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वित्त मंत्री से बड़ी उम्मीदें, हेल्थ सेक्टर सतह पर, 'मुन्ना भाईयों' के भरोसे देश!

बजट 2018-19: हेल्थ सेक्टर...

24th Jan 2018
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यद्यपि इस बार बजट 2018-19 में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम ले आ सकते हैं लेकिन देश का हेल्थ सेक्टर बजट के अभाव में जिन हालात से गुजर रहा है और उससे करोड़ों देशवासियों, खासकर संसाधनहीन वर्गों के लोग दवा-इलाज के लिए जिस तरह दर-दर भटक रहे हैं, स्थितियां अत्यंत चिंताजनक हैं। अध्ययन एवं सर्वे रिपोर्ट बताती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में तो जैसे बीमार लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। कोई पेड़ के नीचे इलाज करा रहा है तो कोई चबूतरे पर। दवाओं की कीमत आसमान छू रही है। कितना दुखद है कि देश के हर जिले में औसतन बड़ी आबादी को रोजमर्रा में 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' का ही एक अदद सहारा रह गया है।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


स्वास्थ्य सेवा पर खर्च का 70 प्रतिशत निजी क्षेत्र से आता है, जबकि इस मामले में वैश्विक औसत 38 प्रतिशत है। चिकित्सा पर व्यय का 86 प्रतिशत तक लोगों को अपनी जेब से चुकाना होता है। ब्राजील जैसे विकासशील देश में प्रति हजार लोगों पर अस्पतालों में बेडों की उपलब्धता 2.3 है पर भारत में यह आंकड़ा केवल 0.7 है।

बजट 2018-19 के तथ्यों से रू-ब-रू होने से पहले आइए देखते हैं कि हमारे देश की चिकित्सा व्यवस्था कैसे हालात से गुजर रही है। 'द हैल्थ वर्कफोस इन इण्डिया' की रिपोर्ट बताती है कि देश के पचास फीसदी गांवों में सक्रिय लगभग 18.08 प्रतिशत ऐलोपैथिक डॉक्टर चिकित्सा के योग्य नहीं हैं। उनमें 31 प्रतिशत सिर्फ सेकेंडरी स्कूल पास है जबकि सत्तावन प्रतिशत के पास चिकित्सा सर्टिफिकेट तक नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि गांवों में 38 प्रतिशत महिला स्वास्थ्यकर्मचारी पुरूष स्वास्थ्य कर्मचरियों की तुलना में अधिक सुयोग्य हैं और 38 प्रतिशत ऐलोपैथिक पुरुष डॉक्टरों की तुलना में 67 प्रतिशत महिला डॉक्टरों के पास चिकित्सा सार्टिफिकेट नहीं है। आयुर्वेदिक, ऐलोपैथिक, होम्योपेथिक और यूनानी डॉक्टरों को मिलाकर भी एक लाख की जनसंख्या पर 80 डॉक्टरों का औसत है। नर्स और दाइयों की संख्या एक लाख पर केवल 61 है।

इनमें चिकित्सा योग्य नर्स और दाइयों की संख्या प्रति लाख सिर्फ छह के आसपास है। राज्यों की दृष्टि से जिलों के स्वास्थ्य कर्मचारियों की संख्या में बड़ा अन्तर है, जिसमें भारत की शिक्षित नर्स 38.08 प्रतिशत केरल में है, जबकि केरल की जनसंख्या देश की कुल आबादी की 3.01 प्रतिशत है। ऐसे ही पश्चिम बंगाल में होम्योपैथिक डॉक्टर 30.06 प्रतिशत हैं। दांत के डॉक्टरों की संख्या प्रति एक लाख 2.04 प्रतिशत है, जबकि 2001 की जनगणना में यहां के 58 जिलों में एक भी दांत का डॉक्टर नहीं था।

