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हैरत में डाल देती है दिव्यांग कवयित्री नंदन की ऊंची उड़ान

3rd Jan 2018
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'खुशबू बनकर गुलों से उड़ा करते हैं, धुआं बनकर पर्वतों से उड़ा करते हैं, हमें क्या रोकेंगे ये ज़माने वाले, हम परों से नहीं हौसलों से उड़ा करते हैं।' ये लाइनें होशियारपुर पंजाब की रहने वाली बड़े जीवट की दिव्यांग कवयित्री इंद्रजीत कौर नंदन पर सटीक बैठती हैं...

इद्रजीत कौर 'नंदन'

इद्रजीत कौर 'नंदन'


बचपन से ही मस्कूलर डिस्ट्रोपी बीमारी से पीड़ित होने के कारण वह अपनी टांगों पर खड़ी नहीं हो सकतीं, इसके बावजूद उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में प्रदेश में ही नहीं, पूरे देश भर में अपना नाम रोशन किया है। 

दिव्यांग होते हुए भी अपने पैरों पर खड़ी होने की जब कोई युवा कवयित्री जिद ठान ले तो उसकी हर हरकत पर जमाने की नजर जम जाती है तो उसके हौसले तमाम-तमाम लोगों गगनचुंबी परवान भरने का सबब बन जाते हैं। हमारे देश में पंजाब की एक ऐसी ही रचनाकार हैं इंद्रजीत कौर नंदन। वह होशियारपुर (पंजाब) के बजवाड़ा की रहने वाली हैं। जिंदगी और समाज की जद्दोजहद से तो खुद वह जूझ ही रही हैं, 'अपना' ग्रुप के मंच से परेशान हाल महिलाओं को भी जीवन की दिशा दे रही हैं। नंदन का जन्म 2 सितंबर 1778 को हुआ है। वह पंजाबी साहित्य एवं भाषा में एमए हैं, साथ ही पंजाबी और हिन्दी में कविता लेखन, दर्शन, मनोविज्ञान और इतिहास में विशेष रुचि रखती हैं।

देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ, लेख का प्रकाशित होते रहते हैं। इंदरजीत पिता गुरचरण सिंह रेलवे से रिटायर्ड हैं और मां कुंदन कौर सरकारी स्कूल से हैड मिस्ट्रैस पद से रिटायर हुई। माता-पिता के दिए हौंसले के चलते इंदरजीत ने 1994 में बीकॉम, 97 में एमकॉम अर्थशास्त्र की। इंदरजीत ने बताया उसकी बीमारी के कारण पिता गुरचरण सिंह ने रेलवे से साढ़े चार साल पहले ही रिटायरमेंट ले ली। जिसके बाद 1999 में पिता ने उसका इलाज विशाखापटनम से करवाया और वो वॉकर के सहारे चलने लगी।

बचपन से ही मस्कूलर डिस्ट्रोपी बीमारी से पीड़ित होने के कारण वह अपनी टांगों पर खड़ी नहीं हो सकतीं, इसके बावजूद उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में न प्रदेश में ही नहीं, पूरे देश भर में अपना नाम रोशन किया है। नंदन ढाई साल की उम्र में ही पोलियोग्रस्त हो गई थीं। उस वक्त उन्हें बुखार हुआ था। दवा खिलाकर मां ने बुखार में पंखे के नीचे लिटा दिया था। बुखार थोड़ा कम होने पर वह उठी थीं और नाच रहीं थीं मगर, नाचते-नाचते एकदम गिर गईं। चेकअप करवाने पर पता चला कि वह पोलियोग्रस्त हैं।

एक कार्यक्रम में नंदन (सबसे बीच में)

एक कार्यक्रम में नंदन (सबसे बीच में)


