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12,000 km का सफर तय कर महिला उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाली बुलेट क्वीन

13th Oct 2017
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तिरुवनंतपुरम में पैदा हुईं शिनी स्कूल के वक्त से ही एथलीट थीं और केरल की महिला क्रिकेट टीम का हिस्सा बनीं। अपने एक पुलिसवाले अंकल को वे हमेशा बुलेट पर चलते हुए देखती थीं। अंकल की उस बुलेट ने ही उन्हें भी बुलेट चलाने की दी प्रेरणा...

अपनी हिमालयन बाइक के साथ सफर पर शिनी (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

अपनी हिमालयन बाइक के साथ सफर पर शिनी (फोटो साभार- सोशल मीडिया)


उनके क्लब ने लोगों का माइंडसेट बदल दिया है और बता दिया है कि लड़कियां भी बाइक चलाने में सक्षम होती हैं और इसमें कुछ भी हैरान होने वाली बात नहीं है। 

वह बताती हैं कि उनके यहां महिलाओं को किसी भी काम से बाहर जाने के लिए किसी पुरुष का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। शिनी जैसी महिलाओं को ताना मारने वाले लोग अब उनसे लिफ्ट मांगते हैं।

केरल की शिनी राजकुमार टीचर हैं। लेकिन इसके पहले वह पुलिसविमेन, एथलीट और साथ ही स्टेट लेवल की क्रिकेट प्लेयर रह चुकी हैं। 35 साल की शिनी बुलेट से लंबी यात्राएं करती हैं। उन्होंने हाल ही में सिर्फ 42 दिनों में कन्याकुमारी से लद्दाख की 12,000 किलोमीटर की दूरी तय की। इस सफर के दौरान उन्होंने महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के विरुद्ध आवाज बुलंद की। ऐसा काम करने वाली वह केरल की पहली महिला हैं। उन्होंने केरल का पहला वूमन रॉयल इनफील्ड बुलेट क्लब स्थापित किया है। जिसका नाम है, निर्भीक रॉयल एक्सप्लोरर क्लब। वे महिलाओं को झिझक दूर कर बुलेट से सफर करना सिखाती हैं।

तिरुवनंतपुरम में पैदा हुईं शिनी स्कूल के वक्त से ही एथलीट थीं और केरल की महिला क्रिकेट टीम का हिस्सा बनीं। अपने एक पुलिसवाले अंकल को वे हमेशा बुलेट पर चलते हुए देखती थीं। इससे उनके मन में भी बुलेट चलाने की इच्छा होती थी। वह बताती हैं, 'मेरे मन में हमेशा से बुलेट से चलने का सपना पलता था, लेकिन एक मिडिल क्लास फैमिली से आने की वजह से मुझे मालूम था कि बाइक राइडिंग या माउंटेनिंग जैसा काम करने पर मुझे रोका जाएगा और हो सकता है कि आस-पास के लोग कमेंट भी करें।' हालांकि उन्होंने अपना सपना पूरा कर लिया है और केरल की पहली ऐसी महिला बन गईं जिसने रॉयल इनफील्ड की हिमालयन बाइक खरीदी।

युवा एथलीट और क्रिकेटर होने के वजह से टूर्नामेंट खेलने के लिए शिनी को कई दूसरे राज्यों में भी जाना पड़ता था। इससे उनके भीतर घूमने की प्रवृत्ति पैदा हुई। लोगों को यह जानकर हैरानी हो सकती है कि शिनी को कॉलेज के वक्त तक दोपहिया चलाना बिलकुल नहीं आता था। त्रिवेंद्रम में अपने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में पहली बार साइकिल चलाई थी। गोरखपुर में उनकी चचेरी बहन एक कॉलेज में पढ़ाती थीं वहीं उन्होंने फिजिकल एजुकेशन पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने देखा कि वहां के बच्चे स्कूल पहुंचने के लिए दूर-दूर से साइकिल से आते हैं। इससे वह प्रभावित हुईं और साइकिल चलाना सीखा। एक बार अच्छे सा साइकिल सीख लेने के बाद वह रोजाना साइकिल से ही स्कूल आने लगीं।