ऐसोचैम की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार बड़ी कंपनियों में काम करनेवाले आधे से ज्यादा कर्मचारियों का कहना है कि उनकी कंपनियां कर्मचारियों को हेल्दी और फिट रखने के लिए किसी तरह का कोई कार्यक्रम नहीं चलाती हैं। एफएमसीजी, मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित सेवाओं और रीयल एस्टेट समेत अन्य क्षेत्रों की कंपनियों में किए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि कॉर्पोरेट स्वास्थ्य योजना को अपनाकर भारतीय इंडस्ट्री कर्मचारियों की अनुपस्थिति दर में एक फीसदी की कमी लाकर 2018 में 20 अरब डॉलर की बचत कर सकती है। करीब 52 फीसदी कर्मचारियों ने खुलासा किया है कि उनकी कंपनी इस तरह की कोई योजना नहीं चलाती है, जबकि बाकी बचे कर्मचारियों में से 62 फीसदी का कहना है कि वर्तमान में उनकी कंपनी द्वारा चलाई जा रही योजना में सुधार की जरूरत है।

दुनिया के अन्य देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना में भारत की स्थिति दयनीयता की हद तक पहुंच चुकी है। हर मानक पर फेल्योर की फेहरिस्त में हैं। प्रसव के समय होने वाली शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार पर 52 है, जबकि श्रीलंका में 15, नेपाल में 38, भूटान में 41 और मालदीव में यह आंकड़ा 20 का है। स्वास्थ्य सेवा पर खर्च का 70 प्रतिशत निजी क्षेत्र से आता है, जबकि इस मामले में वैश्विक औसत 38 प्रतिशत है। चिकित्सा पर व्यय का 86 प्रतिशत तक लोगों को अपनी जेब से चुकाना होता है। ब्राजील जैसे विकासशील देश में प्रति हजार लोगों पर अस्पतालों में बेडों की उपलब्धता 2.3 है पर भारत में यह आंकड़ा केवल 0.7 है। श्रीलंका में यह आंकड़ा 3.6 और चीन में 3.8 है।

डॉक्टरों की उपलब्धता का वैश्विक औसत प्रति एक हजार व्यक्तियों पर 1.3 है, जबकि भारत में यह केवल 0.7 है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भारत में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति कुल व्यय 62 अमेरिकी डॉलर (लगभग पौने चार हजार रुपये) रहा है, जबकि अमेरिका में 8467 डॉलर और नॉर्वे में 9908 अमेरिकी डॉलर। हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका तक हमसे प्रति व्यक्ति लगभग 50 प्रतिशत तक ज्यादा खर्च कर रहा है। आंकड़ों के आधार पर हमारे पास 400,000 डॉक्टरों, 700,000 बेडों और लगभग 40 लाख नर्सों की कमी है। संसाधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के असमान वितरण के अलावा भारत में बीमारों की बढ़ती संख्या भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। उदाहरण के लिए, भारत में मधुमेह पीड़ितों की संख्या पहले 2020 तक 3.6 करोड़ आंकी गई थी, अब यह 7.5 करोड़ से पहले ही आगे निकल चुकी है।

