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परीक्षा के तीन साल

आन्तरिक सुरक्षा के मौजूदा माहौल के साथ-साथ इस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर मोदी सरकार की कश्मीर नीति क्या है? ऐसे ही सवाल पाकिस्तान नीति को लेकर भी उठ रहे हैं। वन रैंक वन पेंशन और सेना में सातवें वेतन आयोग के निर्धारण में विसंगतियों के बरक्स सरकार का रवैया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृष्टि से मेल खाता नहीं दिखाई देता है। ये सवाल सरकार की साख पर असर डालने और हतबल विपक्ष को बल देने वाले हैं।

26th May 2017
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26 मई 2014 को सत्तारूढ़ हुई मोदी सरकार ने तीन साल पूरे कर लिये हैं। जहां एक ओर मोदी सरकार तीन साल की अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने की तैयारी कर रही है, वहीं स्वाभाविक रूप से सरकार के साथ विपक्षी दल भी ये तैयारी कर रहे होंगे कि कैसे मोदी सरकार के तीन साल के कामकाज को खारिज करते हुए जनता को बताया जाए कि ये सरकार सभी मोर्चों पर विफल रही।

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दीगर है कि 'सबका साथ सबका विकास' के नारे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार पर तीन साल के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा। सत्ता संभालते ही 'ना खाउंगा न खाने दूंगा' का एलान करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार और कालेधन पर रोक लगाने के लिए न केवल नोटबंदी के जरिये पांच सौ और एक हजार के नोट पर रोक लगाने का ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाया बल्कि बेनामी संपत्ति पर रोक लगाने और रियल एस्टेट कारोबार में पारदर्शिता लाने का कानून बनाया।

मोदी सरकार ने नए भारत के निर्माण का संकल्प व्यक्त किया और सरकार की कार्य संस्कृति बदलने तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दिशा उन्होंने कई साहसिक निर्णय लेकर आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। इनमें नोटबंदी, जीएसटी, रेल बजट को आम बजट में मिलाना, बजट पेश करने के समय बदलना तथा पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक अहम हैं। लेकिन पाकिस्तान, कश्मीर, महंगाई, बेरोजगारी और विदेशों से काला धन वापस लाने जैसे मसलों पर कोई सफलता नजर नहीं आई।

मोदी सरकार पर अभी तक भ्रष्टाचार के एक भी गंभीर आरोप नहीं लगे हैं। बल्कि उसने कोयला ब्लॉक आबंटन रद्द करने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद 67 कोयला ब्लॉक की पारदर्शी और समयबद्ध नीलामी सुनिश्चित करके और आबंटन की प्रक्रिया के तहत 3.35 लाख करोड़ रुपए जुटाकर अपने ईमानदार होने का सबूत दे दिया है। भ्रष्टाचार पर अंकुश रखने के उद्देश्य से उसने जन धन मिशन के तहत करोड़ों लोगों को बैंक खाता खुलवाने के लिए प्रेरित किया और उसका नतीजा यह हुआ कि अब तक 13 करोड़ से अधिक बैंक खाते खुल चुके हैं।

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मोदी सरकार ने नए भारत के निर्माण का संकल्प व्यक्त किया और सरकार की कार्य संस्कृति बदलने तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दिशा उन्होंने कई साहसिक निर्णय लेकर आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। इनमें नोटबंदी, जीएसटी, रेल बजट को आम बजट में मिलाना, बजट पेश करने के समय बदलना तथा पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक अहम हैं। लेकिन पाकिस्तान, कश्मीर, महंगाई, बेरोजगारी और विदेशों से काला धन वापस लाने जैसे मसलों पर कोई सफलता नजर नहीं आई। ये सही है कि मोदी सरकार की उज्ज्वला, मुद्रा, जन-धन जैसी कई योजनाओं ने असर दिखाया है, लेकिन रोजगार के नये अवसरों का सवाल तीन साल बाद और बड़ा सवाल बन गया है। इसी तरह कोई इस सवाल का जवाब देने वाला नहीं दिखता कि तीन साल में गंगा कितनी साफ हुई? ऐसे सवालों के साथ केन्द्रीय सत्ता के समक्ष कई नयी-पुरानी चुनौतियां मुंह बाएं खड़ी हैं। मोदी सरकार और भाजपा के नीति-नियन्ताओं को इन चुनौतियों का भान होना चाहिए।

आज यदि नक्सलियों की चुनौती और कश्मीर में बिगड़ती स्थितियों को लेकर खुद भाजपा समर्थक मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। आन्तरिक सुरक्षा के मौजूदा माहौल के साथ-साथ इस पर भी सवाल उठ रहे हैं, कि आखिर मोदी सरकार की कश्मीर नीति क्या है?

