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'नगद की कमी से जूझते लोगों को अपना मन बनाने दिया जाए, यह सबसे रोचक और सबसे परेशानी भरा समय है'

इस घोषणा ने राजनीति का जो रंग बदला था, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। अब दो हफ्ते से अधिक समय बीत चुका है, राजनीतिक लकीरें खिंची जा चुकी हैं और साफ़ तौर पर दो गुट देखे जा सकते हैं। ऐसा दर्शाया जा रहा है कि मोदी जी का यह कदम देश को भ्रष्टाचार मुक्त कर देगा। काले धन और भ्रष्टजनों के विरुद्ध युद्ध का यह उनका अपना तरीका है। मेरे लिए यह बात हजम करने योग्य नहीं है।

YS TEAM
24th Nov 2016
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वरिष्ठ पत्रकार और आम आदमी के नेता आशुतोष की कलम से....

 अचानक मेरे मोबाइल की स्क्रीन चमक उठी। एक न्यूज़ फ्लैश हुई थी। प्रधानमंत्री देश को संबोधित करने वाले थे। मुझे थोडा सा आश्चर्य हुआ। क्योंकि सिवाय बॉर्डर पर दूसरी और से होने वाली फायरिंग के अलावा, जो कि आजकल एक आम खबर बन चुकी है, ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी, बाकि सब तो वैसा ही नार्मल और उबाऊ था। मेरे अन्दर का अधमरा संपादक हैरान हो रहा था। देश के लिए ऐसे संबोधन का कोई ख़ास कारण होना चाहिए। मुझे कोई ऐसा कारण सूझ ही नहीं रहा था। जैसे ही घडी की सुई आठ बजे पर रुकी, मैंने टीवी ऑन कर लिया।

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माननीय प्रधानमंत्री आतंकवाद, भ्रष्टाचार और काले धन के बारे में बात कर रहे थे। मैं अभी भी विचारशून्य था तभी यह धमाका हुआ। सरकार ने आधी रात के बाद से 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने का निर्णय लिया था। इसका उद्देश्य काले धन को समाप्त करना था। हम सब भौचक्के रह गए। मैंने तुरंत अपना पर्स निकाला जिसमें तीन 500-500 के नोट गर्दन उठाये खड़े थे। थोड़ी देर पहले जो मेरी पूँजी थे , अब अचानक से बेकार हो चुके थे, एक कागज़ का टुकड़ा बन चुके थे जो केवल उसपर अंकित रुपयों की संख्या दिखा रहे थे। वे कागज़ जो हमारा पसीना पोछने के काम तो आ सकते थे लेकिन जिनसे हम कुछ खरीद नहीं सकते थे।

मैंने और मेरे मित्रों ने सोचा बाहर जाकर कुछ खाया जाए और वक्त बीतने से पहले इन नोटों का इस्तेमाल किया जाए। हमने पेट भर कर खाना खाया। डिनर के दौरान चर्चा का विषय यही घोषणा रही, जिसे अत्यधिक साहसी और निर्भीक करार दिया जा रहा था, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या सचमुच इससे काले धन को ख़त्म करने का विचार कारगर साबित होगा? क्या वे (मोदी जी) सच में गंभीर थे? इससे उनकी राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? क्या इससे उनकी छवि अधिक प्रभावशाली हो जाएगी? उन्हें इससे फायदा होगा या नुकसान? क्या इससे आर्थिक अनुशासन बनेगा या फिर कोई हंगामा खड़ा होगा, कोई गड़बड़ हो जाएगी ?

सच कहूँ तो मैं परेशान था। मुझे लगा कि इससे उनकी पब्लिक इमेज यानि सामाजिक छवि तो ज़रूर सुधरेगी, क्योंकि उन्हें भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ते हुए देखा जा रहा था, लेकिन इससे उनके राजनीतिक लाभ पर एक बड़ा प्रश्न उठ रहा था, जिसका मेरे पास कोई जवाब नहीं था। खबरें आने लगी कि पेट्रोल पम्पों पर लम्बी कतारें देखी जा रही हैं और लोग बहुत व्याकुल और परेशान हो रहे हैं।

