‘स्पर्शज्ञान’ एक ऐसा अखबार जो नेत्रहीनों को देता है देश और दुनिया की हर खबर...

13th Dec 2015
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हर महीने की 1 और 15 तारीख को छपता है ‘स्पर्शज्ञान’....

फरवरी, 2008 से प्रकाशित हो रहा है ‘स्पर्शज्ञान’....

मराठी भाषा में प्रकाशित ‘स्पर्शज्ञान’....


देश के हर घर में सुबह का मतलब होता है चाय की गर्म प्याली और अखबार, लेकिन किसी ने इसी देश में रहने वाले उन लाखों नेत्रहीन व्यक्तियों के बारे में सोचा जो इस बुनियादी सुविधा से कोसों दूर हैं। जो ये नहीं जान पाते की हमारे समाज और देश दुनिया में क्या हो रहा है। समाज और सरकार तक अखबार के जरिये कैसे अपनी बात पहुंचाई जा सकती है। इस बात को भले ही किसी ने गौर ना किया हो लेकिन मुंबई में रहने वाले स्वागत थोराट ने ना सिर्फ सोचा बल्कि वो कर दिखाया जिसकी दूसरे लोग कल्पना तक नहीं कर सकते। उनको नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए देश का पहला अखबार निकालने का गौरव हासिल है। वो फरवरी, 2008 से ‘स्पर्शज्ञान’ नाम से ये अखबार चला रहे हैं।

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स्वागत थोराट पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और थियेटर निर्देशक रहे हैं। वो नियमित अंतराल में दूरदर्शन और दूसरी जगहों के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाने का काम करते थे। इसी सिलसिले में उनको एक बार दूरदर्शन के ‘बालचित्रवाणी’ कार्यक्रम के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाने का मौका मिला जो कि नेत्रहीनों के बारे में थी। तब स्वागत ने उस डॉक्यूमेंट्री की ना सिर्फ अवधारणा तैयार की बल्कि उसको लिखने का काम भी किया। इस डॉक्यूमेंट्री में नेत्रहीनों के लिए शिक्षा के विभिन्न तरीकों को बताया जाना था। इस दौरान उन्होने नेत्रहीनों के बीच रहकर काम किया। इसके बाद उन्होने एक मराठी नाटक ‘स्वतंत्रयाची यशोगथा’ का निर्देशन किया। इस नाटक में पुणे के दो स्कूलों के 88 नेत्रहीन बच्चों ने हिस्सा लिया। ये नाटक देश के पचास साल पूरे होने के मौके पर किया गया था। इस नाटक के मंचन की ना सिर्फ काफी चर्चा हुई बल्कि इसे ‘गिनेस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ और ‘लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड’ में भी जगह मिली।

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स्वागत ने योरस्टोरी को बताया 

“जब मैं इस नाटक के मंचन के लिए इन बच्चों के साथ यात्रा कर रहा था तो मैंने देखा कि ये लोग आपस में देश दुनिया की उन चीजों के बारे में बात कर रहे थे जो इन्होने पहले कहीं पढ़ी थी या सुनी थी। तब मुझे अहसास हुआ कि ये बच्चे और ज्यादा जानने को इच्छुक हैं और ये उनकी जरूरत भी है।” 

हालांकि 15 साल पहले तक ब्रेल लिपी में काफी कम किताबें बाजार में मौजूद थी। इसी तरह एक बार दिवाली के मौके पर इन्होने मराठी साहित्यिक संस्कृति का हिस्सा रहे ‘स्पर्शगंध’ का ब्रेल लिपी में विशेषांक निकाला। जिसकी लोगों ने खासी तारीफ की और लोगों ने माना कि नेत्रहीनों के लिये इससे कहीं ज्यादा करने की जरूरत है। स्वागत का कहना है कि “हमारे समाज में लोग ये मानने को तैयार नहीं होते कि रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा भी नेत्रहीनों की कुछ जरूरतें हैं। हालांकि इस सोच में बदलाव तो आया है, लेकिन जितना आना चाहिए उतना नहीं।”

