की तमाम बाधाओं को पार कर ना सिर्फ 48 साल की उम्र में फाइन आर्ट में ग्रेजुएशन में दाखिला लिया, बल्कि दूसरी महिलाओं के लिए भी मिसाल बनी।

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कोलकाता में साल 1954 में जन्म लेने वाली शुक्ला चार भाई बहनों में सबसे बड़ी हैं। उनका बचपन कला और पढ़ाई में बीता। उनकी मां खुद एक कुशल कलाकार थीं जो इस बात का खास ध्यान रखती थी कि उनके बच्चे पढ़ाई के साथ कला और दूसरी गतिविधियों पर भी ध्यान दें। दो साल की उम्र में ही शुक्ला चौधरी ने डांस स्कूल जाना शुरू कर दिया था लेकिन मां के प्रभाव के कारण उनका रूझान फाइन आर्ट की ओर होने लगा।

बंगाल में पली बड़ी शुक्ला चौधरी को कुछ साल बाद संगीत सीखने के लिए रविंद्र डांस एंड म्यूजिक स्कूल में दाखिला दिला दिया गया और यहीं से उनमें टैगोर को लेकर स्नेह हो गया। शांतिनिकेतन में पढ़ाई के दौरान उनकी जिंदगी में बिना किसी बाधा के सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था। यहां पर वो मन लगा कर पढ़ाई भी कर रही थी ताकि फाइन आर्ट की बारीकियों को अच्छी तरह समझ सके। वो चाहती थी कि उनकी गणना बंगाल के धुरंधर कलाकारों में हो। वो साल 1974 से लेकर 1977 तक के बीच शांती निकेतन में रहीं। यहां पर उनको कई शानदार तजुर्बे हासिल हुए उनका कहना है कि वो एक काफी अच्छा अनुभव था इस दौरान वो अपने को आकाश में उड़ने वाली एक चिड़िया मानती थीं। वहां उन्होने जो सीखा उसे अपने अंदर समाहित कर लिया। वो मानती हैं कि वो जो कुछ भी आज हैं वो शांतिनिकेतन में गुजारे वक्त की वजह से हैं।

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यहां उनको ना सिर्फ बड़े कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला बल्कि व्यक्तिगत तौर पर उनको कला से जुड़ी आजादी भी मिली हुई थी। इस वजह से उनमें काफी आत्मविश्वास पैदा हुआ और नई चीजें सीखने का मौका मिला। वो फाइन आर्ट के क्षेत्र में और पढ़ाई करना चाहती थीं लेकिन साल 1977 में उनकी शादी हो गई। शादी के बाद उनकी जिंदगी एकदम से बदल गई और उनके ऊपर घर की जिम्मेदारियों का भार आ गया। साथ ही बेटी की जिम्मेदारी भी उन पर आ गई थी। इतना ही नहीं उनके पति का तबादला भोपाल हो गया था इस कारण उनकी पढ़ाई बिल्कुल रूक गई। शुक्ला चौधरी का कहना है कि “मेरा परिवार सबसे पहले था और वो मेरी प्राथमिकता थी।” उन्होने अपना सारा वक्त परिवार को देने में लगा दिया। इस तरह उन्होने अपनी जिंदगी के 25-30 साल अपने परिवार की बेहतरी में लगा दिये।

समय के साथ साथ एक ओर उनके बच्चे बड़े हो चले थे तो शुक्ला चौधरी की जिम्मेदारियां भी कम होती चली गई। तब उन्होने सोचा कि क्यों ना एक बार फिर पढ़ाई शुरू की जाए। इस बीच उनके और उनके पति के बीच कुछ गलतफहमी भी पैदा हो गई थी। इस वजह से उनको लगने लगा था कि अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए पढ़ाई बेहद जरूरी है। शुक्ला चौधरी का कहना है कि वो दुनिया में उस चीज को लेकर अपनी अलग पहचान बनाना चाहती थीं जो उनके दिल के करीब हो। कला ही उनकी जिंदगी थी लिहाजा वो एक बार फिर सम्मान के साथ इससे जुड़ना चाहती थीं।

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शुक्ला चौधरी ने 48 साल की उम्र में स्नातक की डिग्री हासिल करने का फैसला लिया। इसके लिए उन्होने लेक्चर में हिस्सा लेना शुरू किया, प्रेक्टिकल एसाइंमेंट किये और कॉलेज से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू किया। तब कॉलेज के काफी सारे छात्र, वहां का स्टॉफ और प्रोफेसर उनको ‘टाइम पास आंटी’ के तौर पर जानते थे। जो ये समझते थे कि शुक्ला चौधरी अपना खाली वक्त गुजारने को और शौकिया तौर पर कॉलेज आ रही हैं। इनमें में ज्यादातर लोग वो थे जो ये नहीं जानते थे कि शुक्ला चौधरी ना सिर्फ गृहणी हैं बल्कि तीन बच्चों की मां भी हैं। कोई भी उनका अतीत नहीं जानता था और ना ये समझ सकता था कि वो ऐसा क्यों कर रही हैं। वहीं दूसरी ओर शुक्ला चौधरी ने कभी भी उनको ना सिर्फ अपनी मजबूरी बताने के बारे में सोचा और ना ही उनसे सहानुभूति की उम्मीद जताई। बावजूद वो चाहती थीं कि कॉलेज के दूसरे लोग उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करें जैसे वहां पर पढ़ने वाले दूसरे छात्रों के साथ किया जाता है। इन चुनौतियों का सामना करते हुए शुक्ला चौधरी अपनी फाइन आर्ट की पढ़ाई जारी रख खुश थीं।

