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दुर्गम पहाड़ों पर चढ़कर लड़कियों के लिए मिसाल कायम करने वाली इशानी सावंत

भारत में पर्वतारोहण और ट्रेकिंग के क्षेत्र में सक्रिय कुछ महिलाओं में से एक हैं पुणे की इशानीवर्तमान में इशानी एक एडवेंचर और आउटडोर टूर प्रशिक्षक और गाइड के रूप में काम कर रही हैंहिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीटयूट में प्रशिक्षण लेकर खुद को संवार और निखार चुकी हैं इशानीलद्दाख में 22054 फीट की ऊंचाई पर स्थित स्टोक कांगड़ी पीक पर पहुंचकर इतिहास के पन्नों में अपना दर्ज करवा चुकी हैं

23rd Jul 2015
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लद्दाख में 22054 फीट की ऊंचाई पर स्थित स्टोक कांगड़ी पीक पर कदम रखना किसी भी पर्वतारोही या ट्रेकर के लिये उसके जीवन की सबसे रोमांचक और चुनौतीपूर्ण यात्रा होती है। और सिर्फ दो दिनों के भीतर इस दुर्गम शिखर को जीतने के लिये एक अलग ही जज्बा और जुनून चाहिये। और वास्तव में ऐसा करके इशानी सावंत यह साबित कर दिया कि वे किसी और मिट्टी की बनी हैं। इसके अलावा इस पूरी प्रक्रिया में वे पर्वतारोहण के क्षेत्र में एक नया रिकाॅर्ड बनाने में भी सफल रहीं।

पुणे की रहने वाली इशानी एक एडवेंचर और आउटडोर टूर प्रशिक्षक और गाइड के रूप में काम कर रही हैं। पुणे लाॅ काॅलेज से कानून में स्नातक इशानी ने प्रारंभ में अपने आसपास के इलाकों में सप्ताहांत के दौरान यात्राओं से शुरुआत की और वर्तमान में वे लोगों को अलग-अलग विभिन्न आउटडोर गतिविधियों और ईवेंट्स में गाइड करती हैं।

इशानी सावंत

इशानी सावंत


मात्र 13 वर्ष की उम्र में हिमालयी क्षेत्र की एक यात्रा के दौरान ही इशानी को पहाड़ों से प्रेम हो गया। वे कहती हैं कि उस सफर के दौरान वे इसकी खूबसूरती और भव्यता से अवाक् रह गईं। उन्होंने अपने खुद के कैमरे के साथ इस शक्तिशाली पर्वत श्रृंखला की तस्वीरें खींचने में खुद को व्यस्त किया। आने वाले समय में यही तस्वीरें उनकी साथी बनीं और उन्हें लगातार इन चमत्कारी पहाडि़यों की याद दिलाती रहीं।

हालांकि भारत में पर्वतारोहण अभी भी एक खेल के रूप में इतना मशहूर नहीं हो पाया है और इसके अलावा इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी तो न के बराबर है और पर्वतारोहण को एक गंभीर खेल के रूप में अपनाने वाली कुछ चुनिंद महिलाओं में इशानी का नाम भी शामिल है। एक ट्रेनर के रूप में लोगों को आउटडोर खेलों के लिये प्रशिक्षण देना उनके भीतर की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह उनके लिये सिर्फ आजीविका कमाने का साधन भर न होकर उन्हें आउटडोर तक पहुंचाने का एक जरिया भी साबित हुई।

पहाड़ हमेशा से ही बेहद प्रेरणादायक होते हैं और पर्वतारोहण किसी की भी क्षमताओ और साहस का सच्चा परीक्षण होता है। वे कहती हैं कि हर चढ़ाई के साथ आपको स्वयं को आगे की ओर धकेलना होता है। कई बार ऐसी स्थितियां आ जाती हैं जब आप अपना मार्ग पूरा करने में सक्षम नहीं रहते हैं और पूरी तरह से प्रकृति और वहां की जलवायु की परिस्थितियों की दया पर होते हैं। वे रास्ते जिनसे आप आसानी से गुजर चुके होते हैं वे बेहद दुर्गम हो जाते हैं। वे बताती हैं कि इस काम में आपको अधिकतर अपनी क्षमताओं से अधिक जोखिम का सामना करना पड़ता है और ऐसे में खुद को आगे जाने के लिये प्रेरित करना बहुत जरूरी होता है। हालांकि वे कहती हैं कि जब भी आप कोई चढ़ाई या मिशन पूरा कर लेते हैं तो आपको मिलने वाले संतोष और शांति की भावना की बराबरी नहीं की जा सकती।