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नेत्रहीनों की तारीफ और उनकी पसंद को देखते हुए स्वागत ने तय किया कि वो अपना ध्यान इन लोगों के विकास में लगाएंगे और इसके लिए उन्होने ऐसे लोग ढूंढे जो उनकी मदद कर सकते हैं। इस अखबार को शुरू करने के लिए उन्होने अपनी बचत में से 4 लाख रुपये लगाये और शेष मदद उनके दोस्तों ने की। इस रकम से ना सिर्फ उन्होने ब्रेल मशीन खरीदी बल्कि मुंबई में एक ऑफिस भी किराये पर लिया। जिसके बाद 15 फरवरी, 2008 को ‘स्पर्शज्ञान’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ। तब ये अखबार नियमित रूप से हर महीने की 1 तारीख और 15 तारीख को प्रकाशित होता है। मराठी भाषा में प्रकाशित होने वाला ‘स्पर्शज्ञान’ की शुरूआत 100 कॉपियों से हुई थी। जिसके बाद ये संख्या लगातार बढती गई।

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आज ‘स्पर्शज्ञान’ अखबार महाराष्ट्र के 31 जिलों में मौजूद नेत्रहीन स्कूलों और नेत्रहीनों के विकास से जुड़ी विभिन्न स्वंय सेवी संस्थाओं को मुफ्त में दिया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक इस अखबार की पाठक संख्या करीब 27 हजार है। स्वागत का कहना है कि उन्होने पिछले साढ़े तीन सालों से इस अखबार का सालाना सब्सक्रिप्शन 960 रुपये रखा था लेकिन इस साल उसे बढ़ाकर 12सौ रुपये कर दिया है। इसके पीछे वो महंगाई को बड़ी वजह मानते हैं। उनका कहना है कि उनके कई जानकार और दोस्त उनसे ये अखबार सब्सक्रिप्शन के तौर पर लेते हैं। इस वजह से वो इस अखबार के लिए मिलने वाले कागज की लागत निकाल पाते हैं जबकि प्रशासनिक लागत उनको अपनी बचत में से पूरी करनी पड़ती है। स्वागत का मानना है- 

“मैं इस बात की सही नहीं मानता कि इस काम के लिए किसी निवेशक की तलाश करूं, मैं ये काम अपनी बचत को लगाकर भी जारी रखूंगा।”

आज इस अखबार का संपादकीय कार्य तीन लोग मिलकर करते हैं जबकि तीन ओर लोग अखबार की प्रिंटिग, सर्ककुलेशन और विज्ञापन का काम देखते हैं। इसके साथ साथ इनके पास लेखकों, पत्रकारों का एक नेटवर्क है जो मुफ्त में अपने लेख इनको देते हैं। स्वागत का कहना है कि “जब हम इस अखबार को लोगों के सामने लेकर आये थे तब लोगों ने काफी ठंडी प्रतिक्रियायें दी थी लेकिन वक्त के साथ लोगों की सोच बदलती गई और वो भी मानने लगे की नेत्रहीनों के लिए भी उच्च शिक्षा कितनी जरूरी है।” यही वजह है कि आज काफी लोग उनका इस काम के लिए समर्थन कर रहे हैं। स्वागत की कोशिश अपने इस प्रादेशिक अखबार को राष्ट्रीय अखबार बनाने की है ताकि ज्यादा से ज्यादा नेत्रहीन लोग देश दुनिया से रूबरू हो सकें। हालांकि इसके लिये जरूरी है ज्यादा मशीन और पैसे की।

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इस अखबार में ज्यादातर सामग्री सामाजिक मुद्दों, अंतरराष्ट्रीय मामलों, प्रेरक जीवनी के अलावा शिक्षा और विभिन्न करियर से जुड़े विकल्प से होती है। अखबार में स्वास्थ्य, राजनीति, संगीत, फिल्म, थियेटर, साहित्य और खानपान से जुड़ी जानकारियां होती हैं। अखबार में खाने की कई रेसेपी भी बताई जाती है। इन सब जानकारियों के अलावा इस अखबार में जुर्म और क्रिकेट की जानकारी नहीं दी जाती। इसके पीछे स्वागत का तर्क है कि “हमारी विचारधार स्पष्ट है हम अपने पाठकों को वर्तमान मुद्दों से परिचित कराना चाहते हैं। हम उन मुद्दों पर चर्चा या बहस नहीं करते जो नेत्रहीनों के मुद्दों को प्रभावित करती हैं। हम ‘स्पर्शज्ञान’ में उन सभी मुद्दों को शामिल करते हैं जो आप और हम हर सुबह अखबार में पढ़ना पसंद करते हैं।” स्वागत अब इस कोशिश में लगे हैं कि हर जिले की सार्वजनिक लाइब्रेरी में ब्रेल सेक्शन भी हो। जबकि उनकी तमन्ना है कि अब कोई नेत्रहीन व्यक्ति अपना दैनिक अखबार निकाले।

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