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गरीब स्त्री-पीड़ा से घनीभूत मृणाल पांडे का कथा-संसार

पत्रकार, लेखक एवं भारतीय टेलीविजन का जाना-माना चेहरा हैं मृणाल पाण्डे... 

जय प्रकाश जय
26th Feb 2018
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हमेशा से स्त्री का पहला संकट स्वयं की अस्मिता सही सलामत रहने का संकट रहा है, वह संकट सीता, द्रौपदी, गार्गी, गांधारी, अहिल्या का रहा हो या आधुनिक स्त्री का। संघर्षशील स्त्री पात्रों को ही अपने सृजन के केंद्र में रखने वाली उपन्यासकार गौरापंत शिवानी की यशस्वी सुपुत्री, पत्रकार, लेखक एवं भारतीय टेलीविजन की जानी-मानी हस्ती मृणाल पाण्डे का आज (26 फरवरी) जन्मदिन है।

मृणाल पांडे (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

मृणाल पांडे (फोटो साभार- सोशल मीडिया)


जानी-मानी उपन्यासकार एवं लेखिका स्व. गौरापंत शिवानी की सुपुत्री एवं ख्यात साहित्यकार एवं पत्रकार मृणाल पाण्डे को साहित्य विरासत में मिला है। उनका जन्म टीकमगढ़ (मध्यप्रदेश) में 26 फरवरी 1946 को हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा नैनीताल (उत्तराखंड) में हुई।

जानी-मानी उपन्यासकार एवं लेखिका स्व. गौरापंत शिवानी की सुपुत्री एवं ख्यात साहित्यकार एवं पत्रकार मृणाल पाण्डे को साहित्य विरासत में मिला। उनका जन्म टीकमगढ़ (मध्यप्रदेश) में 26 फरवरी 1946 को हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा नैनीताल (उत्तराखंड) में हुई। उसके बाद इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। इन्होंने अंग्रेजी एवं संस्कृत साहित्य, प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व, शास्त्रीय संगीत तथा ललित कला की शिक्षा कारकारन (वाशिंगटन) से पूरी की। 21 वर्ष की उम्र में उनकी पहली कहानी ‘धर्मयुग’ में छपी। तब से वो लगातार लेखन कर रही हैं। वह प्रसार भारती की अध्यक्ष, 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'वामा' की संपादक, हिन्दी दैनिक 'हिन्दुस्तान' की समूह सम्पादक, 'सेल्फ इम्प्लायड वूमेन कमीशन' तथा पीटीआई बोर्ड की सदस्य भी रही हैं।

उन्होंने 'ध्वनियों के आलोक में स्त्री' के जरिये संगीत साधक महिलाओं के बहाने समाज के दोमुंहेपन को उजागर किया है। वह साहित्य ही नहीं, संगीत के इतिहास की भी परत-दर परत खोलती हैं। देश आजाद होने के दौर से पहले की पृष्ठभूमि में जाकर वह बताती हैं कि जब संगीत के उस्ताद और गुरु राजनीति से हमेशा दूर रहे, कलाकारों को कुटिल उठापटक नापसंद थी। देश का जब बंटवारा हुआ, ज्यादातर मुसलमान गायक-गायिकाएं हिंदुस्तान छोड़ने को राजी नहीं हुए क्योंकि अपनों के बीच गाने-बजाने का मजा ही कुछ और। यह न पंडत का गाना, न उस्ताद का, यह असल हड्डी का गाना।

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेती स्त्रियां तो रहीं, मगर उनके अनुभवों का कोई संकलन नहीं रहा। जब मृणाल पांडे ने ये किताब लिखी तो उसमें एक से एक किस्सों के काफिले चल पड़े, गानेवालियों के रहन-सहन से लेकर मन-मिजाज तक। सबको मालूम होगा कि गानेवाली स्त्रियां राजघरानों से जुड़ी रही हैं। मोहर-अशर्फियां, गहने नहीं, हवेलियां और जायदाद उन्हें बख्शिश में मिली। उनकी एक जमात मध्यवर्ग का मनोरंजन करती रही। उनके हुनर को पेशा माना गया। असल गायकी के इतिहास में आज भी बड़ी शोहरत वाली बेगम अख्तर, जानकी बाई, जद्दन बाई, गौहर खान का नाम बड़ी इज्जत से लिया जाता है।