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इशानी आगे बताती हें कि पर्वतारोहण आपको ध्यान केंद्रित करना और विनम्रता सिखाता है। एक बेहद दुर्गम रास्ते पर छोटी सी गल्ती भी घातक और जानलेवा साबित हो सकती है। तो जब भी आप चढ़ाई करने जाएं तो आपको पूरी तरह से तैयार होना चाहिये और ऐसे में आप बिल्कुल भी लापरवाह सा आलसी नहीं हो सकते और आप जागरुक और सतर्क तभी हो सकते हैं जब आप इन पहाड़ों को सम्मान क दृष्टि से देखें। इशानी कहती हैं, ‘‘इन पहाडि़यों पर बैठकों, नियुक्तियों या समय सीमा का कोई दबाव नहीं है। यहा पर केवल दो ही चीजें माने रखती हैं और वे हैं आप और ये खूबसूरत पहाड़।’’

इशानी के लिये प्रारंभिक दौर में पर्वतारोहण के क्षेत्र में अपने पैर जमाना काफी कठिन चुनौती साबित हुआ। उनका कहनना है कि एक लड़की का पर्वतारोहण में हाथ आजमाने के विचार उनके परिवार को पसंद नहीं आया और उन्हें राजी करने में कुछ समय लगा। इसके अलावा उन्हें इस दौरान पहले से ही इस क्षेत्र में काम कर रहे कुछ उपेक्षापूर्ण पुरुषों से भी दो-चार होना पड़ा।

इशानी कहती हैं, ‘‘पर्वतारोहण के क्षेत्र में सक्रिय महिलाएं इतनी कम हैं कि आप उनकी गिनती अपनी उंगलियों पर आसानी से कर सकती हैं। प्रारंभ में पुरुष पर्वतारोही मुझ पर भरोसा करने को तैयार ही नहीं थे और मुझे पूराा विश्वास है कि उनके इसी व्यवहार के चलते अधिक महिलाएं इस क्षेत्र में आने से कतराती हैं। हालांकि मेरा प्रशिक्षण जिन पुरुषों के साथ हुआ वे काफी मददगार थे और मुझे लड़की होने की वजह से कोई विशेषाधिकार हासिल नहीं था। अगर वे 50 पुलअप लगाते तो मैं भी उनकी बराबरी करती।’’

इस सबके बावजूद इशानी आगे बढ़ने में कामयाब रहीं। उनका मानना है कि उनकी प्रतिबद्धता और दृढ़ निश्चय ने लोगों की बोलती बंद करते हुए उनके प्रति लोगों की सोच को बदला। 18 वर्ष की होने पर इशानी ने हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीटयूट में प्रशिक्षण के लिये दाखिला लिया और यहां पर अपने तकनीकी कौशलों को निखारा और संवारा।

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इसके अलावा इशनी ने राॅक क्लाइंबिंग और अन्य एडवेंचर स्पोर्टस में भी पेशेवर प्रशिक्षण लिया और इसीी वजह से वे दूसरों से आगे रहने में सफल रहती हैं। बीते वर्षों के दौरान उन्होंने भारत के उत्तरी भागों में कई अभियानों का सफल नेतृत्व किया है और सहयाद्रि क्षेत्र में स्थित रास्तों और शिविरों में कई स्थानीय टीमों को लेकर गई हैं।

ये बेहतरीन पहाडि़यां इशानी के लिये एक शिक्षक की भूमिका निभाती आई हैं और इन्होंने ही इशानी को सिखाया है कि प्रृिकत एक तरफ तो बहुत उदार दाता है लेकिन वह बहुत आसानीी से अपना रौद्र रूप दिखा सकती है। इशानी को इसी शिक्षा से संबंधित एक सबक बहुत अच्छी तरह से याद है। वर्ष 2014 में उत्तराखंड में आई विनाशाकारी बाढ़।

