आइवीएफ रिवॉल्यूशन से भारत में तैयार हो रही है नई तरह की मशीनी पीढ़ी

By जय प्रकाश जय
September 09, 2019, Updated on : Tue Sep 10 2019 11:08:03 GMT+0000
आइवीएफ रिवॉल्यूशन से भारत में तैयार हो रही है नई तरह की मशीनी पीढ़ी
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"भारतीय संस्कृति में मां का रिश्ता सबसे ऊंचा होता है। मनोरंजन प्रधान आधुनिकता में नई पीढ़ी के लिए रिश्ते के देहवादी मायने प्राथमिक बना दिए गए हैं- खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ। ऐसे दौर में नई तरह की पीढ़ी तैयार कर रहे आइवीएफ रिवॉल्यूशन का विश्व-बाजार कुछ ही वर्षों में 36.2 बिलियन डॉलर तक पहुंचने वाला है।"

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सांकेतिक फोटो (Shutterstock)



दाम्पत्य संबंधों को लेकर देश में चुपचाप एक आश्चर्यभरा बड़ा परिवर्तन दबे पांव पूरी आबादी में मजबूती से अपना अस्तित्व फैलाता जा रहा है, और वह है आइवीएफ (विट्रो फर्टिलाइजेशन) रिवॉल्यूशन। अब तक क़रीब 80 लाख बच्चे इस तकनीक के ज़रिए दुनिया में आ चुके हैं। एक रिसर्च के मुताबिक, साइंस की इस अत्याधुनिक देन का नतीजा भविष्य में भारत में इस तरीक़े से पैदा हुए बच्चों की तादाद में भारी इज़ाफ़े के रूप में देखने को मिल सकता है। भविष्य में बीस से चालीस आयुवर्ग के ज्यादातर दंपति, संतान के लिए इसी तकनीक का इस्तेमाल करने के लिए बहुतायत में अग्रसर होने वाले हैं।


डबलिन (आयरलैण्ड) की 'बिजनेस वायर' पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि विट्रो फर्टिलाइजेशन का वैश्विक बाजार आगामी कुछ ही वर्षों में 36.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हो जाएगा। दुनिया के पहले आईवीएफ शिशु लुइस ब्राउन का जन्म 25 जुलाई, 1978 को ब्रिटेन में हुआ था। भारत की पहली आईवीएफ शिशु का नाम दुर्गा है। उसके बाद से विश्वभर में हर वर्ष लगभग साढ़े तीन लाख बच्चों का जन्म इस तकनीक से हो रहा है, जो हर साल जन्म लेने वाले 13 करोड़ बच्चों का 0.3 फीसदी है। समाज विज्ञानियों एवं इस विषय के शोध वेत्ताओं का कहना है कि भारत में बड़ी खामोशी से मेडिकल साइंस के सहारे अंदरखाने हो रहा इस तरह का बदलाव भविष्य में पूरी आबादी की सांस्कृतिक चेतना पर हावी पुरुष वर्चस्व की जड़ें झकझोर कर रेख देगा। 


इस तकनीक पर दशकों तक रिसर्च किया जाता रहा है, जो आज भी जारी है। मेडिकल साइंस की देन हैं आईवीएफ़ और टेस्ट ट्यूब, जिसके जरिए कोई भी निःसंतान महिला संतानवती हो सकती है। संतान के इच्छुक दंपतियों अथवा सिंगल मदर्स के लिए यह तकनीक महंगी जरूर है लेकिन दस-बारह साल पहले तक आईवीएफ का ख़र्च तीन से पांच लाख रुपए रहा है, जो अब मात्र एक-दो लाख रुपए रह गया है।