जल्द ही दुनिया में हर पांचवें मधुमेह रोगियों में एक भारतीय होगा। नब्बे प्रतिशत से अधिक गर्भवती महिलाओं को एक बार प्रसव पूर्व जांच की सुविधा प्राप्त होती है और उनमें से 87 प्रतिशत को टेटनस रोधी पूर्ण टीकाकरण की सुविधा प्राप्त होती है किंतु केवल 68.7 प्रतिशत महिलाएं ही अनिवार्य तीन प्रसव पूर्व जांच की सुविधा प्राप्त कर पा रही हैं। केवल 61 प्रतिशत बच्चों का ही पूर्ण टीकाकरण हो पा रहा है। एक अध्ययन से पता चला है कि केवल इलाज पर खर्च के कारण ही प्रतिवर्ष 6 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग निर्धनता का शिकार हो रहे हैं। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं पर निजी व्यय राशि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति घरेलू मासिक व्यय का 6.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.9 प्रतिशत है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली इस बार आम बजट-2018-19 में चिकित्सा क्षेत्र के लिए बड़ी घोषणाएं कर सकते हैं, जिनमें एक है यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम। इसके लिए पहले साल 1800 करोड़ रुपए के बजट प्रावधान का अनुमान है। स्कीम के तहत जहां बीपीएल परिवारों को कुछ राशि प्रीमियम के रूप में देनी होगी, वहीं सामान्य परिवारों को भी सस्ते प्रीमियम पर हेल्थ इन्श्योरेंस का लाभ मिल सकेगा। यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम पर हेल्थ मिनिस्ट्री, फाइनेंस मिनिस्ट्री और प्रधानमंत्री कार्यालय में सहमति बनी है कि आम आदमी को राहत देने के लिए यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम की जरूरत है, जिसमें इनकम के आधार पर प्रीमियम तय किया जा सकता है।

सरकार का मानना है कि जिस तरह से इलाज का खर्च बढ़ रहा है, ऐसे में लोअर क्लास और मिडिल क्लास को सस्ते हेल्थ इन्श्योरेंस स्कीम के जरिए बड़ी राहत दी जा सकती है। जिस तरह से सरकार ने जनधन स्कीम के जरिए 38 करोड़ कस्टमर जोड़े हैं, साथ ही प्रधानमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना और प्रधानमंत्री जीवन सुरक्षा बीमा योजना के तहत कुल 18 करोड़ लोग जुड़े हैं, इन योजनाओं के तहत बीमाधारक को 1-2 लाख रुपए का इन्श्योरेंस कवर मिल रहा है। सरकार इन स्कीम्स की सफलता को देखते हुए अब हेल्थ इन्श्योरेंस कवर स्कीम भी लाना चाहती है। जिसके बाद सोशल सिक्युरिटी के तहत पूरा कवरेज देश का हर नागरिक उठा सकेगा।

बताया जा रहा है कि यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम के तहत प्रीमियम राशि इनकम के आधार पर तय होगी। अभी जनधन स्कीम के तहत बीमाधारक के लिए फ्री इन्श्योरेंस की सुविधा है, जबकि प्रधानमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना और प्रधानमंत्री जीवन सुरक्षा बीमा योजना के तहत 12 और 330 रुपए का प्रीमियम देना होता है। इसी तरह यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम में बीपीएल फैमिली को काफी कम प्रीमयम देना होगा, जबकि जो लोग बीपीएल कैटेगरी में नहीं आते हैं, उनको 1000 रुपए से कम सालाना प्रीमियम पर करीब 2 लाख रुपए की स्वास्थ्य सुरक्षा संभव हो सकेगी।

वित्त मंत्री को स्वास्थ्य क्षेत्र के जुड़े विशेषज्ञों की राय है कि नए बजट में सरकार के समक्ष चुनौती 14 निर्माणधीन एम्स का त्वरित निर्माण और शुरू हो चुके छह एम्स को पटरी पर लाने की व्यवस्था की जाए। इन एम्स में शिक्षकों एवं डाक्टरों की भारी कमी है। पिछले बजट में गुजरात और झारखंड में दो नए एम्स का ऐलान हुआ था। इस बार बिहार में दूसरे एम्स का ऐलान होने की संभावना है। 31 मार्च 2015 तक देश में कुल एक लाख 53 हजार 655 उप-स्वास्थ्य केन्द्र, 25308 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और 5396 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र काम कर रहे थे, जो देश की जनंसख्या के अनुपात में काफी कम हैं। राज्यों से भी इसके लिएलगातार मांग होती रही है।

