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यंत्र रूपी ‘मानव’ यानी रोबोट के ज़रिये ज़िंदगी को बेहतर और सुंदर बनाने की कोशिश में जुटे ‘आसाधारण मानव’ का नाम है दिवाकर वैश्य

मकानों में साफ़-सफाई का काम हो या फिर कारखानों में माल-ढ़ोने का काम, किसी प्राकृतिक आपदा के बाद मलबे में दबे/फंसे इंसानों को बचाने का काम हो या फिर उस जगह पहुँचाना जहाँ इसान के लिए पहुंचना न मुमकिन हो, इंसान के ज़ज्बातों को समझकर उसकी मदद करना हो या फिर इंसान के मनोरजन के लिए नाचना या गाना ... रोबोट ऐसे यंत्र हैं जो इन दिनों दुनिया-भर में कई तरह के काम कर रहे हैं। इंसान अपने काम को आसान करने और जिंदगी को सुंदर बनाने के लिए तरह-तरह के रोबोट बना रहा है और उनका इस्तेमाल कर फायदा भी उठा रहा है। दुनिया-भर में ऐसे कई काम हैं जिन्हें इंसान नहीं कर रहा बल्कि रोबोट बनाकर उनसे करवा रहा है। जोखिम भरे काम करवाने के लिए भी रोबोट ही बनाये जा रहे हैं। दिलचस्प बात ये भी है कि रोबोट ऐसे कामों के लिए भी बनाये जा रहे हैं जिसकी कल्पना करना भी कईयों के लिए नामुमकिन-सा है। बड़ी बात ये है कि धीरे-धीरे रोबोट मानव-जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं। हकीकत ये भी है कि रोबोट की मदद से तरक्की की रास्ते में आने वाली अड़चनों को भी दूर किया जा रहा है और रोबोट भी समाज/देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कई कारणों से भारत रोबोट की महत्ता और उपयोगिता को समझने में देर लगी। लेकिन, कुछ वैज्ञानिकों और उद्यमियों की पहल और दूरदर्शिता की वजह से भारत में रोबोट का आगमन हुआ और एक नयी ‘रोबोटिक क्रांति’ की शुरूआत हुई। इसी रोबोटिक क्रांति की वजह से ही भारत भी अब अपनी ज़रूरतों के मुताबिक रोबोट बनाकर उनका इस्तेमाल करने लगा है । इस नयी क्रांति को शुरू करने में युवा वैज्ञानिक और उद्यमी दिवाकर वैश्य की काफी बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका है। दिवाकर वैश्य की कामयाबियां नायाब हैं। उनकी सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि उनकी वजह से भारत में रोबोट के इस्तेमाल से होने वाले फायदे के बारे में लोगों ने जानना-समझना शुरू किया। रोबोट को बनाने की प्रक्रिया में तेज़ी आयी। रोबोट के मामले में भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहने की ज़रूरत ख़त्म हो गयी और भारत में स्वदेशी रोबोट बनाने तैयार हुए। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी दिवाकर वैश्य की कामयाबी की कहानी लगातार बढ़ती जा रही है और एक से बढ़कर एक शानदार अध्याय इसमें जुड़ते जा रहे हैं। इस कहानी में जिज्ञासा है, जिज्ञासा को दूर करने के लिए किये गए अनोखे प्रयोग हैं, प्रयोग करने के लिए उठाया गया जोखिम है और जोखिम की वजह से उभरे दर के आगे जीत है। कहानी में मेहनत है, लगन है साथ ही स्वदेशी स्वाभिमान और स्वदेशी जागरण भी।

29th Jan 2017
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इस अनोखी और रोचक कहानी के नायक दिवाकर वैश्य का जन्म 23 जुलाई, 1992 को दिल्ली में हुआ। दिवाकर के पिता का नाम उदय कुमार वैश्य है जबकि माता का नाम माया। उनकी माता सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं जबकि पिता हार्डवेयर इंजीनियर। दिवाकर का एक छोटा भाई भी है। माता-पिता ने दिवाकर का दाखिला पहले जे. डी. टाइटलर स्कूल में करवाया। यहाँ पर दिवाकर ने एलकेजी और यूकेजी के अलावा पहली कक्षा की पढ़ाई की। इसके बाद दिवाकर का दाखिला राजिंदरनगर के बाल भारती पब्लिक स्कूल में करवा दिया गया। छोटी-उम्र से ही दिवाकर वो सब करने लगे थे जो उनकी उम्र के बच्चे करने से डरते है या फिर करना ही नहीं जानते। दिवाकर दूसरे बच्चों से बिलकुल जुदा थे। वैसे तो हर बच्चे में नयी-नयी चीज़ों और नए-नए विषयों के बारे के जानने की इच्छा होती है, लेकिन दूसरे बच्चों की तुलना में दिवाकर में जानने की ये इच्छा बहुत ही तीव्र थी। जिज्ञासु प्रवत्ति के दिवाकर ने छोटी उम्र में ही वो सब काम करने शुरू किये जो कि आम तौर पर बच्चे किया नहीं करते।

