'Uolo', बच्चों के माता-पिता और स्कूल टीचर्स के बीच की मजबूत कड़ी

    By Bhagwant Singh Chilawal
    July 06, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
    'Uolo', बच्चों के माता-पिता और स्कूल टीचर्स के बीच की मजबूत कड़ी
    Uolo से साकार किया घर से ही माता-पिता और अध्यापक के बीच संपर्क Uolo फिलहाल बैंगलोर और हैदराबाद में, 150 से भी ज्यादा प्री-स्कूलों से जुड़ा हैUolo का अगला कदम K12 है
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    बचपन के दौरान, माता पिता अपने बच्चों की भलाई और भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं| अंकुर पाण्डेय और बद्रीश अग्रवाल ने महसूस किया कि, प्री-स्कूल में छोटे बच्चों के माता-पिता और अध्यापक के बीच में संपर्क गायब हो चुका है| इस अंतर को भरने के लिए इन दोनों ने रास्ता निकला, क्योकि ये दोनों भी इस समस्या से गुजर चुके थे| 2013 में इन्होंने ‘the Uolo’ लॉन्च किया | बद्रीश कहते हैं –“ हम माता-पिता के फ़ोन कॉल और डायरी व्यवस्था को हटा कर, मोबाइल के माध्यम से इसे आसान बनाना चाहते थे, जहाँ पर माता-पिता अपने समय के अनुसार संपर्क कर सकते है|”

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    ‘योलो’ ने पारम्परिक डायरी व्यवस्था को स्मार्टफ़ोन एप्लीकेशन में बदल दिया है, जो बच्चों की उपस्थिति, उन्नति और स्थान के बारे में बताता है| कंपनी ‘कनेक्टईज़(KonnectEz)’ के द्वारा बैंगलोर और हैदराबाद में, 150 से भी ज्यादा प्री-स्कूलों से जुड़ी हुई हैं| इसके माध्यम से बच्चों, कर्मचारियों और बच्चों की देखभाल करने वालो की जानकारी दी जाती है| अंकुर कहते हैं- “हमारा मानना है कि बच्चों की शिक्षा उनके माता-पिता और प्री-स्कूल के बीच के संबंध पर निर्भर करती है| हम स्कूलों में, प्रशासनिक कार्य को कम करके बच्चों पर केंद्रित करने की अनुमति देते हैं|”

    बद्रीश, जो आइआइएम(IIM) अहमदाबाद से एमबीए करने से पहले MNCs में टेक्निकल आर्किटेक्ट के रूप में कार्य कर चुके हैं, कहते हैं– “स्कूलों के साथ हिस्सेदारी होने के कारण, कनेक्टईज़(KonnectEz) को उपयोग करने के लिए माता-पिता को सालाना कुछ रुपये देने होते हैं|” वही दूसरी तरफ अंकुर ने सेमीकंडक्टर कंपनियों में काम किया है उसने सिनसिनाटी विश्वविद्यालय से एमएससी(MSc) कंप्यूटर इंजीनियरिंग से और एमबीए(MBA) इंडियन स्कूल ऑफ़ बिज़नस से किया है|

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    एक अच्छे इंजीनियर के रूप में नियुक्त होना मुश्किल था| दोनों ही अपने टेक्निकल पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा कर काम करते हैं| अंकुर कहते हैं– “शुरुआत से ही उत्पाद को अच्छी प्रतिक्रिया मिली और कुछ स्कूलों ने इसे अपना लिया और इन स्कूलों के मालिकों और प्रबंधकों द्वारा इसकी प्रशंसा ने इसे और भी लोकप्रिय बना दिया| इस उत्साह ने हमें काम करने के लिए और प्रेरित किया|”

    संपर्क से भी आगे

    बैंगलोर स्थित कंपनी ने पिछले साल शुरुआत में निवेशको के माध्यम से रूपया लगाया| बद्रीश कहते हैं- “जिसके माध्यम से हमें दूसरें शहरों में भी इसको शुरू करने में मदद मिलती है|” कनेक्टईज़ मोबाइल मंच है| जिसके द्वारा माता-पिता को मोबाइल ऐप से सूचना दी जाती है| योलो की मोबाइल ऐप से माता-पिता अध्यापक से बातचीत कर सकते है और अध्यापक बच्चों की फोटो और गतिविधियों को शेयर कर सकते है| जो बाद में बच्चों की फोटो एल्बम बन जाती है|

    मंजिले और भी

    अंकुर कहते हैं- “प्री-स्कूलों में कम competitor हैं|” हालाकि ‘योलो’ मुंबई स्थित ‘नीट ऐप’ और ‘बेबीचक्र’ जैसी स्थापित कम्पनियों से बराबरी कर रहा हैं| स्कूलों में भी संचार का माध्यम सही नही हैं| ‘सुसाना’, जो की न्यू जर्सी में मोंटक्लैर स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है , अपने पेपर “कंप्यूटर के माध्यम से माता-पिता और अध्यापक के बीच संपर्क ” में टेक्नोलॉजी के महत्व को बताया है|

    योलो का अगला कदम K12 है| बद्रीश कहते हैं- “कोई भी शिक्षा प्रणाली ऐसी नही है जो हमारी तरह बच्चों, अध्यापकों और माता-पिता के बीच पुल का काम करें और यह चीज हमें तेज़ी के साथ काम करने में मदत करेगी|”

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