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समोसे बेचने के लिए छोड़ दी गूगल की नौकरी

गूगल की नौकरी छोड़कर बेचने लगे समोसे, टर्नओवर 50 लाख से ज्यादा

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7th Jul 2017
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सुनकर थोड़ा अजीब ज़रूर लगेगा, कि समोसा बेचने के लिए कोई शख्स गूगल की नौकरी कैसे छोड़ सकता है, लेकिन ये सच है। जी ये सच है, कि मुनाफ कपाड़िया ने समोसे बेचने के लिए गूगल की मोटो पैकेज की नौकरी छोड़ दी। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती, समोसा भी बेचा तो इस तरह कि अपनी कंपनी का सालाना टर्नओवर 50 लाख पहुंच दिया...

<h2>फोटो साभार: सोशल मीडिया</h2>

फोटो साभार: सोशल मीडिया


मुनाफ ने गूगल की अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी, वो भी समोसे बेचने के लिए। ऐसे इंसान को भले ही लोग बेवकूफ कहें, लेकिन जब उन्हें पता चलेगा कि सिर्फ एक साल में ही उनका टर्नओवर 50 लाख से ज्यादा हो गया, तो शायद लोगों को अपनी राय बदलनी पड़ जाये।

"कुछ सालों तक गूगल में नौकरी करने के बाद मुनाफ को लगा कि, वह इससे बेहतर काम कर सकते हैं। बस फिर क्‍या था, दिमाग में बिजनेस का नया आईडिया लेकर वह घर लौटे और उन्‍होंने यहां अपना समोसे का बिजनेस शुरू कर दिया।"

आईटी फील्ड में काम करने वाले किसी भी शख्स से पूछ लीजिए, गूगल जैसी कंपनी में काम करना उसका सपना होगा। गूगल में नौकरी करने का मतलब है पूरी जिंदगी शान और आराम से जीना। गूगल के एम्प्लॉई की सैलरी की शायद आप कल्पना न कर सकें, क्योंकि ये कंपनी फ्रैशर्स को भी करोड़ों का पैकेज ऑफर कर देती है। लेकिन एक शख्स ऐसा भी है जिसने गूगल की अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी वह भी समोसे बेचने के लिए। ऐसे इंसान को भले ही लोग बेवकूफ कह दें, लेकिन जब उन्हें पता चलेगा कि सिर्फ एक साल में ही उनका टर्नओवर 50 लाख से ज्यादा हो गया तो शायद लोगों को अपनी राय बदलनी पड़ जाये। यहां हम बात कर रहे हैं 'द बोहरी किचन' वाले 'मुनाफ कपाड़िया' की।

मुनाफ कपाड़िया के फेसबुक प्रोफाइल के बायो में लिखा है कि "मैं वो व्यक्ति हूं जिसने समोसा बेचने के लिए गूगल की नौकरी छोड़ दी।" लेकिन उनके समोसे की भी खासियत है कि वह मुंबई के पांच सितारा होटलों और बॉलिवुड में खासा लोकप्रिय है। मुनाफ ने एमबीए की पढ़ाई की थी और उसके बाद उन्होंने कुछ कंपनियों में नौकरी की और फिर चले गये विदेश। विदेश में ही कुछ कंपनियों में इंटरव्‍यू देने के बाद मुनाफ को गूगल में नौकरी मिल गई। कुछ सालों तक गूगल में नौकरी करने के बाद मुनाफ को लगा कि, वह इससे बेहतर काम कर सकते हैं। बस फिर क्‍या था, दिमाग में बिजनेस का नया आईडिया लेकर वह घर लौटे और उन्‍होंने यहां अपना बिजनेस शुरू कर दिया।

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<h2>मुनाफ अपनी मां नफीसा के साथ</h2>

मुनाफ अपनी मां नफीसा के साथ


मुनाफ का घर जिस इलाके में है वहां ज्यादातर मध्यमवर्गीय फैमिली के लोग रहते हैं। लेकिन जिस लेवल का आइडिया मुनाफ ने सोचा था उस हिसाब से उन्हें यहां ग्राहक मिलना मुश्किल था। इसलिए मुनाफ ने प्रयोग के तौर पर अपने 50 दोस्तों को ईमेल और मैसेज किया और उन्हें खाने पर बुलाया।

मुनाफ अब भारत में 'द बोहरी किचन' नाम का रेस्‍टोरेंट चलाते हैं। मुनाफ बताते हैं, कि उनकी मां नफीसा टीवी देखने की काफी शौकीन हैं और टीवी के सामने काफी वक्त बिताया करती थीं। उन्हें फूड शो देखना काफी पसंद था और इसलिए वह खाना भी बहुत अच्छा बनाती थीं। मुनाफ को लगा कि वह अपनी मां से टिप्स लेकर फूड चेन खोलेंगे। उन्होंने रेस्टोरेंट खोलने का प्लान बनाया और अपनी मां के हाथों का बना खाना कई लोगों को खिलाया। सबने उनके खाने की तारीफ की। इससे मुनाफ को बल मिला और वह इस सपने को पूरा करने में लग गए।

मुनाफ के रेस्टोरेंट में सिर्फ समोसे ही नहीं मिलते। हां समोसा उनका ट्रेडमार्क जरूर है। दरअसल मुनाफ जिस दाऊदी बोहरा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं उनकी डिशेज काफी शानदार होती हैं। जैसे- मटन समोसा, नरगि‍स कबाब, डब्‍बा गोश्‍त, कढ़ी चावल इत्यादि। मुनाफ इन डिशेज को अपने रेस्टोरेंट में रखते हैं। बोहरी थाल स्वादिष्ट मटन समोसा, नरगीस कबाब, डब्बा गोश्त, करी -चावल आदि के लिए मशहूर है। वह कीमा समोसा और रान भी बनाते हैं, जिसकी डिमांड काफी ज्यादा होती है। अभी उनके रेस्टोरेंट को खुले सिर्फ एक साल हुआ है और उनका टर्नओवर 50 लाख पहुंच गया है। मुनाफ इसे अगले कुछ सालों में 3 से 5 करोड़ तक पहुंचाना चाहते हैं।

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<h2>फोटो क्रेडिट: जेशुआ नवाल्कर</h2>

फोटो क्रेडिट: जेशुआ नवाल्कर


मुनाफ की स्‍टोरी और उनका काम इतना फेमस हुआ कि फोर्ब्‍स ने अंडर 30 अचीवर्स की लिस्‍ट में उनका नाम शामिल कर लिया है। मुनाफ अपनी कंपनी के सीईओ हैं, लेकिन यहां इसका मतलब चीफ ईटिंग ऑफिसर होता है। मुनाफ के रेस्टोरेंट में इतनी भीड़ होती है कि यहां खाने के लिए लोगों को इंतजार करना पड़ता है। 

मुनाफ अभी मुंबई के वर्ली इलाके से फूड की डिलिवरी करते हैं। लेकिन आने वाले समय में वह इसी नाम से कुछ और रेस्टोरेंट खोलना चाहते हैं। अपनी सफलता का पूरा श्रेय मुनाफ अपनी मां को देते हैं। क्योंकि उनके बगैर यह संभव नहीं हो पाता।

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