अगले दिन चारों और मारामारी और अराजकता का माहौल था। लोग बैंकों और एटीएम पर लम्बी कतारें लगाकर खड़े थे। विमुद्रीकरण सर्वाधिक चर्चा का विषय था। चर्चिल कहते थे कि राजनीती में एक सप्ताह का समय बहुत बड़ा होता है, लेकिन यहाँ 45 मिनट एक हफ्ते से भी लम्बे लग रहे थे। खैर, इस घोषणा ने राजनीति का जो रंग बदला था, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। अब दो हफ्ते से अधिक समय बीत चुका है, राजनीतिक लकीरें खिंची जा चुकी हैं और साफ़ तौर पर दो गुट देखे जा सकते हैं।

ऐसा दर्शाया जा रहा है कि मोदी जी का यह कदम देश को भ्रष्टाचार मुक्त कर देगा। काले धन और भ्रष्टजनों के विरुद्ध युद्ध का यह उनका अपना तरीका है। मेरे लिए यह बात हजम करने योग्य नहीं है।

2014 के चुनावों के प्रचार के दौरान, उन्होंने यह वादा किया था कि वे काला धन वापस लायेंगे और प्रत्येक देशवासी के अकाउंट में १५ लाख रुपये जमा करवा देंगे। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के पतन का प्रमुख कारण पिछली सरकार का भ्रष्ट होना ही था। संसंद में कांग्रेस 50 से कम सीटों तक सीमित रह गयी थी, जो कि पूर्णत: अनापेक्षित था। एक समय की इस सबसे व्यापक पार्टी, जिसने इतिहास में सर्वाधिक समय तक भारतीय राजनीती पर अपनी सत्ता जमाये रखी तथा बीसवी सदी की दुनिया की सबसे प्रभावशाली पार्टी के रूप में स्थापित रही, उसके पुनरोत्थान के लिए विशेषज्ञ भी संशय में थे।

मोदी जी को भ्रष्टाचार से लड़ना ही था उन पर विदेशी बैंकों, खास तौर पर स्विस बैंक, से काला धन लाने का दबाव भी था। स्विस बैंक का हम भारतीयों से बेहद प्रेम का रिश्ता है। सिर्फ उसके नाम से ही इर्ष्या और क्रोध के सम्मिलित भाव आ जाते हैं। ‘स्विस बैंक’ एक ऐसे व्यक्ति को संबोधित करती है, जो बेहद रईस है, भ्रष्ट है और जिसने हम भारतीयों को मूर्ख बनाकर अपना सारा पैसा विदेशी बैंकों में भर रखा है। वह पापी भी है और शक्तिशाली भी। यह एक विख्यात कथन है कि हर तरह के पॉलिटिशियन जो सफल हैं, उनका अकाउंट वहां ज़रूर होगा। एक विदेशी बैंक में एक अकाउंट होना इस बात का प्रमाण है कि अमुक पुरुष या स्त्री एक सफल और राजकीय पृष्ठभूमि से सम्बन्ध रखता है।

बीजेपी के सबसे वरिष्ठ और बुज़ुर्ग सदस्य तथा मोदी जी के भूतपूर्व गुरु श्री एल के अडवाणी 2009 के पार्लियामेंट के चुनावों के दौरान काले धन का मुद्दा उठाने वाले पहले व्यक्ति हैं। उन्होंने इस विषय पर कुछ प्रेस वार्ताएं भी की और अपने इलेक्शन रैलियों में कई बार इस विषय पर बात की, लेकिन उस समय वे इसे एक बड़ा मुद्दा नहीं बना पाए, क्योंकि उस समय देश विकसित हो रहा था। 2008 की वैश्विक मंदी के बाद भी अर्थव्यवस्था 9% की दर से आगे बढ़ रही थी। 2004 से भी बड़े शासनादेश के तहत मनमोहनसिंह दोबारा प्रधानमंत्री चुने गए थे। उस समय भी इस मुद्दे को तूल नहीं दिया गया, लेकिन 2011 के बाद बदलते राजनैतिक परिदृश्य में, कथन भी बदल गए।