दिवाकर के हाथ जोकि नयी वस्तु लगती वो ये जानने की कि कोशिश करते कि वो चीज़ कैसे बनी है और उसके अंदर क्या है? मसलन बचपन में दिवाकर को खेलने के लिए खिलौने दिए जाते थे और दिवाकर हमउम्र के बच्चों की तरह उन खिलौनों से खेलते तो सही लेकिन वे ये जानने की कोशिश भी करते ही वो खिलौना बनाया कैसे गया है। जो खिलौने चलते थे, हलचल करते थे, वे दिवाकर को बहुत आकर्षित करते थे। ये खिलौने चलते कैसे हैं, ये जानने के लिए दिवाकर ने खिलौने तोड़कर ये जानने की कोशिश शुरू की कि आखिर बेजान खिलौने के अंदर ऐसा होता क्या है जिससे वे हरकत में आते हैं। जानने की प्रबल और बेकाबु इच्छा की वजह से दिवाकर ने कई सारे खिलौने तोड़ दिए। शुरू में माता-पिता को लगा कि उनका लड़का शरारती है और इसी वजह से खेल से मन भर जाने पर वो खिलौना तोड़ देता है ताकि उसे नया खिलौना मिल सके। लेकिन, एक घटना ने माता-पिता के होश उड़ा दिए। उन्हें ये अहसास हुआ कि उनका लड़का शरारती नहीं है बल्कि उसमें नयी-नयी चीज़ों के बारे में जानने की उत्सुकता इतनी ज्यादा है कि वो चीज़ों को खोलकर और तोड़कर ये जानता है वे चीज़ें कैसे बनाई गयी हैं और अंदर ऐसा क्या रखा है जिससे वे काम भी करती हैं।

एक दिन दिवाकर का मन टेलीफोन पर जा अटका। उन दिनों उनके मकान में लैंडलाइन फ़ोन हुआ करता था। टेलीफोन के अंदर ऐसा क्या है जिससे लोग दूर बैठे इंसान से भी बात कर सकते हैं, ये जानने के मकसद से दिवाकर ने टेलीफोन को खोलना शुरू किया। जब स्क्रू ड्राईवर से टेलीफोन यंत्र नहीं खुला तब दिवाकर ने उसे ज़मीन पर पटक कर तोड़ दिया। तोड़ने के बाद दिवाकर ने ये जानने की कोशिश की कि टेलीफोन यंत्र में क्या-क्या चीज़ें रखी जाती हैं जिनकी वजह से ये काम करता है। उम्र छोटी थी और कोई बताने वाला भी नहीं था, इसी वजह से तोड़ने के बाद भी दिवाकर ये नहीं समझ पाए कि टेलीफोन यंत्र में जो चीज़ें हैं वे क्या हैं और कैसे काम करती हैं। लेकिन, जैसे ही माता-पिता ने देखा कि उनके लाड़ले के घर की बेशकीमती वस्तु को भी नहीं बक्शा है तब उनमें भी ये जानने की इच्छा जगी कि आखिर दिवाकर वस्तुओं को तोड़ता क्यों हैं। लम्बी पूछताछ, डांट-फटकार और पड़ताल के बाद माता-पिता को पता चला कि उनके लाड़ले में “जिज्ञासा” बड़ी है और वो हर चीज़ के बारे में जानने-समझने की कोशिश करता है और इसी कोशिश में वो खिलौने और दूसरे यंत्र/उपकरण तोड़ देता है। दिवाकर के पिता उन दिनों ए-सेट ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट से जुड़े हुए थे। इसी वजह से उन्होंने ये फैसला कर लिया कि वे दिवाकर को ए-सेट ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट में डालेंगे ताकि उनका लड़का इलेक्ट्रॉनिक्स और इससे जुड़ी वस्तुओं के बारे में जानकारियाँ हासिल कर सकें। पांचवीं कक्षा की परीक्षाएं पूरी होने के बाद दिवाकर को ए-सेट ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट में भर्ती करवाया गया। उन्हें गर्मी की छुट्टियों में होने वाले क्रेश कोर्स के लिए दाखिला दिलवाया गया।

