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ग़रीब किसानों के लिए नई रीत, किसानी में क्रांति का नाम 'नईरीता सर्विसेज़’

छोटे और गरीब किसानों को अपनी भुंगरू तकनीक से सूखे के दिनों में फसलों की सिंचाई में करते हैं मददराॅकफैलर फाउंडेशन और लीड की फैलो तृप्ति जैन और विप्लव केतन पाॅल ला रहे हैं किसानी के क्षेत्र में एक नई क्रांतिग्रामीण महिलाओं को एक साथ जोड़कर बारिश के दिनों में जल संचयन और भूमिगत जल स्तर बेहतर करने के लिये कर रहे हैं प्रेरितविभिन्न कारणों से खेती छोड़ने वाले गरीब किसानों की मदद करके उन्हें जीवन यापन में कर रहे हैं मदद

6th Jul 2015
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मौसम वैज्ञानिकों के अनुमानों पर यकीन करों तो आने वाले समय में हमें चिलचिलाती धूप और गर्मी से दो-चार होने के लिये तैयार रहना चाहिये। सूखे से ग्रसित एक और वर्ष के साथ किसानों को प्यासी धरती और बेहद कम फसल का सामना करने के लिये खुद को मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिये। प्रकृति की इस चुनौती के बड़े पीडि़तों में एक गुजरात राज्य के होने की भी संभावना है। एक गर्म और धूल भरे अहमदाबाद शहर में जहां पारा 40 डिग्री को भी पार कर जाता है वहां पर आमतौर पर आने वाले सूखे के पीछे-पीछे ही पानी का गंभीर संकट भी चला आता है।

तृप्ति जैन

तृप्ति जैन


गुजरात के इस ऐतिहासिक शहर में पैदा हुई और पली-बढ़ी तृप्ति जैन देश के दो सबसे अधिक सूखे और गर्म राज्यों गुजरात और राजस्थान की नियमित रूप से यात्रा करती रहती हैं और वे इन दोनों ही राज्यों को पूरी तरह से नाप चुकी हैं। वे उन ग्रामीण और वंचित ग्रामीण महिलाओं के साथ काम करती हैं जिनकी जिंदगी का अधिकतर भाग खराब मौसम और पानी की कमी से जूझने में निकल जाता है। वे एक सामाजिक उद्यम ‘नईरीता सर्विसेज़’ की संस्थापक और निदेशक हैं और उनकी 9 पेशेवरों की टीम ‘भुंगरू’ को सफलतापूर्वक लागू करने के प्रयासों में तत्पर रहती है। इनकी निष्पादन टीम का नेतृत्व विप्लव केतन पाॅल करते हैं जो एनएसपीएल और अशोका ग्लोबलाइज़र के निदेशक भी हैं। तृप्ति स्वयं राॅकफैलर फाउंडेशन और लीड की फैलो हैं और वे पर्यावरण इंजीनियरिंग की विशेषज्ञ के रूप में जानी जाती हैं। व्यापार के क्षेत्र के पेशेवरों से लेकर कई क्षेत्रों के इंजीनियरों तक ‘नईरीता’ की टीम एक अनुभवी लोगों का मिश्रण है। इसके अलावा इनके पास 23 महिला स्वयंसेवकों की भी शक्ति मौजूद है जिन्हें क्लाईमेट लीडर्स के नाम से जाना जाता है और ये भुंगरू के लिये यूएनएफसीसीसी मूमेंटम फाॅर चेंज पुरस्कार भी जीत चुकी हैं। ‘नईरीता’ उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक ओर गुजरात में काम कर रहे हैं और निकट भविष्य में मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में अपनी निष्पादन टीमें भेजने की तैयारी में हैं। भारत के लघुधारकों की सहायता करने की तात्कालिकता को यूएनईपी और आईएफएडी ने अपनी 2013 की रिपोर्ट जिसका शीर्षक ‘स्माॅलहोल्डर्स, फूड सिक्योरिटी एंड द एनवायमेंट’ में पहचानते हुए कहा थाः