पेकिंग यूनिवर्सिटी और हावर्ड यूनिवर्सिटी के मेडिकल साइंटिस्ट के मुताबिक, यदि सेहतमंद भ्रूण का पता लगाने के लिए नई स्क्रीनिंग विधि का इस्तेमाल किया जाए तो आईवीएफ को 60 फीसदी ज़्यादा सफल बनाया जा सकता है। चीन में इस प्रक्रिया का परीक्षण किया गया है और इसके नतीजों ने ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए नई संभावनाएं पैदा की हैं। एक रिसर्च के मुताबिक, विश्व में लगभग पंद्रह फीसदी जोड़े ऐसे होते हैं, जो संतान पैदा करने में शारीरिक रूप से सक्षम नहीं, जिनके लिए मेडिकल साइंस की यह खोज किसी वरदान से कम नहीं। 


पिछले दो दशक में आइवीएफ, आर्टिफीसियल इनसेमिनेशन, गमेटेस इंटरा फैलोपियन ट्रान्सफर, इंट्रा सैटोप्लास्मिक इंजेक्शन, सरोगेसी, डोनर एग ट्रीटमेंट आदि टेक्नोलॉजी के जरिये भारत में इसके बाज़ार ने बहुत ही तेज़ी से ग्रोथ किया है। इसकी एक खास वजह है, आज भारत में 15 प्रतिशत आबादी इनफर्टिलिटी की शिकार है। करियर की अंधी दौड़, तनाव, डिप्रेशन, मोटापा, डायबिटीज आदि ने भी बढ़ती उम्र के साथ लोगों को इनफर्टिलिटी का शिकार बनाया है। आमतौर से आइवीएफ पर दस हजार डॉलर तक खर्च होता है लेकिन हमारे देश में अब ये तीन-चार सौ डॉलर में हो जा रहा है।





इंडियन मेडिकल एंड रिसर्च काउंसिल की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में उम्र के साथ-साथ प्राकृतिक तरीके से प्रिग्नेंट होने की संभावना कम होती जा रही हैं। 35 से नीचे यह दर 47.6 प्रतिशत, 35 से 37 साल की उम्र में 38.9 फीसदी, 38 से 40 साल की उम्र में 30.1 और 41 से 42 साल की उम्र में 20.5 फीसदी हो चुकी है। भारत में अब कॅरियर के दबाव में ज्यादा उम्र में शादी भी नि:संतानता दर में वृद्धि की एक बड़ी वजह बताई जा रही है। महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी उसी अनुपात में इनफर्टिलिटी का शिकार हो रहे हैं, जबकि उनमें से एक प्रतिशत दंपति ही समय रहते इसका इलाज करा रहे हैं।


एक शब्द है 'मां'। आज की एडवांस टेक्नोलॉजी यानी तरक्कीपसंद मशीनी ज़माने, ग्लोबलाइजेशन, देश की परिधि में रोजगार की घटती संभावनाओं के कारण अंतरदेशीय बसावटों ने हर तरह के रिश्तों के मायने बदल दिए हैं। हमारी फैमिली कल्चर में मां का रिश्ता सबसे ऊंचा महत्व रखता रहा है। शिशु की अगवानी में एक मां के नौ माह गुजर जाते हैं। इस दौरान दंपति के जीवन में घर-परिवार, समाज के साथ रिश्ते की गर्माहट और मिठास देश के लिए आदिकाल से जीवन में जिस पारंपरिक संस्कृति का बीजारोपण करती आ रही है, आइवीएफ उसके लिए एक कठोर वर्जना की तरह है।


यह भी आज की बाजारवादी मेडिकल साइंस की ही एक नकारात्मक देन है कि ज्यादातर डिलीवरी केस ऑपरेशन के लिए विवश कर दिए गए हैं। आइवीएफ की देन को पारंपरिक अथवा पुरातन सोच से ठुकराया भले न जाए लेकिन मशीनीकृत संतानों के मन-मिज़ाज में प्राकृतिक सहजता के अभाव और व्यवहार में एक अजीब तरह की भिन्नता से इनकार भी नहीं किया जा सकता है। इस मशीनीकृत ज़माने ने ही 'मां' के रिश्ते को भी तकनीक के तराजू पर धर दिया है। मनोरंजन प्रधान आधुनिक कल्चर में नई पीढ़ी के लिए रिश्ते के देहवादी मायने ही प्राथमिक हो चुके हैं।