अन्ना के आन्दोलन ने देश को गहरी नींद से जगा दिया था। भ्रष्टाचार एक नया मुद्दा बन चुका था। घोटालों पर घोटाले उजागर हो रहे थे और मनमोहनसिंह तथा सोनिया गाँधी की उन घोटालों को छुपाने की कोशिश ने उनकी छवि को धूमिल कर दिया था। कांग्रेस सबसे भ्रष्ट और शर्मनाक पार्टी बन चुकी थी। अर्थव्यवस्था गिर रही थी। वैश्विक संकटों ने इस मुद्दे को और अधिक उलझा दिया और भारत की नई आकांक्षावादी पीढ़ी ने इन पापी देवताओं को माफ़ करने से इनकार कर दिया तथा उन्हें सज़ा देने के लिए व्याकुल हो उठे। तब मोदी नाम के इस नए विचार का उद्गम हुआ। उन्होंने सफलतापूर्वक जनता की नज़रों में अपनी एक स्वच्छ और इमानदार नेता की छवि बना ली, एक ऐसा व्यक्ति जो मज़बूत था और आसानी ने बड़े निर्णय ले सकता था। सारा देश मनमोहन को निकाल कर मोदी को स्थान दे चूका था।

मोदी ने बड़े-बड़े वादे किये लेकिन जैसा कि उन्होंने दावा किया था, वे भी अपने पहले 100 दिनों में विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस नहीं ला पाए। सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद भी, वे केवल एक स्पेशल निरीक्षक टीम बना पाए जो आधारविहीन साबित हुई। आखिरकार, बीजेपी के प्रेसिडेंट अमित शाह को यह बयान देना पड़ा कि वह केवल एक जुमला था। एक वादा जो आमतौर पर राजनेताओं के द्वारा चुनावों के दौरान किया जाता है और जिसे मतदाताओं द्वारा गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। आज़ाद भारत में मोदी के चुनाव प्रचार सबसे खर्चीले प्रचारों में गिने जाते थे। यह धन का सबसे शर्मनाक दिखावा था। ऐसा माना जाता है की यह आंकडा 10000 करोड़ से 20000 करोड़ के बीच था। बड़े बड़े कॉर्पोरेट हाउसेस ने अपनी तिजोरियों के ताले खोल दिए थे। मोदी ने कभी भी उस खर्च का कोई हिसाब नहीं दिया। उन्होंने कभी इस विषय पर कोई बात भी नहीं की। इलेक्शन कमीशन के अनुसार, बीजेपी ने अपने व्यय के 80 प्रतिशत साधनों को बताने से इनकार कर दिया था। किसी आम आदमी या किसी विशेषज्ञ से पूछा जाए तो यह सब बेहिसाब काला धन था।

वे पिछले ढाई वर्षों से प्रधानमंत्री हैं लेकिन उन्होंने एक लोकपाल नियुक्त करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। यह कानून मनमोहनसिंह ने अपना ऑफिस छोड़ने से पहले लागू कर दिया था। मोदी 12 वर्षों तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उन्होंने कभी भी किसी लोकायुक्त को चार्ज नहीं लेने दिया। लोकायुक्त सरकारी और उच्चतर कार्यालयों में भ्रष्टाचार से लड्ने के संस्थान होते हैं। उनके कैबिनेट में किसी भी भ्रष्ट मंत्री के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गयी। बल्कि उन्होंने कई भ्रष्ट लोगों को मंत्री के तौर पर नियुक्त किया। उन्होंने दिल्ली की आप सरकार से एंटी करप्शन ब्यूरो भी छीन लिया।

अब उनपर देश के दो बड़े पूंजीवादी घरानों से आर्थिक सहायता लेने का गंभीर आरोप लगा है। सरकारी एजेंसियों के पास इसका अधिकारिक रिकॉर्ड भी उपलब्ध है, लेकिन प्रधानमंत्री ने किसी भी आरोप पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। अब यही मोदी हमें यह आश्वासन दे रहे हैं कि वे हमें भ्रष्टाचार मुक्त भारत देंगे और देश के सिस्टम से काले धन को ख़त्म कर देंगे। मैं इस पर कैसे विश्वास कर लूँ? क्या यह राजनीति नहीं है? सीधी और स्पष्ट राजनीति?

इसमें कोई शक नहीं है कि देश में इस कृत्य (विमुद्रीकरण) के प्रति एक केंद्रीय विचार चल रहा है। उन्हें भ्रष्टाचार से युद्ध करते हुए दिखाया जा रहा है और यह एक इमेज मेक ओवर का ही तरीका भी है। यह कहना अतिश्योक्ति होगी कि वे सफल होंगे या यह उनकी सबसे बड़ी गलती है। थोडा वक्त गुज़र जाने दिया जाए। नगद की कमी से जूझते लोगों को अपना मन बनाने दिया जाए। यह देशवासियों के लिए सबसे रोचक और सबसे परेशानी भरा समय है। चलो, इंतज़ार किया जाए। 

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