कालाजार और फाइलेरिया के लिए 2017, कुष्ठ रोग के लिए 2018 खसरा के लिए 2020 तथा तपेदिक के लिए 2025 की समय सीमा निर्धारित है। पहला लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है लेकिन स्वास्थ्य मंत्रलय चाहता है कि बाकी लक्ष्य हासिल हों, इन बीमारियों के लिए आवंटन बढ़ाने की मांग की गई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को एक लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा कवरेज उपलब्ध कराना था। चालू बजट के दौरान एक हजार करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया। यह योजना शुरू नहीं हो पाई है। इसके जरिये करीब आठ करोड़ परिवारों को कवर किया जाना है।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रलय की रिपोर्ट के अनुसार देशमें हर घंटे में 55 दुर्घटनाओं में 17 लोगों की मौत होती है। स्वास्थ्य मंत्रलय के मुताबिक, अभी कुल 116 में से 110 ट्रॉमा सेंटर संचालित है। नए ट्रामा सेंटर संचालित करके दुर्घटना में होने वाली मौतों का आंकड़ा कम करना चाहती है। सरकार से इस बार के बजट में नए सेंटरों के लिए अर्थ व्यवस्था की उम्मीद की जा रही है। बताया जा रहा है कि आगामी 01 फरवरी को पेश होने वाले बजट 2018-19 में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली देश भर में हेल्थ और वेलनेस सेंटर खोलने के मद में 1,200 करोड़ रुपए आवंटित करने की घोषणा कर सकते हैं। प्रति स्वास्थ्य उपकेंद्र करीब 16 लाख रुपये खर्च का औसत है। स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर सिर्फ पांच तरह की स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं। उन्हें हेल्थ और वेलनेस सेंटर में प्रोन्नत कर देने के बाद 12 तरह की चिकित्सा सेवाएं मुहैया हो सकती हैं। इसके अलावा चिकित्सा सुधार के 1200 करोड़ समेत कुल दो हजार करोड़ रुपए दिए जाने का अनुमान है।

हेल्थ इंश्योरेंस कवर को लेकर ऐसी भी सूचनाएं मिल रही हैं कि इसकी सीमा तीन से पांच लाख रुपये तक घोषित हो सकती है। सूत्र बताते हैं कि सबको स्वास्थ्य सुरक्षा देने के लिए पांच हजार करोड़ रुपये का बजट तय किया जा रहा है। सरकार की इस योजना से निजी बीमा कंपनियों की मुश्किलें आसान हो जाएंगी। ट्रस्ट बनाकर स्वास्थ्य बीमा देना भी विचारणीय है। हेल्थ इंश्योरेंस सेंट्रल स्पॉन्सर्ड स्कीम के तहत दिया जाएगा। इसमें कुल खर्च का 60 फीसदी केंद्र और 40 फीसदी हिस्सा राज्य वहन करेंगे। हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम तीन तरह की होगी। पहली स्कीम में गरीबी रेखा से नीचे वालों को इंश्योरेंस कवर दिया जाएगा। इसे कल्याण स्कीम का नाम दिया जाएगा।

दूसरी स्कीम 2 लाख रुपये तक के आयवालों के लिए होगी, जिसका नाम सौभाग्य स्कीम होगा। इसके साथ ही 2 लाख से ज्यादा आमदनी वाले सभी वर्गों के लिए सर्वोदय स्कीम लाई जा सकती है। गरीबी रेखा से नीचे रहनेवाले और 2 लाख से कम आमदनी वालों का प्रीमियम सरकार भरेगी। इससे ज्यादा की आमदनी वालों से हेल्थ इंश्योरेंस के लिए प्रीमियम लिया जाएगा जो कि मामूली होगा। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, इंटरनल सर्वे में पाया गया है कि देश में करीब 70 फीसदी लोगों के पास हेल्थ इंश्योरेंस कवर नहीं है। बीमार होने पर इलाज के लिए उनके पास पैसे नहीं होते हैं।

यह भी पढ़ें: बजट 2018-19: छात्रों का कितना मान रखेगी सरकार!

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