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कश्मीरी युवा शाहिद रशीद फैशन डिज़ाइनिंग कोर्स की फीस अदा करने के लिए बने थे मेंहदी डिज़ाइनर

जब धुन पक्की हो तो चाहे कितनी दिक्कतें, समस्याएँ सामने आयें, लेकिन जुनून कहता है कि आगे बढ़ते जाएँ। आज एक अच्छे फैशन डिज़ाइनर के रूप में अपने इलाके में ख्याति अर्जित करने वाले शाहिद रशीद के सामने भी कई समस्याएँ थी। सबसे पहले तो वेे अपने माता-पिता को ही नहीं बता सकते थे कि वे फैशन डिज़ाइनर बनने जा रहे हैं। इसकी फीस भरने के लिए उन्होंने दुल्हनों को हाथों में मेंहदी सजाने का काम किया, लेकिन जानते नहीं थे कि यह उनकी खास पहचान बन जाएगी। आज वे फैशन डिज़ाइनर भी हैं और मेंहदी डिज़ाइनर भी....

YS TEAM
17th Jul 2016
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कहावत मशहूर है 'जहां चाह वहां राह'। दक्षिण कश्मीर के ज़िला पुलवामा के 'पथन' नामक गांव के रहने वाले युवा शाहिद रशीद ने दसवीं कक्षा में फैशन डिज़ाइनर बनने का सपना देखा। बारहवीं कक्षा के बाद जब फैशन डिज़ाइनिंग कोर्स में दाख़िला लेने के लिए माता पिता से अनुमति मांगी तो उन्होंने मना कर दिया। हालांकि शाहिद ने अपने माता-पिता की इच्छा के अनुसार श्रीनगर के अमर सिंह कॉलेज में बी.कॉम में दाख़िला ले लिया, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने अपने घरवालों की बिना अनुमति के फैशन डिज़ाइनिंग पाठ्यक्रम की 'प्रवेश परीक्षा' में भाग लिया और इसमें सफलता हासिल करके 'बैचलर्स डिग्री इन फैशन डिज़ाइनिंग एंड फैशन जर्नलिज्म' में प्रवेश लिया और इस तरह दोनों पाठ्यक्रमों को एक साथ पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत और संघर्ष में जुट गये।

दोनों पाठ्यक्रमों को एक साथ पूरा करना शाहिद के लिए कोई बड़ी समस्या नहीं थी, बल्कि समस्या यह थी कि उनके पास फैशन डिज़ाइनिंग कोर्स की फीस का भुगतान करने के लिए पैसे नहीं थे। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और फीस का भुगतान करने के लिए शादी समारोहों में दुल्हनों को मेंहदी, युवाओं के हाथों पर टैटू बनाने से लेकर सोशल वेबसाइटों के माध्यम से परिधान बेचना शुरू किया।

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शाहिद कहते हैं 'बी काम के सिलसिले में घाटी से बाहर ज़रूरी काम का बहाना बनाकर घर वालों से किसी तरह दिल्ली जाने की अनुमति प्राप्त कर ली। दिल्ली में, मैं पर्ल एकेडमी में फैशन डिज़ाइनिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए परीक्षा दी, जिसके लिए मुझे छह हजार रुपये बतौर प्रारंभिक शुल्क का भुगतान करना पड़ा था। यह परीक्षा राष्ट्रीय स्तर की होती है। वहाँ मुझे मेरिट के आधार पर शुल्क में पच्चीस प्रतिशत की छूट दी गई, लेकिन मुझे 75 प्रतिशत फीस तो खुद अदा करनी थी।'

'यह फीस जमा करने के लिए मैं मेंहदी डिज़ाइन और टैटू बनाना शुरू किया। इसके अलावा श्रीनगर के प्रसिद्ध संडे बाजार से अलग चीजें ख़रीदता था और इन चीज़ो को अपने हिसाब से मॉडिफ़ाइ करके दस प्रतिशत लाभ जोड़कर बेचता था। यह बातें सोशल वेबसाइटों की मदद से बेचता था। '

