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जब सवाल आधी आबादी का हो तो सुननी होगी "आत्मा की पुकार"

25 साल के सामाजिक कार्यकर्ता कुंदन श्रीवास्तव की पहल महिलाओं के विकास और सशक्तिकरण के लिए “बी इन ह्युमॅनिटी फाउनडेशन” की स्थापना

Prakash Bhushan Singh
15th Jun 2015
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सन 2004 में इस नौजवान का सामाजिक मुद्दों और इसके सरोकारों के लिए आवाज़ उठाने की वजह से अपहरण कर लिया गया था। किंतु यह साहसी नौजवान अपहरणकर्ताओं के चंगुल से निकलने में कामयाब रहा और तब से अपना जीवन महिलाओं के विकास एवम् उनके सशक्तीकरण को समर्पित कर दिया है। आइए आपको मिलाते हैं 25 वर्षीय कुंदन श्रीवास्तव से। रक्सौल, चंपारण(बिहार) में जन्में पेशे से इंजीनियर कुंदन देश के सबसे युवा समाज सेवियों मे शुमार किए जाते हैं।

कुंदन श्रीवास्तव

कुंदन श्रीवास्तव


कुंदन को उनके द्वारा किए गये सराहनीय कार्यों के लिए "यूनिवर्सल ह्युमॅनिटी" एवं "पीठाधीश" सहित सामाजिक क्षेत्र के अनेक पुरस्कारों एवं सम्मान दिए गये हैं।

उत्साहित कुंदन अपने अतीत को याद करते हुए अपने जीवन की रोचक कहानी कुछ यूँ बयाँ करते है: "चूँकि मैं ने शिक्षा व्यवस्था पर काबिज ब्यूरोक्रेसी और माफ़िया के खिलाफ एक मुहिम शुरू कर दी थी इस वजह से उन्होंने मेरा अपहरण कर लिया था। मैं सात दिनों तक उन अपराधियों के चंगुल मे रहा। मुझे उम्मीद नही थी कि मैं बच सकूंगा, लेकिन मैंने हिम्मत नही हारी और उन सात कठिन दिनों के बाद मैं उनकी क़ैद से भागने में सफल रहा । हालाँकि भागने के दौरान मेरे एक पैर में गोली लगी और मैं घायल भी हो गया था।

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इस घटना ने उनके जीवन मे एक नया मोड़ ला दिया। घर वापस पहुँचकर कुंदन ने यह महसूस किया कि किसी अच्छे उद्देश्य के लिए इस लड़ाई को जारी रखना कितना महत्वपूर्ण है। वो कहते हैं कि "हो सकता है कि मैं हार मान लेता लेकिन तभी इस घटना ने मेरे संकल्प को और मज़बूत कर दिया।"

आगे उन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा और अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। वो बताते हैं- "यह मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था कि मेरे अपहरण के अगले साल मैंने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। इस दौरान मेरे छोटे भाई की कैंसर से मौत हो गयी और इन सब के दौरान मेरे सामाजिक कार्यों एवम् शिक्षा के क्षेत्र में मेरी व्यस्तताओं ने आगे बढ़ते रहने मे मेरी मदद की।

कुंदन ने अपने गाँव के शोषित एवम् वंचित तबके के बच्चों के लिए शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का अपना प्रयास जारी रखा और उसके बाद वो दिल्ली चले गये। वहाँ '91'मोबाइलस” नामक एक कंपनी मेंं सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप मे कार्य करने लगे। परिवार के भरण पोषण के लिए यह अत्यंत आवश्यक भी था। लेकिन जब से मैं दिल्ली आया था तभी से महिलाओं के उत्पीड़न के बारे में पढ़ा और सुना करता था। इन्हीं सब स्थितियों को देखते समझते हुए इस विषय मे कुछ करने का विचार आया और फिर “बी इन ह्युमॅनिटी फाउनडेशन” की स्थापना हुई. “बी इन ह्युमॅनिटी फाउनडेशन” एक युवाओं द्वारा संचालित संगठन है जो हर तबके और क्षेत्र की महिलायों के सशक्तिकरण के लिए कार्य करता है।

युवा वयस्कों द्वारा संचालित "बी इन ह्युमॅनिटी फाउनडेशन" एक स्वावलंबी संस्था है. वो बताते हैं-"हम किसी प्रकार का अनुदान नही लेते और अपनी आय का कुछ हिस्सा संस्था के सन्चालन के लिए देते हैं।"

इस संस्था के मध्यम से कुंदन ने न केवल महिलोयोँ के प्रति होने वाले अपराध मे उनकी मदद की है, बल्कि अनेको महिलाओं को पुनर्वासित करने का काम भी किया है. वो कहते हैं कि संगीन अपराधों, जैसे बलात्कार, एसिड एटेक, छेड़छाड़ तथा दहेज उत्पीड़न जैसे अपराधों से प्रभावित महिलाओं की सहायता के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. ऐसी स्थितियाँ पैदा की जानी चाहिए की समाज मे ससम्मान उनकी स्वीकार्यता हो सके. उनकी हौसला आफजाई होनी चाहिए, उनका उत्साह बढ़ाया जाना चाहिए.

इसके अतिरिक्त यह संस्था एक अन्य परियोजना जिसका नाम "आत्मा की पुकार" है भी चलाती है. इस परियोजना के तहत इन अपराधों को रोकने के लिए किन सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता है उनको प्रकाश में लाने का प्रयास किया जाता है।

''हम देश के विभिन्न भागों से वक्ताओं को आमंत्रित करते हैं जो लोगों को मानसिक आघात, मानसिकता और इसी तरह के अन्य विषयों पर जागरूक करते हैं." वो कहते हैं -"इस विश्वास के साथ कि यदि अपने देश से इस प्रकार के अपराधों को समाप्त करना है तो इसे जड़ से ख़त्म करना होगा. और इसके लिए हमें अपना प्रयास युवा वर्ग की मानसिकता बदलने पर केंद्रित करना होगा. और इसके लिए हम विभिन्न स्कूलों मे जाते हैं और बच्चों को लैंगिकसमानता, स्वास्थ्य एवं साफ सफाई तथा इसी प्रकार के अन्य मुद्दों पर उनका संवेदीकरण करते है।"

कुंदन ने हाल ही में एक पुस्तक भी लिखी है जिसका नाम है "टाइटल इज अनटाइटल्ड". यह पुस्तक समाज मे इन मुद्दों पर जो उदासीनता है उस पर बात करती है. शिक्षा हो या महिला सशक्तिकरण हमें इन शब्दों को सही मायनों मे समाज मे स्थापित करना होगा. और हर व्यक्ति को इसकी शुरुआत करनी होगी।

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