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मां की ममता और कैनवॉस के रंग से बना ‘सुरमन’

Geeta Bisht
13th May 2016
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वो भले ही अपने तीन बच्चों की मां हों, लेकिन 111 दूसरे गोद लिये बच्चे भी उनको मां ही पुकारते हैं। ये वो बच्चे हैं जो कभी बेघर और लावारिस थे लेकिन आज इनको राजस्थान के जयपुर में रहने वाली मनन चतुर्वेदी अपने बच्चों की तरह ही बड़ा कर रही हैं। इतना ही नहीं राजस्थान राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष मनन चतुर्वेदी अपने दम पर करीब साढ़े चार सौ ऐसे बच्चों को उनके माता-पिता से मिलवा चुकी हैं जो कभी एकदूसरे से बिछुड गये थे। अनाथ बच्चों कि जिंदगी सवांरने के अलावा मनन फैशन डिजाइनर हैं साथ ही वो पेंटिंग का शौक रखती हैं, थियेटर करती हैं, गाना गाती हैं और तो और सामाजिक मुद्दों पर वो कई शॉर्ट फिल्में भी बना चुकी हैं।

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जयपुर की रहने वाली मनन चतुर्वेदी करीब 8 साल पहले दिल्ली में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थीं। वो बताती हैं,

“छुट्टियों में मैं दिल्ली से अपने घर वापस लौट रहीं थी तो मैंने देखा कि जयपुर के सिंधी कैम्प के पास कूड़े के ढेर में एक बच्ची कुछ ढूंढ रही हैं उसके बदन पर नाममात्र के कपड़े थे, उस बच्ची की ये हालत देख मेरी नजर उस बच्ची से तब तक नहीं हटी जब तक वो मेरी आंख से ओझल नहीं हुई। इस घटना ने मुझे इस बात के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया कि दुनिया में आने के बाद उस लड़की का ऐसा क्या कसूर था कि उसके पास तन ढकने तक के लिए कुछ नहीं था।” 

तब 19 साल की मनन चतुर्वेदी एक फैसला लिया कि डिजाइनर होने के नाते वो ऐसे कपड़े डिजाइन करेगीं जिसे गरीब बच्चे भी पहन सकें। इसके अलावा उन्होने स्लम बस्तियों में जाना शुरू किया और वहां रहने वाले गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। मनन एक ओर फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई कर रही थीं तो दूसरी और गरीबों की मदद भी कर रहीं थी। इस बीच उनको लंदन से फैशन डिजाइनिंग के लिए स्कॉलरशिप भी मिली, लेकिन अनाथ बच्चों के खातिर उन्होने उस ओर पलट कर भी नहीं देखा। उन्होने फैसला लिया कि वो अपना वक्त ऐसे गरीब बच्चों पर लगाएंगी।

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मनन के लिए वक्त के साथ हालात भी बदल रहे थे और कुछ साल बाद उनकी शादी हो गई। लेकिन उन्होने गरीब बच्चों का साथ नहीं छोड़ा। इस तरह एक दिन इन्होने रेलवे स्टेशन पर एक बच्चे को देखा जो अकेला था और रो रहा था जिसके बाद उन्होने उस बच्चे के माता-पिता को ढूंढने की काफी कोशिश की, लेकिन घंटों ढूंढने के बाद भी उसका कोई अपना नहीं मिला। तो वो उसे अपने साथ ले आईं। इस घटना के बाद उन्होने अपने यहां ऐसे बच्चों को पनाह देना शुरू किया जिनका या तो कोई नहीं है या जिन बच्चों को उनके माता-पिता छोड़ देते हैं। मनन के मुताबिक, 

“जब मैंने अनाथ बच्चों को अपने पास रखने का फैसला किया तो उसके लिये मैं खुद ही जगह जगह जाकर स्टीकर चिपकाने का काम करती थीं, जिसमें मैंने अपना फोन नंबर भी दिया होता था, ताकि अगर किसी को कोई अनाथ बच्चे मिले तो मुझ से सम्पर्क कर सके।” 