शाहिद का कहना है 'फैशन डिज़ाइनिंग कोर्स की फीस लगभग चार से छह लाख रुपये थी। मैंने परिवार से भी पैसे लिए, मगर उनसे मैंने नहीं बताया कि फैशन डिज़ाइनिंग में बैचलर्स डिग्री कर रहा हूँ। बैचलर्स डिग्री के तीसरे वर्ष में उन्हें पता चला कि फैशन डिज़ाइनिंग पाठ्यक्रम कर रहा हूँ। मैं लैपटॉप, कैमरा, बाईकल के लिए पैसे लिए थे। मैं यह सब चीज़ें नहीं ले, बल्कि फीस अदा करता रहा। जब घर वालों को पता चला तो उन्होंने बताया कि आप पहले ही बता देना चाहिए था, हम अपना पूरा सहयोग करते।'
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शाहिद रशीद जिन्होंने अब श्रीनगर के क्राफ्ट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट(च्यूट) में एमबीए पाठ्यक्रम में दाख़िला लिया है, का कहना है कि मेंहदी डिज़ाइन हमेशा अपने जीवित का हिस्सा बने रहेगी। कहते हैं 'मेंहदी डिज़ाइन हमेशा मेरे जीवन का हिस्सा बना रहेगा। अगर मैं खुद नहीं लगाऊँगा, लेकिन मैं लोगों को सिखाता रहूँगा। अपने गृह जिले पुलवामा में फैशन एकेडमी खोलने का इरादा रखता हूँ। वहाँ इच्छुक युवाओं को फैशन डिज़ाइन की मूल बातें सिखाने के अलावा मेंहदी लगवाना भी सिखाउँगा। मैं इस एकेडमी को विभिन्न राष्ट्रीय संस्थाओं से जोड़ने का प्रयास भी करूँगा।''

शाहिद के अनुसार घाटी में मेंहदी डिज़ाइन का दायरा बहुत व्यापक है और विशेष रूप से लड़कियाँ यह काम विकल्प करके उसे अपना स्थायी पेशा बना सकती हैं। 'मैं सर्दियों में च्यूट में मेहंदी डिजाइन पाठ्यक्रम शुरू किया जिसमें तीस लड़कियों ने दाखिला लिया था। उन्हें अब गृह लिए कुछ महीने भी नहीं हुए हैं कि उन्हें ग्राहकों से जबरदस्त रेस्पांस मिल रहा है। कुछ दिन पहले इन लड़कियों ने मुझसे कहा कि सिर जब आप हम से दो हजार रुपये बतौर फीस मांगे थे तो उस समय हमें यह बहुत बड़ी रकम लगी थी लेकिन आज हम एक ग्राहक से चार हजार रुपये की मांग करते हैं। '

हालांकि शाहिद का कहना है कि हालांकि कश्मीर में मेंहदी डिज़ाइन ज्यादातर लड़कियाँ ही करती हैं, लेकिन एक दायरे में रहने और इंटरनेट कम उपयोग करने की वजह से वह इससे संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त नहीं कर पाती हैं। कहते हैं

 'जब मैं फैशन डिज़ाइनिंग पाठ्यक्रम शुरू किया तो मुझे लगा कि वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मुझे कोई काम हाथ में लेना होगा। मैं मेंहदी डिज़ाइनिंग शुरू कर दी और तीन घंटे की सेवा के लिए दो हज़ार रुपये लेता था। जो मैं फैशन डिज़ाइनिंग के दौरान स्केच बनाने सीखे थे, उन्हें मैं वास्तव में मेंहदी लगाते समय दुल्हन के हाथों में बनाता था। इस में, मैंने तरक्की भी की। में मोती और ग्लीटर भी हाथ पर बनाता था और इसके अलावा मेंहदी के विभिन्न रंगों का उपयोग करता था। '

शाहिद फिलहाल मेंहदी डिज़ाइन के साथ जुड़े होने के अलावा सिटी एफएम जे के लिए बतौर रेडियो जॉकी भी काम कर रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न स्कूलों में आर्ट टीचर के रूप में भी काम कर रहे हैं। बतौर मेंहदी डिज़ाइनर अपनी सेवा के बारे में बताते हैं, "हाल ही में यहां (कश्मीर) यूरोप से एक पर्यटक महिला आई हुई थीं, जिन्होंने मुझे फोन करके मेंहदी लगवाने के लिए ट्यूलिप गार्डन बुलाया। जब मैंने उनके हाथों पर मेंहदी लगाई तो वह बेहद खुश हुई और उन्होंने मुझे यूरोप भी आमंत्रित किया। '

'मैं मेंहदी डिज़ाइन घर सेवा प्रदान करता हूँ। हालांकि होम सेवा के लिए मेरी कुछ शर्तें होती हैंं, जैसे पक एंड ड्रॉप सहूलियत होनी चाहिए। एक सप्ताह में दो से पांच आर्डर पूरे करता हूँ। मेरे ज्यादातर ग्राहकों का संबंध दक्षिण कश्मीर और श्रीनगर से है। मैंने लोगों तक पहुंचने के लिए कभी भी पारंपरिक विज्ञापन का सहारा नहीं लिया। मेरे ज्यादातर ग्राहक जो लोग मुझे जरिए सोशल मीडिया खासकर शुल्क के माध्यम से जानते हैं। फेसबुक पर जो मेरे दोस्त और फ़ालोअर्स हैं, मैं उनकी बहुत इज्जत और सम्मान करता हूँ, क्योंकि उन्हीं की वजह से मेरे ग्राहकों का दायरा दिन प्रति दिन व्यापक होता जा रहा है।'