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दिवाकर को अब भी अच्छे से याद हैं ए-सेट ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट के अपने शुरूआती दिन। उन्हें याद है कि उन्होंने इस इंस्टिट्यूट में सबसे पहले करंट यानी बिजली के बारे में जाना और समझा था और फिर धीरे-धीरे बिजली से चलने वाली वस्तुओं के बारे में जाना। कुछ ही दिनों की अंदर दिवाकर का मन इंस्टिट्यूट में पूरी तरह से समां गया । यहाँ उन्हें हर उपकरण/यंत्र खोलने की पूरी आज़ादी थी, और तो और, उन्हें यहाँ यंत्रों के अंदर रखे जाने वाले वस्तुओं के बारे में बताने वाले जानकार लोग भी मौजूद थे। दिवाकर ने एक के बाद एक करके छोटे-बड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बारे में जानना शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में दिवाकर ने सलीके से उपकारों को खोलने का तरीका भी सीख लिया। अब वे उपकरणों को तोड़ते नहीं थे बल्कि सलीके से उन्हें खोलते थे और फिर उनके काम करने से जुड़े तौर-तरीके, तकनीक और विज्ञान को समझने के बाद वे ठीक से बंद भी करने में काबिल हो गए थे। 

तीन सालों में ही दिवाकर ने इतना कुछ सीख लिया था कि वे कई सारे खराब हो चुके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को ठीक करने के काबिल बन गए थे। आठवीं तक पहुँचते-पहुँचते दिवाकर ने कंप्यूटर सिस्टम और लैपटॉप की बारीकियां भी समझ ली थीं। इतना ही नहीं वे अलग-अलग उपकरणों के अलग-अलग पुर्जों को जोड़कर कुछ नयी वस्तुएं भी बनाने लगे थे। अपने बनाये अनोखे और दिलचस्प वस्तुओं को लेकर दिवाकर ने स्कूल और कॉलेज स्तर की कई प्रतियोगिताएं में हिस्सा लिया। उन्होंने अपने ‘आविष्कारों’ अपने स्कूल के लिए कई पुरस्कार जीते। इन पुरस्कारों की वजह से स्कूल को मिल रही ख्याति को ध्यान में रखते हुए प्रिंसिपल एल. वी. सहगल ने दिवाकर को एक अनोखा ईनाम दिया। बस एक बार की गुज़ारिश पर, दिवाकर को स्कूल की ओर से लैपटॉप के साथ-साथ मुफ्त में इन्टरनेट ब्रॉडबैंड कनेक्शन की व्यवस्था की गयी। स्कूल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी विद्यार्थी को इस तरह से अनोखे अंदाज़ में सम्मानित किया गया था।

स्कूल में लैपटॉप और इन्टरनेट की व्यवस्था हो जाने के बाद दिवाकर ने इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया की हर छोटी-बड़ी जानकारी जुटानी शुरू कर दी। दिवाकर ने अपने मन-मस्तिष्क में उथल-पुथल कर रहे सभी सवालों के जवाब भी खंगालने शुरू दर दिए। दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद दिवाकर ने मैथ्स, फिजिक्स और केमिस्ट्री के साथ-साथ बायोलॉजी को भी अपनी पढ़ाई का मुख्य विषय बनाया। लेकिन, स्कूल और कॉलेज में दिवाकर का ध्यान किताबी पढ़ाई-लिखाई में कम और प्रयोगशाला में ज्यादा रहता था। दिवाकर बिना किसी शिकवे और ग्लानी के साथ कहते हैं, “स्कूल और कॉलेज में मैंने ज्यादा समय लैब में बिताया है। मैंने क्लासेस खूब बंक की हैं, लेकिन कोई गलत काम करने के लिए नहीं बल्कि लैब में एक्सपेरिमेंट करने के लिए।”

