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…जला के अपना घर हमने रोशनी की है

7th Sep 2017
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दास्तान यह है कि बेचारा कलमकार जगेंद्र सिंह, सैफई मार्का समाजवाद के कायदों से अंजान अपनी ही धुन में तात्कालीन समाजवादी सरकार के लाडले मंत्री राम मूर्ति वर्मा के काले चिट्ठों को सच्चाई के उजाले में हर्फ-दर हर्फ सामने लाने की जिद कर बैठा। बावला जानता नहीं था कि सैफई मार्का समाजवाद में 'हल्ला बोल भी एक संस्कार है जिसमें सड़कों पर अखबारों की प्रतियों को जलाने की रवायत है।

ये हैं पत्रकार जगेंद्र सिंह, जिन्हे जलाकर मार डाला गया था, साभार:सोशल मीडिया

ये हैं पत्रकार जगेंद्र सिंह, जिन्हे जलाकर मार डाला गया था, साभार:सोशल मीडिया


आज जगेन्द्र की मौत, हर किसी से यही सवाल ढोल बजा-बजाकर पूछ रही है कि आखिर कब सजा मिलेगी दोषियों को? क्योंकि जगेन्द्र की मौत एक तंत्र की मौत है। और यह मरे हुए तंत्र का ही परिणाम था कि कथित समाजवादियों के सामने कानून गुलाटियां भरने को मजबूर हो गया और 'यूपी में है दम क्योंकि जुर्म यहां है कम वाला जुमला लतीफा बन गया।

यहां लड़ाई कमजोर बनाम ताकतवर की है। सवाल एक मजबूत के बरक्स मजबूर और मुफलिस इंसान को इंसाफ देने का है। यह इंसाफ उस सामाजिक न्याय का तकाजा है जिसकी बुनियाद पर लोकतंत्र की विचारधारा टिकी है। 

तेरा निजाम है सिल दे जुबान शायर की, ये एहतियात जरूरी है इस बहार के लिए !

यह शेर व्यक्ति से विचार में परिवर्तित हो चुके शहीद पत्रकार जगेंद्र सिंह समेत समूची कलमकार बिरादरी के जलते जख्मों और हौसलों की तर्जुमानी कर रहा है जो उन हालातों में भी शब्द दर शब्द संघर्ष करते हैं जिनमें लोग अक्सर मरने की दुआ करते हैं। दास्तान यह है कि बेचारा कलमकार जगेंद्र सिंह, सैफई मार्का समाजवाद के कायदों से अंजान अपनी ही धुन में तत्कालीन समाजवादी सरकार के लाडले मंत्री राम मूर्ति वर्मा के काले चिट्ठों को सच्चाई के उजाले में हर्फ-दर हर्फ सामने लाने की जिद कर बैठा। बावला जानता नहीं था कि सैफई मार्का समाजवाद में 'हल्ला बोल भी एक संस्कार है जिसमें सड़कों पर अखबारों की प्रतियों को जलाने की रवायत है। ऐसा नहीं है कि समाजवादी मंत्री राम मूर्ति वर्मा जी ने पत्रकार जगेंद्र सिंह को समझाया नहीं था! लेकिन अब कोई लोहियावादी को ललकारेगा तो वह पीठ तो दिखायेगा नहीं। पत्रकार जगेंद्र सिंह ने माननीय मंत्री जी की अजमत को ललकारा था। उन्होंने राज्य सरकार की रोक के बावजूद हजारों एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) राशन कार्ड बनाने संबंधी एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिससे उत्तर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री राममूर्त वर्मा खफा हो गए। 