शाहिद का कहना है कि हालांकि वह बचपन से ही मेंहदी लगाने की कला जानते थे लेकिन वह 2010 तक यह जानते ही नहीं थे कि फैशन डिज़ाइनिंग भी कोई चीज़ होती है। उनका कहना है कि 2010 में ही सोशल वेबसाइटों खासकर फेसबुक का उपयोग करने के बाद उन्हें पता चला कि फैशन डिज़ाइनिंग भी है, जिसमें भविष्य बनाया जा सकता है।

शाहिद कहते हैं, "मैं एक गाँव में पला हूँ। मुझे नहीं पता था कि यह फैशन डिज़ाइनिंग क्या चीज़ होती है। और इसमें भी पाठ्यक्रम और डिग्री की जाती हैं। हाँ यह ज़रूर जानता था कि मैं बचपन से ही पेंटिंग और ड्राइंग में शौक रखता था, लेकिन मुझे नहीं पता था कि भविष्य में इससे अपने जीवन पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। साल दो हज़ार दस में मैंने सोशल वेबसाइटों खासकर फेसबुक और वीडियो शेरिंग वेबसाइट यूट्यूब पर अपना खाता खोला और फैशन डिजाइनिंग से संबंधित कई पेजों को लाइक किया। उन पेजों पर विभिन्न संस्थाओं में फैशन डिज़ाइनिंग के पाठ्यक्रमों में दाखिले से संबंधित विज्ञापन दिखाई देते थे। फिर मैंने फैशन डिज़ाइनिंग से जुड़े विभिन्न लोगों और विभिन्न संस्थाओं के आयोजकों से संपर्क किया। मैंने उनसे फैशन डिजाइनिंग के भविष्य और प्रवेश के लिए आवश्यक जानकारी हासिल कीं। इसके बाद मैंने मन बना लिया कि मुझे बस यही करना है।'

यह पूछे जाने पर कि क्या माता पिता उनके फैशन डिजाइनिंग और मेंहदी डिज़ाइन से संतुष्ट हैं, तो शाहिद का सपना था 'ज्यादातर दिन के समय में मेंहदी डिजाइन के लिए जाता हूँ। कुछ दिन पहले एक ग्राहक ने मुझे करीब रात साढ़े नौ बजे फोन किया और बताया कि उन्होंने नई दिल्ली से एक मेंहदी डिज़ाइनर को आमंत्रित किया था, जो अज्ञात कारणों से नहीं आ सकी। उन्होंने मेरे घर गाड़ी भेजी, मैं गया और क़रीब रात के एक बजे वहाँ से वापस लौट आया। घर पहुँचकर मैं दंग रह गया कि मेरे घर वाले सोये नहीं थे, बल्कि मेरा इंतजार कर रहे थे।'
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शाहिद कहते हैं कि उनका सपना है कि कश्मीर में जो हैंडी क्राफ्ट की अधिकाधिक वस्तुएँ तैयार होती हैं जैसे पीश्मीना शॉल, पेपर माशिय आदि उन्हें दुनिया केवल कला की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह फैशन के रूप में प्रसिद्ध होनी चाहिए। कहते हैं 'हाल ही में नेशनल इंस्टीट्यूट चयूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी में मास्टर्स डिग्री के लिए परीक्षा हुई। चूंकि इसका शुल्क कुछ अधिक था और मुझे लगा कि मैं भुगतान नहीं कर पाउंगा, तो मैंने वहाँ प्रवेश लेने का अपना इरादा छोड़ दिया। और निर्णय लिया कि कश्मीर में ही कुछ करना होगा। यहाँ क्राफ्ट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (च्यूट) कश्मीरी शिल्प में पाठ्यक्रम चालाता है, वहाँ मैंने एमबीए के लिए प्रवेश परीक्षा में भाग लिया और पास भी कर लिया। मेरा अब यह सपना है कि कश्मीरी शिल्प को बढ़ावा दूँ।'

शाहिद लंबे बाल और सुंदर व्यक्तित्व के मालिक के रूप में अपनी छवि भी डिज़ाइनरों वाली बना ली है। बतौर फैशन डिज़ाइनर शाहिद ने काफी नाम कमाया है। उन्होंने आई आई एफ टी में 'बेस्ट परिधान डिज़ाइनर आइकॉन पुरस्कार' भी जीता है। जबकि इस समय वे 'एस आर बी स्टाइल स्टेटमेंट' के नाम से अपना ब्रांड रखते हैं।

मूल- ज़हूर अकबर

अनुवाद- एफ एम सलीम

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