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कॉलेज स्टूडेंट्स के लिए शुरू किया फूडटेक स्टार्टअप, तेज़ी से हो रहा लोकप्रिय

इंजीनियर/ब्लॉगर अपने स्टार्टअप के माध्यम से इस तरह मिटा रहा है स्टूडेंट्स की भूख...

24th Jul 2018
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शहर के बाहरी हिस्सों में स्थापित शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स की ज़रूरतों का ख़्याल करते हुए अमित रंजन ने इंदौर से अपने स्टार्टअप, 'कैंपस खाना' की शुरूआत की। अमित मानते हैं कि इन स्टूडेंट्स के पास खाने-पीने के लिए विकल्प न के बराबर होते हैं, जिस वजह से उनका दैनिक जीवन काफ़ी चुनौतीपूर्ण हो जाता है और इस समस्या का उनकी पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ता है।

कैंपसखाना के को फाउंडर्स अमित रंजन और मोनिका दुआ

कैंपसखाना के को फाउंडर्स अमित रंजन और मोनिका दुआ


कैंपस खाना के को-फ़ाउंडर अमित का कहना है कि उनका स्टार्टअप, एक टेक्नॉलजी फ़र्म है, जो रेस्तरां, फ़्रूट और ग्रॉसरी स्टोर्स और अपने क्लाइंट्स के बीच सुविधाओं का आदान-प्रदान सुनिश्चित करता है।

स्टार्टअप: कैंपस खाना (CampusKhana)

फ़ाउंडर्स: अमित रंजन और मोनिका दुआ

शुरूआत: 2015

जगह: इंदौर

काम: शिक्षण संस्थानों में फ़ूड आइटम्स, फलों और ग्रॉसरी आइटम्स की डिलिवरी

सेक्टर: फ़ूडटेक

फ़ंडिंग: बूटस्ट्रैप्ड

फ़ूडटेक स्टार्टअप की डिलिवरी सर्विसेज़ छोटे और बड़े सभी तरह के शहरों में आमबात हो चली है, लेकिन अभी भी छोटे शहरों के बाहरी हिस्सों तक इन स्टार्टअप्स की पहुंच नहीं बन पाई है। फ़ूडटेक सेक्टर की इस कमी को समझते हुए और शहर के बाहरी हिस्सों में स्थापित शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स की ज़रूरतों का ख़्याल करते हुए अमित रंजन ने इंदौर से अपने स्टार्टअप, 'कैंपस खाना' की शुरूआत की। अमित मानते हैं कि इन स्टूडेंट्स के पास खाने-पीने के लिए विकल्प न के बराबर होते हैं, जिस वजह से उनका दैनिक जीवन काफ़ी चुनौतीपूर्ण हो जाता है और इस समस्या का उनकी पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ता है।

अमित रंजन ने मोनिका दुआ के साथ मिलकर दिसंबर 2015 में कैंपस खाना की शुरुआत की। स्टार्टअप शुरू करने के वक़्त दोनों की उम्र महज़ 27 साल थी। आपको बता दें कि इस स्टार्टअप ने सबसे पहले आईआईएम इंदौर के स्टूडेंट्स के लिए अपनी सुविधाएं चालू की थीं। पिछले 2 साल और 7 महीनों में कैंपस खाना ने अपनी रेंज को बढ़ाते हुए फलों और ग्रॉसरी आइटम्स की डिलिवरी भी शुरू कर दी है और जानकारी के मुताबिक़, अभी तक यह स्टार्टअप 16 हज़ार से ज़्यादा ऑर्डर पूरे कर चुका है। फ़िलहाल कैंपस खाना इंदौर के 5 शिक्षण संस्थानों और सिलिकन सिटी तक अपनी सुविधाएं मुहैया करा रहा है।