वैसे मोदी सरकार की कार्यशैली के बरक्स समूचा विपक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई पड़ रहा है। एक के बाद एक चुनावों में पराजय के सिलसिले ने विपक्ष को हताश सा कर दिया है। वे ये भी समझ चुके हैं कि अब इस तरह के बचकाना सवालों से बात नहीं बनने वाली कि 'आखिर अभी तक हमारे खाते में 15 लाख रुपये क्यों नहीं आए?' किंतु विपक्ष की पतली हालत के बावजूद मोदी निश्चिंत नहीं हो सकते। इसलिए और भी नहीं कि तीन साल में जो कुछ नहीं हो सका उसे शेष दो साल में पूरा करने की कठिन चुनौती है। इस खुशफहमी में रहना ठीक नहीं कि दिशाहीन और लस्त-पस्त विपक्ष भाजपा का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं।

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इससे इंकार नहीं कि उत्तर प्रदेश में प्रचण्ड जीत हासिल करने के बाद जब दिल्ली नगर निगम चुनावों में भाजपा ने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को उनकी राजनीतिक हैसियत दिखाई तो मोदी का कद और बड़ा दिखने लगा और वे अपराजेय से नजर आने लगे, लेकिन 24 अप्रैल को सुकमा में सीआरपीएफ के 25 जवानों की शहादत और एक मई को कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर दो जवानों की नृशंस हत्या के बाद परिदृश्य जिस तरह यकायक बदला उससे यही रेखांकित हुआ, कि किस तरह देखते ही देखते अनुकूल हालात प्रतिकूल रूप ले लेते हैं। इस एक सप्ताह ने यही बताया कि राजनीति में एक हफ्ता बहुत होता है। आज यदि नक्सलियों की चुनौती और कश्मीर में बिगड़ती स्थितियों को लेकर खुद भाजपा समर्थक मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता।

आन्तरिक सुरक्षा के मौजूदा माहौल के साथ-साथ इस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर मोदी सरकार की कश्मीर नीति क्या है? ऐसे ही सवाल पाकिस्तान नीति को लेकर भी उठ रहे हैं। वन रैंक वन पेंशन और सेना में सातवें वेतन आयोग के निर्धारण में विसंगतियों के बरक्स सरकार का रवैया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृष्टि से मेल खाता नहीं दिखाई देता है। ये सवाल सरकार की साख पर असर डालने और हतबल विपक्ष को बल देने वाले हैं।

मोदी सरकार को ये याद होना चाहिए कि बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान दादरी काण्ड के साथ-साथ अवार्ड वापसी अभियान किस तरह उस पर भारी पड़ा था। कई बार अप्रिय घटनाओं का सिलसिला इतनी तेज गति पकड़ता है कि उन्हें थामने में जब तक सफलता मिलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उनके लगातार प्रयासों से देश नकदी रहित लेनदेन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा। ये ठीक है कि भ्रष्टाचार दूर करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए, लेकिन वे अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर पाई है जिससे उसे विपक्ष की आलोचना झेलनी पड़ रही है। विपक्ष में रहते आधार संख्या का विरोध करती रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सत्ता में आने के बाद आधार को कानूनी जामा पहनाया और पैन कार्ड के साथ अपनी सभी योजनाओं को इससे जोड़ दिया। इसके कारण निजता के हनन और व्यवहारिक दिक्कतों के चलते इसका विरोध हो रहा है और ये मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंच गया जहां अभी इस पर अंतिम फैसला आना बाकी है।

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संक्षेप में कहें तो केंद्र सरकार के तीन सालों में मोदी का तिलिस्म और मजबूत हुआ है। विपक्ष बिखरा है तो जन मानस की उम्मीदें भी पशोपेस में है। लिहाजा शेष दो वर्ष मोदी सरकार के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण होने जा रहे हैं। 

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