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इंटर की पढ़ाई के दौरान दिवाकर के मन में एक नया ख्याल आया। ख्याल था- नियमित काम से हटकर कुछ करना, कुछ नया करना और बहुत ही बड़ा करना। उन दिनों स्कूलों में बच्चे अक्सर रोबोट की बातें किया करते थे। रोबोट बच्चों का पसंदीदा विषय हुआ करता था। दिवाकर उन दिनों डिस्कवरी चैनल और नेशनल जियोग्राफी चैनल पर डाक्यूमेंट्री फिल्में भी खूब देखा करते थे। जहाँ दूसरे बच्चे अपना ज्यादा समय कार्टून चैनल देखने में बिताते थे वहीं दिवाकर की दिलचस्पी ज्ञान-विज्ञान की बातें सीखने में थी। ऐसा भी नहीं था कि दिवाकर कार्टून चैनल बिलकुल नहीं देखते थे, जब कभी विज्ञान की बातें सीखते-समझते मन कुछ नया करते को कहता तब वे कार्टून चैनल देखने लग जाते। दिवाकर ने बचपन पर टीवी में कई बार रोबोट के बारे में कई सारी डाक्यूमेंट्री फिल्में भी देखी थीं। दिवाकर को ये जानकर बहुत आश्चर्य हुआ था कि जापान में घर-घर में या तो रोबोट बनाया जाता या या फिर उसका इस्तेमाल होता है। दिवाकर ने टीवी पर देखा था कि जापान में ऐसे रोबोट भी बनाये गए थे जो फुटबाल भी खेलते हैं, नाचते भी हैं और आपस में लड़ाई भी करते हैं। इन्हीं दिलचस्प रोबोट पर दिवाकर का मन आ गया। कुछ नया और बड़ा करने का मन बना चुके दिवाकर को लगा कि उन्हें भी रोबोट पर ही काम करना चाहिए। इस बार दिवाकर ने अपना सारा ध्यान रोबोट पर लगा दिया। इन्टरनेट पर रोबोट के बारे में जानकारियाँ हासिल करनी शुरू की। लाइब्रेरी से किताबें लाकर रोबोट को बनाने के तरीकों के बारे में समझना शुरू किया। जानने-सीखने की इस प्रक्रिया के दौरान दिवाकर हो अहसास हुआ कि रोबोट भी इलेक्ट्रॉनिक यंत्र ही है। रोबोट को को बनने और इस्तेमाल में लाने में भी इलेक्ट्रॉनिक्स के 14 पुर्जों का ही इस्तेमाल होता है। इसके बाद क्या था, दिवाकर ने अपने दम पर रोबोट बनाने का काम शुरू कर दिया।

कड़ी मेहनत और लगन के बल पर दिवाकर ने अकेले अपना रोबोट बना लिया। दिवाकर को रोबोट ‘नाचने वाला रोबोट’ था। दिवाकर से इस आविष्कार ने उन्हें “हीरो” बना दिया था। न्यूज़ चैनल पर लाइव शो हुए, अखबारों में उनकी तस्वीरें छपी। उन दिनों दिवाकर बारहवीं में थे और रोबोट ही उनकी ज़िंदगी बन गए। रोचक बात ये भी है कि किताबी पढ़ाई और बोर्ड की परीक्षाओं को लेकर माता-पिता, दूसरे रिश्तेदारों, सहपाठियों, दोस्तों की बातें सुनकर दिवाकर इतना ऊब गए थे कि उन्होंने जीवन में कुछ मजेदार और बड़ा करने की ठानी थी। इस फैसले ने दिवाकर को नाचने वाला रोबोट डिज़ाइन और प्रोग्राम करने के लिए प्रेरित किया था। हुआ यूँ था कि उनका हर सहपाठी बोर्ड की परीक्षाओं को लेकर तनाव में दिखाई देता था। माता-पिता भी हमेशा बोर्ड की परीक्षाओं की तैयारी पर ध्यान देने की हिदायत देते रहते थे। शुरू से क्लास-रूम में कम और प्रयोगशाला में ज्यादा समय बिताने में दिलचस्पी रखने वाले दिवाकर ने रोबोट बनाकर अपना ध्यान परीक्षाओं से दूर करने में कामयाब रहे थे। मजेदार बात ये भी है कि नाचने वाला रोबोट बनाने के लिए दिवाकर ने अपने पिटे से 5 लाख रुपये मांगे थे। बारहवीं पढ़ रहे लड़के के मूंह से पांच लाख रूपये की मांग सुनकर पिता का सिर चकरा गया था। माँ को बेटे की काबिलियत पर भरोसा था और इसी वजह से उन्होंने पिता को रूपये देने के लिए मनवा लिया था। रोबोट बनाने के ज़रूरी सामान खरीदने के लिए पिता ने दिवाकर को अपना क्रेडिट कार्ड सौंप दिया था। दिवाकर ने भी आगे चलकर अपने माता-पिता को निराश होने नहीं दिया।