उस समय उन्होंने उत्तरकाशी ये अपनी यात्रा प्रारंभ की थी और उनका समूह एक पर्वतारोहण अभियान को प्रारंभ करने के लिये पूरी तरह तैयार था। दुर्भाग्य से चार दिनों तक लगातार मूसलाधार बारिश होती रही और वे लोग चार दिनों तक भयंकर बाढ़ में ही फंसे रहे। वे लोग उस दौरान वास्तव में मौत और विनाश के रास्तों से होकर गुजरे। इशानी बताती हैं, ‘‘उस दौरान हमारे पास नाश्ते में लेने के लिये सिर्फ ब्लैक टी होती थी और रोटी के साथ खाने के लिये उबले हुए आलू। चारों ओर सिर्फ पानी और विनाशलीला फैली थी।’’

कई बार ऐसा समय भी आया जब उन्हें अपने लिये खुद ही रास्ते बनाने पड़े और पहाड़ों पर चड़ना पड़ा क्योंकि जिन पगडंडियों का ये लोग इस्तेमाल करते थे वे नष्ट हो गई थीं। इस दौरान इन्होंने रास्ते में पूरी तरह से तबाह हो चुके चीरान गांवों को देखा। इनके पास सिर छिपाने के लिये कोई जरिया नहीं था और इन्हें रात बिताने के लिये स्थानीय स्कूलों के ताले तोड़कर खुद को जीवित रखने की हर संभव कोशिश की। इशानी याद करते हुए कहती हैं, ‘‘उस समय कुछ समझ मेु नहीं आ रहा था कि क्या करें और हमारा मन, शरीर, दिल और यहां तक कि जूतों के तले भी बिल्कुल फट चुके थे।’’

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इशानी कहती हैं, ‘‘हम लोग द्रौपदी का डंडा (डीकेडी2) के शिखर के बेहद करीब होते हुए भी वहां पहुंचने में नाकामयाब रहे थे।’’ इसके बदले में उन्होंने सोमोरी लेक एडवेंचर पर जाने का फैसला किया।

यह यात्रा मनाली से लेह के सामान्य मार्ग पर न होकर लेह से मनाली की थी। इशानी बताती हैं, ‘‘हम उस रास्ते पर जा रहे अपने एक मित्र अर्चित से मिले और उसकी टीम का एक हिस्सा बन गए। हमने जरूरत के सभी उपकरण, तम्बू, कपड़े, खाद्य पदार्थ इत्यादि उठाये और चल दिये।’’ उस दौरान उन्हें नाश्ते में सिर्फ एक चाय, लंच में दो-दो काजू, बादाम और अखरोट और डिनर में तुरंत पकने वाले नूडल्स या पास्ता मिलता था। इशानी कहती हैं, ‘‘चूंकि हमारे पास मौजूद मानचित्र तीन वर्ष पुराने थे और बाढ़ के चलते नदियों ने अपने रास्ते बदल दिये थे और कई पहाड़ भी अपनी जगह से इधर-उधर हो चुके थे और अब भी हर हफ्ते वहां पर भूस्खलन हो रहे थे इसलिये हमें अपने रास्ते खुद ही तलाशने पड़े। यह वास्तव में हिमालय की शक्ति है और यहां पर ऐसी घटनाएं कभी भी हो सकती हैं। हमें अपने रास्तों को खुद ही तलाशना पड़ा और कुछ को तो दोबारा लिखना पड़ा। कई स्थानों पर तो हमें अपने लिये कैंप भी खुद ही तैयार करने पड़े और मैं इस अनुभव को कभी नहीं भुला सकती।’’

इशानी ने हाल ही में सिक्किम में आयोजित हुई राॅक क्लाइंबिंग ओपन नेश्नल्स में चैथा स्थान पाया है और वे अपने भविष्य के गंभीर अभियानों के लिये एक प्रायोजक की तलाश में लगी हुई हैं।

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