दिल में अगर हौसला हो तो कोई काम मुश्किल नहीं होता और मंजिल मिल जाती है। तमाम चुनौतियों का सामना करने के बावजूद शुक्ला चौधरी अपनी पहली प्रदर्शनी लगाने में कामयाब हो सकीं और इस प्रदर्शनी को नाम दिया ‘द फाइट ऑफ द फीनिक्स’। इतना सब होने के बाद भी शुक्ला चौधरी की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही थी उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी भाषा की। वो धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल सकती थीं इस वजह से उनके अंदर हीन भावना पैदा हो गई थी। दरअसल शुक्ला चौधरी ने शुरूआत में अपनी पढ़ाई अंग्रेजी स्कूल से की थी लेकिन बाद में वो बंगाली स्कूल में पढ़ने लगी थीं। इसके बाद जब उनकी शादी हुई तो उनके पति का तबादला पहले भोपाल और उसके बाद हैदराबाद हो गया था जहां पर हिन्दी से काम चल सकता था हालांकि शुक्ला चौधरी को हिंदी बोलना ज्यादा नहीं आता था लेकिन अपने आसपास मौजूद लोगों की बातें सुन वो हिंदी बोलना सीख गई थीं। अंग्रेजी में महारत हासिल करने के लिए उन्होने इंग्लिश स्पीकिंग क्लासेस में हिस्सा लेना शुरू किया लेकिन समय की कमी के कारण वो कोर्स पूरा नहीं कर सकीं। क्योंकि बच्चों और पति के लिए वक्त निकालना मुश्किल हो गया था।

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जब दूसरी बार उन्होने ग्रेजुएशन करने का फैसला लिया तब भी भाषा उनके लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आई। क्योंकि जो कोर्स वो कर रही थी उसकी भाषा मराठी थी। तब वो मराठी में लिखे नोट्स की फोटकॉपी कराती जिसके बाद वो अपने पति और अपने साथियों से उनका अनुवाद हिंदी में करने को कहती थीं। बार बार की इस समस्या को देखते हुए एक बार उनकी बेटियां, उनके पति, उनके दोस्त और उनकी नौकरानी एकसाथ बैठे। जिसके बाद उन्होने संक्षेप में पैराग्राफ अंग्रेजी में लिखे, जिसे वो समझ सकते थे। हालांकि ये एक कठिन प्रक्रिया थी लेकिन साल 2005 में 51 साल की उम्र में शुक्ला चौधरी ने पुणे विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन में टॉप किया।

आज भी भले ही शुक्ला चौधरी धाराप्रवाह अंग्रेजी और हिंदी नहीं बोल पाती हो लेकिन वो खुश हैं कि वो अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा पाती हैं और वो भी बिना किसी भाषाई अवरोध के। उनका कहना है कि कला के जरिये वो अपनी बात दुनिया के सामने रखने में सक्षम है। हालांकि वो अंग्रेजी में बात करते हुए थोड़ी सतर्क रहती हैं लेकिन जब भी वो कुछ बोलती हैं तो लोग उनकी बातें सुनते हैं और यही चीज मायने रखती है। अब तक शुक्ला चौधरी देश के बड़े शहरों में अकेले 12 प्रदर्शनियां लगा चुकी हैं। उनकी कला में रोजमर्रा की जिंदगी देखने को मिल जाएगी इसके लिए वो चमकीले रंग और बोल्ड स्ट्रोक का इस्तेमाल करती हैं। उनकी पेंटिंग खरीदने वालों में ना सिर्फ देश के बल्कि विदेशी लोग भी हैं।

शुक्ला चौधरी का कहना है कि आगे बढ़ने के लिए सकारात्मक विचार और विभिन्न गतिविधियों से जुड़े रहना जरूरी है। उनके मुताबिक कभी भी अपने दिमाग को आराम नहीं देना चाहिए। जब भी दिमाग काम करना बंद कर देता है तो नकारात्मक विचार अपना घर बनाना शुरू कर देते हैं। हर वक्त अपने काम पर फोकस रहना चाहिए जो आप कर रहे हैं। शुक्ला चौधरी का कहना है कि आज की महिला पहले के मुकाबले ज्यादा आजाद है और उसके पास ज्यादा मौके हैं। उनका कहना है कि ससुराल पक्ष से टकराव के बावजूद उन्होने अपना ध्यान उन चीजों पर लगाया जो वो करना चाहती थीं। ये उनकी इच्छा शक्ति और साहस की लड़ाई थी। वो उन चीजों के पीछे तब तक लगी रही जब तक उन्होने उसे हासिल नहीं कर लिया। किसी भी कलाकार के लिए उसकी आंखे अनमोल होती हैं लेकिन शुक्ला चौधरी की दोनों आंखों की आंशिक दृष्टि कम चुकी है। बावजूद उन्होने अपने काम को बदस्तूर जारी रखा हुआ है।

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