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बारहवीं की परीक्षा पास करने के बाद दिवाकर विदेश जाकर रोबोटिक साइंस यानी रोबोट बनाने से जुड़े विज्ञान की पढ़ाई करना चाहते थे। चूँकि वे लाड़ले थे माता-पिता उन्हें अपनी नज़रों से दूर भेजने के इच्छुक नहीं थे। लेकिन, दिवाकर की दिली इच्छा थी कि वे जापान, अमेरिका या इंग्लैंड जाकर रोबोट के वैज्ञानिक बनें। जब दिवाकर को ये समझ में आ गया कि माता-पिता उन्हें भारत में ही पढ़ाने के इच्छुक हैं तब उन्होंने भारत में न पढ़ने के लिए एक तरकीब अपनाई, जो कामयाब नहीं रही। माता-पिता के कहने पर दिवाकर आईआईटी और दूसरे इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिले की योग्यता के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा लिखने तो गए, लेकिन परीक्षा केंद्र में सवालों का जवाब लिखने के बजाय सो गए। परीक्षा केंद्र में जान-बूझकर सोने का मकसद था परीक्षा में अच्छे नंबर न लाना और इन कालेजों में दाखिले की योग्यता हासिल न कर पाना। दिवाकर अपने मकसद में कामयाब भी रहे। उन्हें आईआईटी और दूसरे इंजीनियरिंग कालेजों में सीट नहीं मिली, लेकिन विदेश जाकर पढ़ाई करने का भी उनका सपना पूरा नहीं हो पाया।

बारहवीं पास करने के तुरंत बाद उन्हें अपने ही स्कूल में बच्चों को रोबोट बनाना सिखाने के लिए बतौर ‘मास्टर’ रख लिया गया। जैसे ही दूसरे स्कूल के लोगों को पता चला कि दिवाकर बच्चों को रोबोट बनाना सिखा रहे रहे हैं तब अलग-अलग स्कूलों से उन्हें ‘मास्टर’ बनने के ऑफर मिलने लगे। इन प्रस्तावों से उत्साहित दिवाकर ने अलग-अलग स्कूलों में बच्चों को रोबोट के बारे में बताना और रोबोट बनाना सिखाना शुरू कर दिया। यानी बारहवीं पूरी करते ही दिवाकर को नौकरी मिल गयी थी, नौकरी से उनकी कमाई भी तगड़ी थी। छोटी-उम्र में ही दिवाकर ‘मास्टर’ यानी ‘टीचर’ बन गए थे। जो बच्चे उन्हीं से साथ पढ़ते-लिखते, खेलते-कूदते थे दिवाकर उन्हें को अब पढ़ाने लगे थे। बतौर टीचर भी दिवाकर काफी लोकप्रिय हुए। बच्चों को पढ़ाने का उनका अंदाज़ बिलकुल अलग था। वे किताबी ज्ञान पर कम और प्रयोगों से हासिल होने वाले ज्ञान ज्यादा जोर देते थे। उन्होंने बच्चों को खेल-कूद के ज़रिये पढ़ाना शुरू किया। बच्चों को उन्हीं के हाथों से प्रयोग करवाए ना कि किताबों में लिखी बातें बताकर उन्हें उनके घर भिजवाया। दिवाकर कहते हैं, “मैं तभी स्कूल से निकला था। मैं जानता था कि बच्चों को क्या पसंद है, मैं जानता था कि बच्चे किस बात से बोर होते हैं। मैंने हमेशा बच्चों को रटने वाली पढ़ाई से दूर रखा। मैं बच्चों को वो सब दिखाया जो कि किताबों में होता है। देखकर बच्चे आसानी से सीखते हैं न कि पढ़कर या फिर रटकर।”

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‘रोबोट बनाना सिखाने वाला टीचर’ के तौर पर लोकप्रिय होने के बाद दिवाकर भी ए-सेट ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट से जुड़ गए और वहां रोबोटिक साइंस की ईकाई शुरू करवाई। इस ईकाई में काम करते हुए दिवाकर ने विद्यार्थियों को रोबोट बनाना सिखाने की प्रक्रिया को जारी रखने के साथ-साथ अपने प्रयोग भी जारी रखे। दिवाकर ने रोबोट पर प्रयोग करने शुरू किये और इंसानों की मदद करने वाले रोबोट बनाने पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। दिवाकर ने खेल-खेल में ही फुटबाल खेल वाले रोबोट भी बना डाले। दिवाकर को एक ऐसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेना था जहाँ पर फुटबाल खेलने वाले रोबोट की दरकार थी। पहली बार किसी प्रतियोगिता में पूरी तरह से खुद-ब-खुद फुटबाल खेलने वाले रोबोट मंगवाए गए थे। दिवाकर ने ऐसे रोबोट बनाये थे जोकि गेम शुरू होते ही फुटबाल खेलने लग जाते थे। ये रोबोट ऑटोमेटेड थे यानी स्वचालित। इनमें ऐसी प्रोग्रामिंग की गयी थी कि ये फुटबाल के पीछे भागते और अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ गोल करने की कोशिश करते। किसी कारण से दिवाकर इस प्रतियोगिता में हिसा नहीं ले पाए लेकिन फुटबाल खेलने वाले रोबोट बनाने से उनका उत्साह काफी बढ़ा था।