शिनी अपने कॉलेज में एकमात्र ऐसी अध्यापिका थीं जो साइकिल से स्कूल आता था। यहां तक कि वे गांवों में बच्चों के पैरेंट्स से मिलने के लिए भी साइकिल का ही इस्तेमाल करती थीं। इसके अलावा उन्हें यहां काफी अच्छा महसूस हो रहा था क्योंकि साइकिल या बाइक चलाने पर उन्हें उनके घर की तर कोई मर्दानी या अहंकारी नहीं कह रहा था। यहां उन्होंने टीवीएस की विक्टर और बजाज की पल्सर जैसी गाड़ियां चलाना सीखीं। इसके बाद उन्होंने सीधे बुलेट पर हाथ आजमाया। उनके बचपन का सपना यहां सच साबित हो रहा था। इसी बीच 2003 में उन्हें दिल्ली पुलिस में नौकरी लग गई, लेकिन कुछ ही दिनों में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और वापस केरल लौट आईं।

वह बताती हैं कि उनके यहां महिलाओं को किसी भी काम से बाहर जाने के लिए किसी पुरुष का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। शिनी जैसी महिलाओं को ताना मारने वाले लोग अब उनसे लिफ्ट मांगते हैं। शिनी के पिता के पास एक हीरो हॉन्डा की बाइक थी, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं होती थी कि वह बाइक को छूने का साहस कर सकें। उनके चचेरे भाई जयप्रकाश ने उन्हें गाड़ी चलाने का मौका दिया। उनके भाई ने उन्हें दुनिया की बातों से बेपरवाह हो जाने के लिए कहा। उस वक्त शिनी लोगों के कमेंट से आहत हो जाती थीं और कई बार तो लड़ बैठती थीं, लेकिन उनके पिता ने उनसे कहा कि वे ऐसे लोगों की परवाह न करें और उनकी बातों को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दें।

फोटो साभार- ओसविन फोटो

फोटो साभार- ओसविन फोटो


जब वह बाइक से सड़कों पर चलने लगीं तो उनको देखकर कई सारी लड़कियों ने कहा कि उन्हें भी बाइक चलाना सिखाएं। लेकिन शिनी बताती हैं कि उन्हें इतना आत्मविश्वास नहीं था कि वह बाकी लड़कियों को भी बाइक चलाना सिखा सकें। लेकिन उनके पति ने उनसे कहा कि इन लड़कियों को बाइक सिखाने में हिचक न करें और जो भी लड़की सीखने का प्रयास करे उसकी मदद करें। उनके क्लब ने लोगों का माइंडसेट बदल दिया है और बता दिया है कि लड़कियां भी बाइक चलाने में सक्षम होती हैं और इसमें कुछ भी हैरान होने वाली बात नहीं है। आज इस क्लब में लगभग 30 लड़कियां हैं और इसकी संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।

एक बार वह बाइक से पैसेंजर ट्रेन से रेप कर बाहर फेंक दी गई लड़की सौम्या के घर गईं। सौम्या के साथ यह बुरा हादसा 1 फरवरी 2011 को हुआ था। सौम्या की कहानी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। शिनी को भी इससे काफी दुख हुआ और वे केरल सहित पूरे भारत को जागरूक करने निकल पड़ूीं। उन्होंने कन्याकुमारी से लेकर लद्दाख तक 'आजादी' नाम से यात्रा आरंभ की। उन्होंने समाज में जागरूकता लाने और महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला कर लिया। उन्होंने 50 दिनों में 12,000 किलोमीटर बाइक चलाने का फैसला किया। इसी साल 16 जुलाई को तिरुवनंतपुरम से उन्होंने अपनी यात्रा शुरू की थी और सिर्फ 42 दिनों में ही उन्होंने इसे पूरा कर लिया।

यह भी पढ़ें: दिव्यांग लड़कियों को पीरियड्स के बारे में जागरूक करते हैं गांधी फेलोशिप के विनय

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