तिलवाड़ा, झूमरा, विलंबित तीन ताल के खयाल, रसीली ठुमरी पर भला किसका मन नहीं रीझ जाएगा। मृणाल पांडे ने इतिहास के उन सुरीले पन्नों पलटा। देखिए कि उन्होंने किस स्त्री-काल, उसके किस वर्ग, उनकी जिंदगी के किस लय-ताल को छुआ, जहां की शब्दों की दुनिया में विरली ही नजरें जाना मुमकिन रहा है। इसके साथ ही मृणाल पांडे ने आजादी के बाद के भारतीय परिवेश को अपनी कहानियों, उपन्यासों, नाटकों में आधार दिया। उनका नाटक 'आदमी जो मछुआरा नहीं था' काफी लोकप्रिय रहा है। उनकी 'यानी कि एक बात थी', 'बचुली चौकीदारिन की कढ़ी', 'एक स्त्री का विदा गीत', 'चार दिन की जवानी तेरी', 'अपनी गवाही', 'हमका दियो परदेस', 'रास्तों पर भटकते हुए', 'जहां औरतें गढ़ी जाती हैं' आदि रचनाएं भी चर्चित हो चुकी हैं।

मृणाल पांडे कई बार अपनी अन्यथा टिप्पणियों के लिए भी सोशल मीडिया की सुर्खियां बन जाती हैं। एक ऐसा ही लोकोख्यान बना 'वैशाखनंदन'। मृणाल पांडे ने ‘जुमला जयंती पर आनंदित, पुलकित, रोमांचित वैशाखनंदन’ लिखकर साथ में गधे की फोटो भी ट्वीट कर दी। कुछ लोगों ने इस ट्वीट को न सिर्फ उनके समर्थकों बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर केंद्रित मानते हुए उसकी आलोचना की। आलोचकों में वरिष्ठ टीवी पत्रकार अजीत अंजुम भी शामिल थे। अजीत अंजुम की टिप्पणी के बाद मृणाल पांडे ने उन्हें ट्विटर पर ब्लॉक कर दिया। लेकिन कई लोगों को मृणाल पांडे के ट्वीट या उसकी भाषा में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा।

ट्वीट पर अजीत अंजुम ने लिखा कि 'स्कूली दिनों में साथियों के बीच तू-तू-मैं-मैं का संघर्ष जब चरम पर पहुंचने लगता था तब संवाद में गधे की इंट्री होती थी। तुम गधे हो के जवाब में तुम महागधे हो का तमगा एक दूसरे पर चिपकाते हुए ...... युद्धविराम होता था। अब बात मृणाल पांडे जी और वैशाखनंदन विमर्श की। सबके तर्कों का खूंटा पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड वाले बयान से लेकर मोदी और उनकी सेना के दर्जनों बयानों की ज़मीन पर टिका है। ऐसे कई बयान गूगल से खोज-खोजकर यहां-वहां चिपकाए जा रहे हैं और पूछा जा रहा है कि क्या ये बयान शर्मनाक नहीं? फलां-फलां ने अगर ऐसे बेशर्म बयान दिए तो मृणाल जी ने मोदी समर्थकों को सिर्फ वैशाखनंदन ही तो कहा।

वैशाखनंदन शब्द की उत्पति पर दर्जनों पोस्ट लिखकर ‘गधा विमर्श’ का ऐसा माहौल बना दिया गया है गोया जो वैशाखनंदन न समझ पाए वो भी उन्हीं के उत्तराधिकारी हैं। वैशाखनंदन शब्द भाषा के किस गर्भ गृह से क्यों और कब निकला? इसके मायने क्या हैं? वैशाखनंदन कब और क्यों खुश होता है? घास/मौसम और गधे के रिश्तों से जुड़े कई अनुत्तरित सवालों के जवाब पहली बार देश के कोने-कोने से आए हैं। मृणाल जी की टिप्पणी को व्यंग्य के खांचे में डालकर उन्हें निर्दोष साबित करने पर जोर है।...'