आगे चलकर दिवाकर ने भारत का पहला ‘थ्री डायमेंशनल ह्यूमनॉयड रोबोट’ यानी मानव रूपी रोबोट भी बनाया। दिवाकर के लिए ये एक बड़ी कामयाबी थी क्योंकि भारत में कई तरह के प्रयोगों के बाद भी कोई वैज्ञानिक 3डी ह्यूमनॉयड रोबोट नहीं बना पाया था, लेकिन युवा दिवाकर ने अपनी प्रतिभा से ये नायाब कामयाबी हासिल की थी। चूँकि ये रोबोट मानव रूपी थे, दिवाकर ने इसका नाम ही रख दिया ‘मानव’। ‘मानव’ नाम वाले मानव रूपी स्वदेशी रोबोट की चर्चा देश-भर में हुई, और इसे बनाने वाले दिवाकर की खूब तारीफ़ भी की गयी। ‘मानव’ ने एक मायने में रोबोट की दुनिया में भारत के दमदार आगाज़ का शंखनाद किया था। ‘मानव’ की एक नहीं कई खूबियाँ थीं। अगर इसके आकार की बात की जाय तो ये 60 सेंटीमीटर लंबा है और वज़न इसका करीब दो किलो का। ‘मानव’ को 3-डी प्रिंटर की मदद से भारतीय प्रयोगशाला में बनाया गया है। ‘मानव’ की एक बड़ी खूबी ये भी है कि इसके पुर्ज़ों को किसी फैक्ट्री में नहीं बल्कि कंप्यूटर में फ़ीड किए गए डिज़ाइन से बनाया गया है। दिवाकर कहते हैं कि उनका ‘मानव’ इंसान नहीं है लेकिन इंसान की तरह ही कई काम कर सकता है। इस युवा वैज्ञानिक के शब्दों में, “मैंने ‘मानव’ ने बहुत कुछ ऐसे काम करवाना चाहता हूँ जिससे इंसान की ज़िंदगी आसान बने। मेरा ‘मानव’ इंसान की मदद करने के मकसद से बनाया गया है और इसमें अभी कई तरह के काम होने बाकी हैं।”

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दिवाकर ने अपनी प्रयोगशाला में कई तरह के आविष्कार किया हैं। नयी-नयी चीज़ों का आविष्कार करने की ये प्रक्रिया अब भी जारी है। महत्वपूर्ण बात ये है कि दिवाकर ने उन्होंने हमेशा यही सोचा है कि वे अपने आविष्कारों से लोगों की मदद कैसे कर सकते हैं। इसी सोच ने उन्होंने लकवे का शिकार हुए शक्तिहीन लोगों की मदद करने के लिए काम करने को प्रेरित किया। दिवाकर ने अपने साथियों की मदद से एक ऐसा आविष्कार किया जिसकी मदद से लकवे का शिकार लोगों को एक जगह से दूसरी जगह जाने में मदद मिलती है। दिवाकर ने लकवे का शिकार लोगों की मदद के लिए 'माइंड कंट्रोल्ड व्हील चेयर' बनाई। उनका दावा है कि ये व्हील चेयर दुनिया में अपने किस्म की पहली व्हील चेयर है। ये व्हील चेयर खासतौर पर उन लोगों की मदद के लिए बनाई गयी है, जिनके शरीर की मांसपेशियां काम करना बंद कर चुकी होती हैं। मरीज सिर्फ अपनी पलकें से इस व्हील चेयर को चला सकते हैं। यानी अगर कोई लकवाग्रस्त इंसान अपनी आखों की पलकें झपका सकता है तो सिर्फ पलकों की मदद से ही वो इंसान इस व्हील चेयर को चला भी सकता है। इस व्हील चेयर को चलाने के लिए हाथ, या फिर पाँव को हिलाने की ज़रुरत नहीं होती सिर्फ पलकों से इसे चलाया जा सकता है। दिवाकर की बनायी ये व्हील चेयर पूरी तरह से इंसानी दिमाग से चलती है। इसे चलाने के लिए मरीज/इंसान को अपनी सोच से संकेत/आदेश देना होता है। महत्वपूर्ण बात ये भी है कि इस व्हील चेयर में दूरी यानी डिस्टेंस, तापमान, समय और सिरहन यानी वाइब्रेशन का पता लगाने ले लिए भी सेंसर/यंत्र भी लगाये गए हैं। इसी वजह से ये व्हील चेयर मरीज/ इंसान की सोच के मुताबिक काम करती है। गौरतलब है कि विश्वविख्यात वैज्ञानिक और विचारक स्टीफन हाकिंग अपनी व्हील चेयर को उंगलियों की मदद से चलाते हैं जबकि दिवाकर की बनाई व्हील चेयर को सिर्फ पलकों की मदद से चलाया जा सकता है। ये व्हील चेयर सिर्फ लकवे का शिकार मरीजों के लिए ही नहीं बल्कि दिव्यांग जनों के लिए भी काफी मददगार साबित हो सकती है।