‘‘लघुधारक विश्व के लगभग 500 मिलियन छोटे खेत-खलिहानों में से 80 प्रतिशत के भी अधिक का प्रबंधन करते हैं और विकासशील दुनिया के 80 फीसदी से भी अधिक हिस्से के भोजन की आवश्यकता को पूरा करते हैं और इस प्रकार से वे गरीबी के उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा में क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान करते हैं। जुताई लायक जमीन के विखंडन के अलावा कम होता निवेश का समर्थन आर्थिक और विकास नीति में छोटे खेत-खलिहानों को हाशिये पर डालने की बढ़ती परंपरा उनके इस योगदान के लिये काफी नुकसानदायक साबित हो रही है और इसके चलते कई लघुधारक खुद को समाप्ति की कगार पर पा रहे हैं।’’

तृप्ति ने गुजरात और राजस्थान की अपनी यात्राओं के ग्रामीण महिलाओं को सूखे के आठ महीनों के दौरान पानी के लिये वास्तव में शारीरिक संघर्ष करते हुए पाया है। और जब माॅनसून आता है तो उन्हें पानी से भरे हुए खेतों और आसपड़ोस से संघर्ष करना पड़ता है। तृप्ति कहती हैं, ‘‘यह दोनों स्थितियां एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं और दोनों ही स्थितियों ऐसे लघुधारक परिवारों के लिये बेहद खतरनाक हैं जिनका नेतृत्व अधिकतर महिलाएं ही करती हैं।’’ खाद्य सुरक्षा की नामौजूदगी में ये लोग विभिन्न तरीकों के कर्जों के जाल में फंस जाते हैं और फिर मजबूरीवश या तो इन्हें विस्थापित होना पड़ता है या फिर ये बंधुआ मजदूर की तरह जीवन व्यतीत करने को मजबूर होना पड़ता है।

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तृप्ति कहती हैं, ‘‘यही ‘नईरीता सर्विसेज़’ का मुख्य उद्देश्य है। हम महात्मा गांधी के अंत्योदय के सिद्धांत का पालन करने का प्रयास कर रहे हैं यानि कि कतार में लगे अंतिम व्यक्ति को सबसे बेहतर तरीके से सेवा करने का प्रयास। और अगर हम इस मार्ग का अनुसरण करने में सफल होते हें तो हम निख्चित ही गांधीजी की सर्वोदय की धारणा को हकीकत में बदल सकते हैं।’’

और सर्वोदय और अंत्योदय के इस चक्र के बीच में स्थित है भुंगरू। पारंपरिक रूप से भुंगरू उस खोखले पाइप को कहते हें जिसके जरिये ग्रामीण महिलाएं खाना पकाने में काम आने वाले अपने चूल्हों को जलाए रखने के लिये हवा फूंकती हैं। यह गांवों, छोटे शहरों और यहां तक कि कई शहरी मलिन बस्तियों में पाये जाने वाली एक आम वस्तु है।

‘‘इसी प्रकार बिना भुंगरू के वे अपने परिवार के सदस्यों का पेट नहीं भर सकती हैं। भुंगरू एक ऐसी तकनीकी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से छोटी जमीन के धारकों को सर्दियों के मौसम में भी पानी की उपलब्धता निश्चित की जाती है जो किसानों को आपदा से बचाती है और मानसून और खराब दिनों में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है।’’

‘‘भुंगरू की प्रत्येक इकाई सूखे के दिनों में लघुधारकों को उनके खेतों की सिंचाई के लिये करीब 1 मिलिसन लीटर पानी की उपलब्धता की गारंटी देता है,’’ तृप्ति कहती हैं। उसके अनुसार उनकी यह संस्था अबतक करीब 2 लाख हैक्टेयर से भी अधिक जमीन को सिंचित कर चुकी है। इसके अलावा बारिश वाले मानसून के दिनों में फालतू बहने वाले पानी को फिल्टर करके भूमिगत कुओं की ओर धकेल दिया जाता है। इस प्रकार से भूमिगत जल का संचयन सफलतापूर्वक हो जाता है।