नंदन के उर्दू और पंजाबी में दो उपन्यास 'दोआबा' और नॉवेल 'रात' प्रकाशित हो चुके हैं तथा 'चिक्कड़ रंगी मूर्ति' उपन्यास 'कशमकश' नाम से हिंदी अनुवाद प्रकाशनाधीन है। उनकी एक किताब है 'शहीद भगतसिंह : अनथक जीवनगाथा'। इस पुस्तक पर डॉ. ‍तजिंदर विरली का कहना है कि इंद्रजीत की यह लंबी कविता शहीद भगतसिंह के क्रांतिकारी बिंब को बड़ी खूबसूरती से उभारती है। भगतसिंह को नायक के रूप में उभारने वाला बहुत सारा काव्य रचा गया है, परंतु यह काव्य भगतसिंह की विचारधारा के साथ जोड़कर लिखा गया है।

यह इस समय की बहुत बड़ी जरूरत थी। उन्होंने बुद्ध की पत्नी यशोधरा पर भी पंजाबी में कविता लिखी है, जो पंजाब में अपनी तरह की पहली कविता मानी जाती है। इंदरजीत वॉकर के सहारे चलती हैं। पंजाबी थिएटर के भीष्म पितामह जोगिंदर सिंह बाहला की जीवन गाथा 'दिस हद्दां तो पार, चुप दे रंग और कविता, दे माफी' की रचना के बाद अब प्रकृति पर काव्य रचना में जुटी हैं। इंदरजीत को 2012 में मदर टैरेसा पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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पंजाबी साहित्य रचना में संस्कृति पुरस्कार लेने वाली वह एक मात्र पंजाबी लेखिका हैं। यह सम्मान उन्हें 2008 में मिला था। 2007 में साहित्य अकेडमी ने उन्हें सम्मानित किया। 2010 में दैनिक भास्कर ने अचीवमेंट क्षेत्र में भास्कर वुमेन अवार्ड दिया। 2013 में स्वामी विवेकानंद स्टेट अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस अवार्ड मिला। मात्र पैंतीस साल की उम्र में राष्ट्रीय संस्कृति पुरस्कार पाने वाली वह पंजाब की पहली साहित्यकार हैं, जिसने कि पंजाबी लिट्रेचर को राष्ट्रीय पहचान दिलवाई है। ऐसे जीवट के धनी लोगों पर कहते हैं न कि....

मंजिल उन्ही को मिलती है,

जिनके हौसलों मे जान होती है,

पंख से कुछ नहीं होता,

हौसलों से उड़ान होती है।

यह तो रही इंद्रजीत कौर नंदन की साहित्यिक पहचान, वह इससे भी जटिल चुनौतियों के साथ 'अपना' संगठन चला रही हैं। यह ग्रुप महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा होने का हुनर सिखाता है। इस ग्रुप में नमकीन स्नैक्स, भुजिया, पापड़, मट्ठी , पीनट्स, कुशन कवर आदि बनाकर महिलाएं अपनी जीविका चलाती हैं। ग्रुप की महिलाएं हैंडीक्राप्ट से जुड़े काम भी करती हैं। कुछ वर्ष पहले बजवाड़ा के एक छोटे से कमरे में 12 सदस्यों का यह सेल्फ हेल्प ग्रुप सक्रिय हुआ था। ग्रुप का हर सदस्य विपरित परिस्थितियों से लड़ते हुए आज अपने दम पर खड़ा है। ग्रुप में अध्यक्ष कुंदन कौर के अलावा सचिव निशा, कैशियर शिवाली चौधरी नेतृत्व दे रही हैं।

इंद्रजीत ने वर्ष 2015 में 'ऋषि फाउंडेशन' का भी गठन किया था। उनकी देखरेख में 40 सदस्य शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में कार्यरत हैं। इंदरजीत नंदन के हौंसले को देखते हुए कृषि विभाग के पूर्व जिला ट्रेनिंग अधिकारी डॉ. चमन लाल वशिष्ट इंदरजीत को शक्ति कहकर पुकारते हैं। उन्होंने 2014 में विकलांगता दिवस पर एबिलिटी ज्वाइंट लाइबिलिटी ग्रुप बनाया था। इसका उद्देश्य शारीरिक रूप से अक्षम लोगों में आत्मविश्वास पैदा कर उनको आत्मनिर्भर बनाना है। इंदरजीत ग्रुप की कैशियर हैं। नंदन के बारे में कहा जा सकता है....

अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल

हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया।

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