दिवाकर ने ‘ह्यूमन सेंस रिडिग’ रोबोट भी बनाया है, यानी वो रोबोट जो इंसान की रूचि को जान लेता है। अगर आप एक बार इस रोबोट में ये जानकारी फीड कर दें कि आपको क्या पसंद है और क्या नापसंद तो ये हमेशा वो जानकारी अपने पास रख लेता है। मान लीजिये कि अगर किसी इसांन को प्यास लगी है और प्यास लगने का संकेत रोबोट की प्रोग्रामिंग में फीड है तब वो इंसान की बुद्धि और उसके सेन्स को समझकर पानी लेकर आता है। दिवाकर इस ‘ह्यूमन सेंस रिडिग’ रोबोट पर पाने प्रयोग जारी रखे हुए हैं और इस तरह के रोबोट का सबसे उपयोगी और आधुनिक रोबोट बनाने की तैयारी में हैं। दिवाकर ने भारतीय सेना की मदद के लिए भी एक विशेष रोबोट बनाया है। इस रोबोट का नाम ‘वर्सटाइल’ है। ये रोबोट एक मानव रहित वाहन है जो ज़मीन की स्थिति के हिसाब से अपना आकार बदल लेता है और सामानों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में सेना की मदद करता है। इस रोबोट से दुश्मनों के मंसूबों कर पानी फेरने में मदद मिलती है।

गौरतलब है कि दिवाकर ने अब तक जितने भी रोबोट बनाये है वे सभी स्वदेशी हैं। दिवाकर के सभी लोकप्रिय और बड़े रोबोट आविष्कारों की परिकल्पना भारत में हुई। इतना ही नहीं इन रोबोट की प्रोग्रामिंग भी भारत में ही हुई और उन्हें भारत की प्रयोगशालाओं में भारतीयों द्वारा ही तैयार किया गया। दिवाकर के आविष्कार ‘मेक इन इंडिया’ अभियान की कल्पना/परिकल्पना में सटीक बैठते हैं। दिवाकर की कामयाबी सिर्फ स्वदेशी रोबोट बनाने तक ही सीमित नहीं रही है। उन्होंने विद्यार्थियों में रोबोटिक साइंस के प्रति दिलचस्पी को बढ़ाया है, भारतीयों को भारत में भारत की आवश्यकता के अनुसार रोबोट बनाने के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित किया है और भारत में एक नयी ‘रोबोटिक क्रांति’ की शुरूआत की है जिससे भारत में भी रोबोट को बनाने और उनसे ज़िंदगी को आसान बनाने की प्रक्रिया ने गति पकड़ी है। 

