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‘तानाबाना’, कारीगरों और बुनकरों के जीवन के तानेबाने को सही दिशा देता...

भागलपुर सिल्क के बने रेशमी साड़ी, स्टोल, दुपट्टे, कुर्ते और अन्य वस्त्रों को हाथ से करते हैं तैयारवर्ष 2009 में विकाश के पाठक ने कारीगरों और बुनकरों की सहायता करने के उद्देश्य से की स्थापनाकारीगरों द्वारा तैयार किये गए उत्पादों को कैश-आॅन डिलीवरी पर उपभोक्ताओं को करवाता है उपलब्धभविष्य में खुद को भारतीय हस्तशिल्प का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्रांड के रूप में स्थापित करने का है इरादा

Pooja Goel
14th Oct 2016
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फैबइंडिया के विकास और सफलता की कहानी ने देश के हथकरघा उत्पादों के कई उत्पादकों को अपने उपभोक्ताओं तक सीधी पहुंच बनाने के रास्ते तलाशने के अवसर प्रदान करने के लिये प्रेरित करने का काम किया है। फैबइंडिया को माल उपलब्ध करवाने का काम करने वाले ‘तानाबाना’ के संस्थापक विकाश के पाठक कहते हैं, ‘‘हम समय के साथ एक ऐसा मंच तैयार करने की प्रक्रिया मे हैं जिसकी सीधी पहुंच खुदरा बाजार तक हो क्योंकि हमारा यह मानना है कि अगर आपको बुनकरों और कारीगरों को नियमित रूप से अधिक काम उपलब्ध करवाना है तो तो यह हमारे जैसे संगठनों के लिये बेहद आवश्यक है कि हम कार्य के लिये बड़े संस्थानों पर निर्भरता छोड़ने के लिये आगे आएं।’’

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वर्ष 2009 में बिहार के भागलपुर जिले में स्थापित हुई ‘तानाबाना’ एक ऐसा आत्मनिर्भर संगठन खड़ा करने की दिशा में सकारात्मक प्रयास है जिसमें कारीगरों, बुनकरों, प्रमोटरों और निवेशकों सबका सह-स्वामित्व हो। बुनकरों के साथ काम करते हुए ‘तानाबाना’ मुख्यतः मूल्य संवर्धन और ओवरटाइम पर अपना ध्यान केंद्रि करता है और इनका लक्ष्य एक ऐसा व्यवहार्य आॅलनाइन मंच बनकर उभरने का है जो खुदरा ग्राहकों तक इन हस्तशिल्प उत्पादों की बिक्री के लिये सीधी पहुंच रखता हो।

‘तानाबाना’ रेशम और हाथ से बुने हुए विभिन्न उत्पादों जैसे रेशमी साड़ी, स्टोल, दुपट्टे, कुर्ते और अन्य वस्त्रों को भागलपुर सिल्क से तैयार करता है और फिर इन्हें फैबइंडिया समेत कई छोटे-बड़े विक्रेताओं को बिक्री के लिये उपलब्ध करवाता है। इसके अलावा इन्होंने अहमदाबाद में अपने कुछ उत्पादों को ‘सेवा’ के माध्यम से और कुछ अन्य स्टोर्स में अपने ब्रांड ‘तानाबाना’ के नाम से बेचना प्रारंभ किया है। खुदरा बिक्री केंद्रो से मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया और और फेसबुक और वेबसाइट जैसे माध्यमों पर लगातार बढ़ रही पूछताछ की संख्याओं ने भी इन्हें बड़े पैमान पर आॅनलाइन खुदा बिक्री की संभावनाएं तलाशने के लिये प्रेरित किया है। दिलचस्त बात यह है कि बिहार और झारखंड में सिर्फ ‘तानाबाना’ ही एक ऐसा संस्थान है जो अपने उपभोक्ताओं को कैश-आॅन डिलीवरी की सुविधा मुहैया करवा रहा है। इनकी अधिकतर बिक्र फेसबुक के माध्यम से होती है जहां उपभोक्ता ई-मेल के माध्यम से इन्हें अपनी पसंद के उत्पाद का कोड भेज देता है और फिर ये कैश-आॅन डिलीवरी के आधार पर उसके द्वारा उपलब्ध करवाये गए पते पर उत्पाद का वितरण कर देते हैं।