कैंपस खाना के को-फ़ाउंडर अमित का कहना है कि उनका स्टार्टअप, एक टेक्नॉलजी फ़र्म है, जो रेस्तरां, फ़्रूट और ग्रॉसरी स्टोर्स और अपने क्लाइंट्स के बीच सुविधाओं का आदान-प्रदान सुनिश्चित करता है। अमित ने बताया कि उनके स्टार्टअप के पास ख़ुद की फ़्लीट सर्विस भी है, जिसके माध्यम से उपभोक्ताओं तक आसानी से और समय पर उनका सामान पहुंचाया जाता है।

कैंपस खाना के आइडिया के पीछे छिपे एक वाक़ए का ज़िक्र करते हुए अमित बताते हैं कि उनकी बहन मेडिकल कॉलेज में पढ़ती थीं और एकबार उन्हें बर्थडे पर अपनी बहन को केक भिजवाना था और इस काम के लिए उन्हें उस वक़्त कोई भी ढंग की ऑनलाइन सर्विस नहीं मिल पाई। मार्केट में मौजूद इस कमी को भांपने के बाद ही अमित ने कैंपस खाना के आइडिया पर काम करना शुरू किया।

इस घटना के बाद अमित ने अलग-अलग शिक्षण संस्थानों के स्टूडेंट्स से बात की और इसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि छोटे शहरों में लगभग हर एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में यही हालात हैं। वजह यह है कि छोटे-बड़े सभी शिक्षण संस्थान आमतौर पर शहर के बाहरी हिस्सों में ही स्थित होते हैं और ऐसी स्थिति में फ़ूडटेक स्टार्टअप्स की सुविधाएं उनतक नहीं पहुंच पातीं।

स्टार्टअप की को-फ़ाउंडर मोनिका दुआ, अमित के साथ पहले भी काम कर चुकी थीं। मोनिका ने आईआईएम इंदौर से ही एमबीए की डिग्री ली है और वह भी इस तरह की समस्याओं का अनुभव कर चुकी थीं। मोनिका, अमित के आइडिया से सहमत हुईं और उन्होंने अमित के साथ मिलकर कैंपस खाना की शुरूआत की।

अमित बताते हैं कि अपनी सुविधाओं को अमल में लाने से पहले उन्होंने सभी डिलिवरी एग्ज़िक्यूटिव्स के लिए दो दिनों का ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाया, ताकि उपभोक्ताओं की सहूलियत के साथ किसी तरह का समझौता न हो। साथ ही, उनकी टीम ने अपने लॉन्च से पहले प्रमोशन के लिए आईआईएम इंदौर को चुना और वहीं से अपनी ऐडवरटाइज़िंग शुरू की।

आपको बता दें कि आर्ट्स स्ट्रीम में ग्रैजुएशन से पहले अमित इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के स्टूडेंट भी रह चुके हैं। इतना ही नहीं, अमित एक ब्लॉगर भी है। अमित ने 2011 में 'वेक इंडिया नाऊ' (WakeIndiaNow) नाम से अपने ब्लॉग की शुरूआत की थी।

कैंपस खाना की को-फ़ाउंडर मोनिका ने दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और एमबीए करने से पहले उन्होंने बतौर बिज़नेस ऐनालिस्ट दो सालों का प्रोफ़ेशनल अनुभव भी लिया है।

अपने स्टार्टअप को लॉन्च करने से पहले मोनिका और अमित ने 20 इंस्टीट्यूट्स की लिस्ट तैयार की, जिनमें अधिकतर इंजीनियर और मैनेजमेंट के कॉलेज थे। बिज़नेस से संबंधित चुनौतियों का ज़िक्र करते हुए अमित ने बताया कि सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि हर इंस्टीट्यूट में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स की पर्चेज़िंग पावर अलग-अलग थी और इसलिए उन्हें प्राइस रेंज की गुत्थी को सुलझाने के लिए काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी। इस क्रम में ही उन्होंने अपनी लिस्ट से सभी इंजीनियरिंग कॉलेजों के नाम हटा दिए और सिर्फ़ मैनेजमेंट संस्थानों के लिए ही अपनी सुविधाएं शुरू करने पर सहमति बनाई।