इसके अलावा उन्होने साल 1998 में ‘सुरमन संस्थान’ की स्थापना की। जहां पर वो उन बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी जरूरतों को पूरा करती हैं। मनन फिलहाल 111 बच्चों की देखभाल कर रही हैं, जबकि साढ़े चार सौ से ज्यादा बच्चों को वो उनके माता पिता से मिलवा चुकी हैं। फिलहाल ये सभी बच्चे उनके अपने घर पर ही रहते हैं, अनाथ बच्चों के लिए मनन ने एक हेल्पलाइन नंबर भी शुरू किया है जहां पर कोई भी फोन कर उनको अनाथ बच्चे की जानकारी दे सकता है, जिसके बाद वो उस बच्चे को अपने पास लाने का इंतजाम खुद करती हैं।

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‘सुरमन संस्थान’ में रहने वाले अनाथ बच्चे नवजात से लेकर 19 साल तक की उम्र के हैं। इनमें से कोई बच्चा आज एमबीए की पढ़ाई कर रहा है तो कोई कॉलेज में है तो कुछ बच्चे स्कूल भी जाते हैं। इसके अलावा इनका एक बच्चा गुडगांव में वेबसाइट डिजाइनिंग का काम करता है। ये अपने इन बच्चों को पढ़ाई और खेलकूद के अलावा मार्शल ऑर्ट और कई तरह की वोकेशनल ट्रेनिंग भी दिलाती हैं। ‘सुरमन संस्थान’ में रहने वाले बच्चों में 70 प्रतिशत लड़कियां हैं। मनन के मुताबिक, 

“आज भी लड़कियों को बोझ समझा जाता है, यही वजह है कि कई बार लड़कियों के माता-पिता मेरे पास खुद आते हैं और अपनी बच्चियों को छोड़ जाते हैं। जो की काफी दुख की बात है।” 

मनन अब अपने साथ रह रहे बच्चों के लिये अलग से जयपुर के निकट सीकर रोड पर घर बनवा रहीं हैं, ताकि यहां पर बच्चे आराम से रह सकें। यहां पर करीब एक हजार बच्चों के रहने की व्यवस्था होगी। खास बात ये है कि ये सारा काम बिना किसी सरकारी मदद के करती हैं। आज ‘सुरमन संस्थान’ में ना सिर्फ बच्चे रहते हैं बल्कि ऐसे बुजुर्ग भी रहते हैं जिनको उनके परिवार वालों ने या तो छोड़ दिया है या फिर वो महिलाएं जो विधवा हो गई हैं उनको मनन ने परिवार सहित गोद ले लिया है। मनन के मुताबिक ऐसे लोगों की संख्या करीब 12-13 है। ये सभी लोग उन बच्चों की देखभाल का काम भी करते हैं। जो यहां पर रहते हैं। यहां पर रहने वाले सभी लोग एक परिवार की तरह रहते हैं फिर चाहे वो बच्चे हों या बुजुर्ग।

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बच्चों का खर्च चलाने के लिए मनन काफी मेहनत करती हैं। वो फैशन डिजाइनिंग के अलावा पेंटिंग करती हैं, थियेटर करती हैं। लोगों को जागृत करने और जो बच्चे उनके पास रहते हैं उनका खर्चा चलाने के लिए इन्होने कई शॉर्ट फिल्में भी बनाई हैं। इन सब से इतर मनन एक अच्छी गायक भी हैं। यही वजह है कि अब इनकी योजना अपना सोलो एल्बम बाजार में उतारने की है। मनन का मानती हैं, 

“बच्चों की भावनात्मक चुनौतियों से निपटना काफी मुश्किल भरा काम है। ऐसी दिक्कत तब ज्यादा आती है जब उनका कोई अपना छूट जाता है या वो छोड़ देता है। वो वक्त उन बच्चों के लिए भी और मेरे लिये भी काफी चुनौतीपूर्ण होता है।” 

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