अपने उद्यम के मूल में स्थिरता के साथ ‘तानाबाना’ अपने कारीगरों को डिजाइन, प्रशिक्षण, कौशल विकास, क्रेडिट और कंपनी में हितधारकों के रूप में उन्हें शामिल करके एक आत्मनिर्भर समुदाय का निर्माण करने के लिए कारीगरों के साथ मिलकर काम करता है। इसके अलावा इस समुदाय की भूमिका के विस्तार की दिशा में पहले करते हुए ‘तानाबाना’ की सिलाई इकाइयों का संचालन करने वाले सामान्य सुविधा केंद्र को भी जल्द ही इनके सुपुर्द करने की योजना है। हालांकि इसके बाद भी कंपनी इन्हें समर्थन करना और अन्य तरीकों से सहायता करना जारी रखेगी। इसके अलावा ‘तानाबााना’ कुछ औपचारिक और अनौपचारिक समूहों की स्थापना करने पर भी विचार कर रहा है जिसमें बुनकरों और कारीगरों के अलावा महिलाओं को भी सदस्य बनने के लिये प्रेरित किया जाएगा ताकि वे मजदूरी, मूल्य निर्धारण इत्यादि जैसे मुद्दों पर एक सामूहिक निर्णय लेने में सक्षम हो सकें और यह उन्हें व्यक्तिगत शोषण से बचाने के लिये एक बेहतर उपकरण भी साबित होगा।

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हालांकि विकाश ने ‘तानाबाना’ की स्थापना की थी लेकिन हाल ही में स्पष्ट रूप से संस्थान की निर्भरता एक ही व्यक्ति के कंधों से हटाने और इसे इस समुदाय के हवाले करने के काम को करने के लिये एक नए सीईओ के रूप में सुजीत कुमार झा भी इसमें शामिल हुए हैं। विकाश कहते हैं, ‘‘मैं यह सुनिश्चित करने के प्रयास कर रहा हूँ कि समय के साथ इनकी मुझ पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होती जाए। इसे बेहतर कुछ नहीं हो सकता कि आपने जिस संगठन की नींव रखी हो और तिनका-तिनका जोड़कर तैयार किया हो वह आपकी निर्भरता से मुक्त होकर अपने पांवों पर खड़े होने में सक्षम हो जाए।’’

‘तानाबाना’ अपने उत्पादों के बेचने के लिये आॅनलाइन और आॅफलाइन दोनों ही प्रकार की मार्केटिंग रणनीतियां तैयार करता है। वे थोक के आादेशों के लिये फैबइंडिया और अन्य उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं। वे आनलाइन प्रदर्शनियों और सेल के अलावा आॅफलाइन खुदरा विक्रेताओं के साथ भी भागीदारी करते हैं। विकास बताते हैं, ‘‘आने वाले दिनों में हमारा मुख्य ध्यान आॅनलाइन मार्केटिंग के अलावा एक ऐसा मंच तैयार करने पर होगा जो सीधे उत्पादकों से विभिन्न हस्तशिल्प उत्पादों को बिक्री के लिये इकट्ठा कर सके।’’

इट्सहैंडमेड, अपूर्व, क्राफ्टइन (उत्तर पूर्वी हस्तकला) और कई अन्य चुनौतियों के दौर में ‘तानाबाना’ देशभर के हस्तशिल्प उत्पादकों के लिये एक बाजार तैयार करने की दिशा में अग्रसर है और इनका इरादा खुद को एक ऐसे एकीकृत ब्रांड के रूप में स्थापित करने का है जो भारत के हस्तशिल्प का प्रतिनिधित्व करता हो। विकाश कहते हैं, ‘‘इसी के साथ थोक उत्पादन की दिशा में हमारा सारा ध्यान सिर्फ रेशम के उत्पादों का उत्पादन करने में लगा रहेगा और बुनाई का काम हमेशा हमारे काम के केंद्र में ही रहेगा।’’

ई-काॅमर्स के क्षेत्र में आए जबर्दस्त उछाल ने निश्चित ही उत्पादकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता पाई है और अब वे आॅफ-सीजन के दौरान खुदरा विक्रेता की तरह अपना कार्य संचालित कर अपने राजस्व में वृद्धि करने के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि इससे कारगर समुदाय को पूरे वर्षा काम और आमदनी होगी जिससे उसके जीवनस्तर में सुधार आ सकेगा। लेकिन यह केवल एक ऐसी व्यवस्था रहेगी जो इनके मुख्य व्यवसाय यानि बड़े संस्थानों को माल तैयार करके बेचने के साथ काम करेगी।

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