आईआईएम इंदौर कैंपस से कैंपस खाना की सर्विसेज़ को लॉन्च करने के पीछे एक बड़ी वजह यह थी कि इस कैंपस में रेग्युलर पोस्ट ग्रैजुएट प्रोग्राम के साथ-साथ एग्ज़िक्यूटिव प्रोग्राम्स भी चलते हैं और इस वजह से ही यहां की स्टूडेंट स्ट्रेंथ काफ़ी अच्छी है। साथ ही, इस संस्थान के आस-पास ही कई और शिक्षण संस्थान भी हैं।

कैंपस खाना के सामने अगली बड़ी चुनौती थी, डिलिवरी स्टाफ़ को मैनेज करने की। अगर फ़ूड आइटम्स को ध्यान में रखते हुए पीक आवर्स या पीक टाइम के लिए डिलिवरी स्टाफ़ को बढ़ा लिया जाए तो फिर बाक़ी के समय में उनका पूरा उपयोग नहीं होता और यह फ़ैक्टर एक नए स्टार्टअप के रेवेन्यू मॉडल के हिसाब से उपयुक्त नहीं होता। इसका उपाय निकालते हुए कैंपस खाना ने अपने आइटम्स की रेंज को बढ़ाया ताकि दिन के बाकी समय में स्टाफ़ को फलों और ग्रॉसरी आइटम्स की डिलिवरी में इस्तेमाल किया जा सके।

फ़ूडटेक इंडस्ट्री अब सिर्फ़ फ़ूड डिलिवरी तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसमें भी होम-कुक्ड और शेफ़-कुक्ड फ़ूड आइटम्स की डिमांग अलग-अलग हो गई है। होलाशेफ़, इनरशेफ़, रॉकेटशेफ़्स, ज़परमील, किचन्स फ़ूड और साइबरशेफ़ जैसे कई स्टार्टअप्स उपभोक्ताओं की इन ज़रूरतों को पूरा कर रहे हैं। योर स्टोरी की रिसर्च के मुताबिक़, इस साल अभी तक फ़ूडटेक सेक्टर में 523 मिलियन डॉलर का निवेश हो चुका है, जिसमें स्विगी की हालिया डील को भी शामिल किया गया है। आपको बता दें कि 2017 इस सेक्टर में निवेश का आंकड़ा 257 मिलियन डॉलर का था।

कैंपस खाना की योजना है कि अहमदाबाद में भी स्टार्टअप की सुविधाएं शुरू की जाएं। साथ ही, कंपनी नई लोकेशन से अपनी सुविधाएं लॉन्च करने के बारे में सोच रही है। इस साल, कंपनी सब्सक्रिप्शन आधारित सुविधाओं और को-ब्रांडेड मील-बॉक्स डिलिवरीज़ के साथ भी प्रयोग कर चुकी है और उसकी योजना है कि जल्द से जल्द ख़ुद का क्लाउड किचन शुरू किया जाए।

कैंपस खाना हर ऑर्डर पर एक निर्धारित फ़ीस चार्ज करके और अपने पोर्टल पर आने वाले विज्ञापनों के माध्यम से रेवेन्यू पैदा करता है। इतना ही नहीं, न्यूनतम समय के भीतर डिलिवरी न हो पाने की स्थित में भी कैंपस खाना को मुनाफ़ा होता है। अमित ने बताया कि उनकी कंपनी बूटस्ट्रैप्ड है और उनका दावा है कि 2.5 लाख रुपए के निवेश के साथ शुरू हुई उनकी कंपनी शुरूआत से ही मुनाफ़े में चल रही है और 43 लाख रुपए के रेवेन्यू तक पहुंच चुकी है। कैंपस खाना की टीम 12 मुख्य सदस्यों के साथ काम कर रही है।

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