महादेवी वर्मा लिखती हैं कि आज हमारी परिस्थिति कुछ और ही है। स्त्री न घर का अलंकार मात्र बनकर रहना चाहती है और न ही देवता कि मूर्ति बनकर प्राण-प्रतिष्ठा चाहती है। कारण वह जान गयी है कि एक का अर्थ अन्य कि शोभा बढ़ाना है। तथा उपयोग न रहने पर फेंक दिया जाना है तथा दूसरे का अभिप्राय दूर से उस पुजापे को देखते रहना है, जिसे उसे न देकर उसी के नाम पर लोग बाँट लेंगे। स्त्री लेखन पर ऐसे भी सवाल उठते रहते हैं कि ऐसा क्यो होता है, जब कोई स्त्री रचनाकार वैयक्तिक अनुभवों की अभिव्यक्ति का जोखिम उठाती है तो कहानी की नायिका को रचनाकार से जोड़कर देखा जाता है? स्त्री रचनाकार अपनी निजता को दांव पर लगाकर समाज के उलाहनों का शिकार क्यों बनती है?

खुला लिखने वाली स्त्री रचनाकार क्यों हर बार मानसिक हिंसा का शिकार होती है? मृणाल पांडे की मां गौरापंत शिवानी हिंदी की शीर्ष उपन्यासकार रही हैं, यद्यपि उनके साहित्य को हिंदी आलोचकों ने कत्तई कोई तवज्जो नहीं दी। शिवानी का ज्यादातर समय कुमाऊँ की पहाड़ियों में बीता। बाद का कुछ वक्त लखनऊ में भी गुजरा। उन्हें देवभूमि उत्तराखंड की लेखिका के रूप में जाना जाता है लेकिन उनका मूल जन्म स्थान राजकोट (गुजरात) रहा है। स्त्री को लेकर मां और बेटी, दोनो के कथा विषयों में एक बुनियादी का फर्क रहा है। शिवानी के उपन्यासों में मानवीय संबंध, नारी चिंतन, भारतीय संस्कृति में नारी के विविधरूपा स्वरूप के दर्शन होते हैं।

वात्सल्यमयी माता, पतिव्रता स्त्री, ममतामयी बहन, त्याग भावना प्रधान नारी, अपराधिनी, व्यभिचारिणी आदि। शिवानी ने मूल रूप से नारी को ही केन्द्र में रखकर रचनाएँ लिखीं। शिवानी जगह-जगह वेश्या जीवन से बचने-बचाने के संकेत देती हैं। 'रथ्या' लघु उपन्यास में सर्कस के मैनेजर द्वारा बसन्ती का बलात्कार किया जाता है, मजबूरन बसन्ती को वेश्या बनकर जीवन यापन करना पड़ता है। 'करिए छिमा' की हीरावती भी वेश्या है, परन्तु श्रीधर के प्रति उसका प्रेम निश्छल है। असमय पति की मृत्यु उसे वेश्या जीवन की ओर धकेलती है। इस तरह शिवानी ने समाज में स्थित वेश्या जीवन को उकेरते हुए यह कहना चाहा है कि वेश्या बनने से पहले वह भी एक सामान्य स्त्री है।

शिवानी अपनी कृतियों में उत्तर भारत के कुमाऊं क्षेत्र के आसपास की लोक संस्कृति की झलक दिखलाने और किरदारों के बेमिसाल चरित्र चित्रण के लिए जानी गईं लेकिन मृणाल पांडे के कथा संसार में स्त्री का वह आधुनिक विश्व है, जिसमें उसके स्वाभिमान और स्वतंत्रता के प्रश्न बार बार आंदोलित करते हैं। डॉ वैशाली देशपांडे बताती हैं कि उपन्यास साहित्य फिर वह स्वतन्त्रतापूर्व हो या स्वतंत्र्योत्तर हो, नारी का चित्रण उसका एक अविभाज्य अंग है। भारतेन्दु कालखंड से लेकर आज तक के सभी उपन्यासों पर दृष्टिक्षेप डालें तो यह स्पष्ट होता है कि अधिकांश उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों में कुछ ऐसे नारी पात्रों की योजना की है जो नारी के शोषण, उन पर होने वाले अन्याय अत्याचार, विभिन्न समस्याएँ, उनसे मुक्ति, अपने स्व की खोज आदि को व्यक्त करने में सक्षम है।