रोचक बात ये भी है कि जिस आईआईटी और इंजीनियरिंग कालेजों में जाने से बचने के लिए दिवाकर प्रवेश परीक्षा के दौरान परीक्षा केंद्र में सो गए थे, आज उन्हीं बड़े शिक्षा संस्थान से संचालक उन्हें बुलवाकर विद्यार्थियों को पढ़ाने का अनुरोध करते हैं। दिवाकर कई सारे आईआईटी और देश के अन्य बड़े शिक्षा संस्थानों में रोबोट के बारे में विद्यार्थियों को लेक्चर दे चुके हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों, शिक्षा संस्थाओं में जाकर लोगों को खासकर विद्यार्थियों को रोबोट बनाने से जुड़े विज्ञान की जानकारी देने का दिवाकर का काम बिना रुके जारी रहता है। वे या तो अपनी प्रयोगशाला में नए रोबोट बना रहे होते हैं या फिर किसी संस्थान में लोगों को रोबोट बनाने के विज्ञान के बारे में बता रहे होते हैं। दिवाकर ने बताया कि जब उन्हें पहली बार आईआईटी-रूड़की से बुलावा आया था तब वे बहुत खुश हुए थे। उनकी खुशी उस समय आसमान छू गयी थी जब आधे घंटे के लिए तय उनका कार्यक्रम तीन घंटे से ज्यादा समय तक चला था। सिर्फ विद्यार्थी ही नहीं बल्कि आईआईटी के प्रोफेसर भी दिवाकर को सुनने आये थे और सभी ने रोबोट में काफी दिलचस्पी दिखाई थी। दिवाकर कहते हैं, “वो दिन मेरी ज़िंदगी का एक बेहद ख़ास दिन था। इस दिन मैंने फैसला कर लिया था मैं अपना जीवन रोबोट को समर्पित कर दूंगा। मुझे ये जानकार भी बहुत आश्चर्य हुआ था कि भारत में बड़े-बड़े विद्वानों को रोबोट के बारे में जानकारी नहीं है। मुझे इस बात का भी अहसास हुआ था कि रोबोट हम सभी की ज़िंदगी का हिस्सा बन सकते हैं और रोबोट हमारी ज़िंदगी में आकर उसे और भी बेहतर बना सकते हैं।” 

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दिवाकर इन दिनों ऐसे रोबोट बनाने की तैयारी में जुटे हैं जोकि घर-मकान में लोगों की मदद कर सके। दिवाकर ने बताया कि वे ऐसे स्वदेशी रोबोट बनाने की कोशिश में हैं जो घर से सभी काम कर सकता हो, जैसे .. घर की सफाई करना, बच्चों का ख्याल रखना ... यानी एक ऐसा मानव रूपी यंत्र जो मानव का मददगार हो। दिवाकर का सपना है कि वे ऐसे रोबोट बनाएं जो इंसान को ज़िंदगी बेहतर और आरामदेय बनाने में मदद कर सकें, इतना ही नहीं इन रोबोट की कीमत लोगों की पहुँच में रहे और ये बाज़ार में आसानी से मिल सकें। दिवाकर कहते हैं, “भारत में अब भी कई रोबोट इस्तेमाल में लाये जा रहे हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर विदेशी हैं, लेकिन मेरा सपना है भारत में स्वदेशी रोबोट का इस्तेमाल हो। और मेरा सबसे बड़ा सपना है कि हर भारतीय के घर में रोबोट का इस्तेमाल हो ताकि ज़िंदगी और भी सुन्दर बन सके।

इस युवा वैज्ञानिक को भारत में दो बातों से बड़ी शिकायत है। पहली बात – सरकार और प्रशासन से जुड़े लोगों की ये मानसिकता कि भारत में बड़े आविष्कार हो ही नहीं सकते, भारतीय लोग, ख़ास तौर पर वैज्ञानिक दूसरों को देखकर ही कुछ बना और अपना सकते हैं। दूसरी बात – भारत में उद्यमियों की कमी। दिवाकर का कहना है कि ज्यादातर भारतीय युवा नौकरी करना चाहते हैं, वे उद्यमी बनना नहीं चाहते। जिस दिन भारतीय युवा नौकरी करने की चाह छोड़कर लोगों को नौकरियाँ देने वाली कंपनियां खोलने की सोचेंगे उसी दिन से भारत में नए-नए आविष्कार होने शुरू होंगे और भारतीय अपनी समस्याओं को खुद दूर करने में सक्षम बन जाएंगे।

गौरतलब है कि भारत में रोबोट बनाने की प्रक्रिया तेज़ हुई है, लेकिन भारत अभी भी रोबोट के मामले में जापान, अमेरिका, साउथ कोरिया और यूरोप के कई सारे देशों से काफी पीछे है। लेकिन, दिवाकर जैसे वैज्ञानिक भारत को रोबोटिक्स के क्षेत्र में भी विकसित देशों के बराबर ला खड़ा करने की पुरजोर कोशिश में जुटे हैं। इन्हीं कोशिशों की एक बड़ी कामयाबी ये है कि भारत में सरकार, उद्योग और आम लोगों को भी रोबोट के महत्त्व और उसके उपयोग के बारे में पता चल गया है और रोबोट की मांग बढ़ने लगी है। 

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