22 मई 2015 को अपनी फेसबुक पोस्ट में जगेंद्र ने आशंका जताई कि वर्मा उनकी हत्या करा सकते हैं। 28 मई को जगेंद्र ने अपने फेसबुक पोस्ट में वर्मा पर गैंगरेप में शामिल होने का इल्जाम लगाया। इन्हीं परिस्थितियों में पिछली 1 जून को पुलिस उनके घर पहुंची। उसी दौरान उनकी जलकर मौत हो गई। घटनाक्रम बताता है कि पहले पत्रकार जगेंद्र को धमकाया गया फिर उसे पिटवाया गया और जब इससे भी बात नहीं बनी तो फिर उसके घर में घुस कर, उसके बेटे के सामने उस पर पेट्रोल डाल कर उसे ङ्क्षजदा जला दिया गया। वो सात दिन तक ङ्क्षजदगी की जंग लड़ता रहा लेकिन आखिर में वो मौत की आगोश में सो गया। जगेंद्र के बेटे ने पुलिस पर उन्हें जला डालने का आरोप लगाया। मगर पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने आत्महत्या की है। जगेंद्र के बेटे द्वारा साफ शब्दों में वर्मा एवं पुलिसकॢमयों का नाम लेने के बावजूद पुलिस मुकदमा दर्ज करने में टाल-मटोल करती रही। मामला तब दर्ज हुआ, जब यह घटना देश-विदेश में प्रचारित हुई और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने आवाज उठाई। राज्यमंत्री राममूर्त वर्मा व तत्कालीन इन्स्पेक्टर श्रीप्रकाश राय के विरुद्ध धारा 302, 504, 506, 120 बी के तहत रपट दर्ज हो गयी। लेकिन वर्मा मंत्री बने रहे। उपरोक्त घटनाक्रम से साफ दिख रहा है कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले में तत्परता नहीं दिखाई थी। पत्रकार जगेंद्र ङ्क्षसह की निर्मम हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार का रुख शुरू से तकलीफदेह था, लेकिन अब तो यह शर्मनाक हो गया है। सरकार के एक मंत्री के खिलाफ इस मामले में नामजद एफआईआर और 'डाइंग डिक्लेयरेशन मौजूद है। जगेन्द्र ङ्क्षसह ने खुद को जलाये जाने के बाद जो बयान मृत्यु शैय्या पर लेटते हुए दिया था वह यही था कि 'मन्त्री मुझे पिटवा देता मगर उसने मुझे जलवा क्यों दिया।'

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आज जगेन्द्र की मौत, हर किसी से यही सवाल ढोल बजा-बजाकर पूछ रही है कि आखिर कब सजा मिलेगी दोषियों को? क्योंकि जगेन्द्र की मौत एक तंत्र की मौत है। और यह मरे हुए तंत्र का ही परिणाम था कि कथित समाजवादियों के सामने कानून गुलाटियां भरने को मजबूर हो गया और 'यूपी में है दम क्योंकि जुर्म यहां है कम वाला जुमला लतीफा बन गया। तत्कालीन सत्ताधीश अखिलेश यह भूल गये थे कि डा. लोहिया ने हजार दफे ऐलानिया तरीके से यह कहा था कि जब किसी 'अमीर और गरीब में लड़ाई हो तो साथ हमेशा गरीब आदमी का दो और जब किसी कमजोर और ताकतवर में लड़ाई हो तो साथ हमेशा कमजोर का दो तभी सामाजिक न्याय की लहर पैदा होगी।' वैसे भी न्याय की दृष्टि से देखा जाये तो जगेन्द्र ङ्क्षसह का मृत्यु पूर्व दिया गया बयान राममूर्त ङ्क्षसह को सींखचों के पीछे पहुंचाने के लिए काफी है।

वर्तमान मुख्यमंत्री योगी जी, अब इंसाफ अपनी धार पर आ खड़ा हुआ है। मामले में बहुत गुंजाइश नहीं बाकी रह गई है। यहां लड़ाई कमजोर बनाम ताकतवर की है। सवाल एक मजबूत के बरक्स मजबूर और मुफलिस इंसान को इंसाफ देने का है। यह इंसाफ उस सामाजिक न्याय का तकाजा है जिसकी बुनियाद पर लोकतंत्र की विचारधारा टिकी है। जम्हूरियत आपकी तरफ बड़ी उम्मीदों से निहार रही है। 

माननीय मुख्यमंत्री जी, अगर आपकी डेहरी पर भी इंसाफ का गला घोटा गया तो तारीख में आपका नाम भी उस संगदिल हाकिम की शक्ल में दर्ज होगा जिसके निजाम में आम अवाम की आवाज के कातिलों को सरपरस्ती हासिल हुई। उम्मीद है योगी से राजयोगी बने योगी आदित्यनाथ कभी ऐसी नहीं चाहेंगे।

पढ़ें: विश्व पत्रकारिता: कितनी आज़ाद, कितनी सुरक्षित

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