विनय कुमार पाठक लिखते हैं - आज से लगभग सवा सौ साल पहले का श्रद्धाराम फिल्लौरी का उपन्यास ‘भाग्यवती’ से लेकर आज तक स्त्री विमर्श ने आगे कदम बढ़ाया ही है, छलांग भले ही न लगायी हो। अलग-अलग पैमानों पर ही सही, प्रगति हुई है। कैसी प्रगति? केवल सजावटी, बनावटी, दिखावटी या सचमुच की? साहित्य समाज का दर्पण है, इसलिए समय बदलने के साथ कथानक बदलना भी स्वाभाविक रहता है। किसी भी रचनाकार की रचना में अपने समय काल, उस समय के प्रचलित सिंद्धांतों का समावेश होता है। साहित्य समाज के यथार्थ का बोध कराता है। उपन्यास के माध्यम से रचनाकार अपने युग तथा विशिष्ट काल खंड को विभिन्न चरित्रों, घटनाओं आदि के सयोंजन द्वारा उनकी वास्तविक परिस्थितियों में समग्रता के साथ अभिव्यक्त करता है जिसमें वैयक्तिक अनुभव अपनी समाजिकता के साथ सूक्ष्मताओं में उपस्थित रहते हैं। यद्यपि विषय, उद्देश्य तथा लेखकीय दृष्टि के अनुरूप बलाघात बदलता है। कभी चरित्र महत्वपूर्ण दिखते है, तो कभी घटनाएँ, तो कभी लेखनीय आदर्श, सोच, अनुभूतियाँ और माँग।

मृणाल पाण्डे के उपन्यासों ‘विरूद्ध’, ‘पटरंगपुर पुराण’, ‘देवी’, ‘रास्तों पर भटकते हुए’, ‘हमको दियो परदेस’ और ‘अपनी गवाही’ में मानव-अधिकारों से वंचित नारी की समस्याओं को चित्रित किया गया है। ‘विरूद्ध’ उपन्यास में समाज तथा परिवार के प्रति नारी की बदलती मानसिकता तथा उसके जीवन की विसंगतियों का चित्रण हुआ है। पटरंगपुर पुराण में पहाड़ी जीवन के साथ-साथ पूरे देश के सामाजिक और राजनीतिक परिवेशगत बदलाव के नारी-जीवन पर प्रभाव को चित्रित किया गया है। ‘देवी’ उपन्यास में लेखिका ने स्त्रियों के विभिन्न रूपों को समझने और नारी-मन के गोपनीय अंशों पर प्रकाश डालने की चेष्टा की है। ‘रास्तों पर भटकते हुए’ उपन्यास में मृणाल पाण्डे ने आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में मानवीय संबंधों का विघटन, सर्वव्यापी भ्रष्टाचार, धन और सत्ता की दौड़ में मानवीय मूल्यों का ह्रास तथा नारी के प्रति पुरुषों की हीन दृष्टि का वर्णन किया है।

‘अपनी गवाही’ उपन्यास में उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में आधुनिक युग की सच्चाइयों को उजागर करते हुए मूल्य-च्युति के नेपथ्य में महिला पत्रकारों के दमन एवं शोषण का अंकन किया है। एक पत्रकार होने के कारण मृणाल पाण्डे को युगीन परिवेश को बहुत निकट से देखने-परखने के कई अवसर प्राप्त हुए। ग्रामीण एवं शहरीय समाज में नारी और उपेक्षित लोगों की समस्याओं से अवगत होकर पांडे ने अपने उपन्यासों में नारी तथा गरीबों के प्रति सामाजिक सोच में बदलाव लाने की जोरदार मांग की है। पारिवारिक संबंध-विघटन के नेपथ्य में नारी के जीवन में संघर्ष को इन्होंने चित्रित किया है। पति-पत्नी के संबंधों में तनाव के मूल में अर्थाभाव को दर्शाकर सामान्य लोगों के जीवन पर अभाव के प्रभाव को चित्रित किया गया है।

मृणाल पाण्डे ने मूल्य संदर्भोंचित कथा-प्रसंगों के माध्यम से सामाजिक समस्याओं की अभिव्यक्ति की है। उनके उपन्यासों में वर्ग भेद, छुआछूत, दहेज प्रथा, बाल विवाह, अनमेल विवाह, विधवा समस्या, सती प्रथा, शिक्षित-अशिक्षित देशी-विदेशी एवं यौन रोग जैसी अनेक सामाजिक समस्याओं को देखा जा सकता है। श्रमिकों, शोषितों और गरीबों के प्रति उन्होंने अपनी संवेदना प्रकट की है। गरीब एवं निम्न वर्ग के लोगों का शोषण करने वाले पात्रों का चित्रण कर उन्होंने शोषकों की दूषित वृत्तियों का जोरदार खण्डन किया है।

ये भी पढ़ें: हिंदी साहित्य और छायावाद के अमिट स्तंभ महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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