नहरों इत्यादि जैसे सिंचाई के पूरक संसाधनों की गैरमौदगी में गरीब किसान सर्दियों और सूखे के मौसम में सिंचाई के लिये सिर्फ माॅनसून के दौरान होने वाली बारिश और निजी तौर पर व्यवस्था किये गए पानी पर निर्भर रहते हैं। बिना पूंजी के इन छोटे किसानों को फसल के साथ ही पानी भी पैसे देकर खरीदना पड़ता है और कई मामलों में तो यह कुल उत्पादन के आधे से भी अधिक मूल्य का होता है। जब कोई किसान पानी का पैसा चुकानी की स्थिति में नहीं होता है तो ये पानी बेचने वाले उसका बहिष्कार कर देते हैं। यहा ंतक कि पानी जैसी वस्तु की आपूर्ति भी आपूर्तिकर्ता के रहमोकरम पर निर्भर होती है। तृप्ति के अनुसार कई बार ऐसा होता है कि मजबूरी में किसान को पानी के लिये अपनी जमीन का साझा करना पड़ता है और इनमें से कई इस प्रकार के सौदें के चलते कई वर्षों के लिये अपनी जमीन से हाथ धो बैठते हैं। यही किसान गर्मियों के मौसम में कंगाल, पानी की बूंद-बूंद के लिये तरसते और बिना फसल के रह जाते हैं। इस प्रकार ये लोग पूरे साल अपने परिवार की खाद्य सुरक्षा के लिये सिर्फ माॅनसून पर निर्भर होकर रह जाते हैं और ऐसा लगभग पिछले एक दशक से होता आ रहा है। हर बार यही होता है कि किसान हमेशा ही खुद को इस खेल में हारने वाली तरफ खड़ा पाता है।

भुंगरू को सामुदायिक खेती के माध्यम से क्रियांवित किया जाता है जिससे यह न सिर्फ किसानों को शोषण से बचाता है बल्कि महिलाओं के भविष्य को भी सुरक्षित करता है। कम से कम पांच गरीब महिला किसान इस बात के लिये राजी होती हैं कि वे मिलकी भुंगरू को संचालित करते हुए सिंचाई के पानी को आपस में बांटेंगी और एक-दूसरे के खेतों में काम करने में सहयोग देंगी। भुंगरू की पहले वर्ष में स्थापना में करीब 9 लाख रुपये की लागत आती है और ऐसी इकाई 20 वर्षों तक सफलतापूर्वक प्रयोग की जा सकती है। इस प्रकार के सहयोग के द्वारा यह माॅनसून और सर्दियों दोनों ही मौसमों में करीब 21 एकड़ जमीन के लिये सफलतापूर्वक काम कर सकता है। चूंकि अधिकतर ग्रामीण परिवारों में 5 से 6 सदस्य होते हैं इसलिये एक प्रकार से यह तकनीक और योजना 30 से 50 के बीच व्यक्तियों को लाभांवित करती है। तृप्ति का कहना है कि इसके उपयोग के बाद से इन लोगों की वार्षिक पारिवारिक आय 12 हजार रुपयों से बढ़कर 38 हजार रुपयों तक पहुंच गई है और जहां पहले एक एकड़ जमीन से मात्र 8 हजार रुपये की फसल पैदा होती थी अब 25 हजार रुपये से भी अधिक की फसल पैदा होती है।

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प्रारंभिक दौर में किसानों कोे भुंगरू की अवधारणा पर भरोसा नहीं था। उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि कोई ऐसी तकनीक भी हो सकती है और उन्हें यही लगता था कि यह भी उन्हें धोखा देने का कोई नया तरीका है। तृप्ति कहती हैं, ‘‘उनके लिये तो यह एक चमत्कार है और उन्होंने इससे पहले अपने जीवन में कभी चमत्कार होते नहीं देखा था।’’

इसके अलावा तृप्ति को पुरुषों के कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ा जो भुंगरू की अवधारणा के महिलाओं के इर्द-गिर्द होने के विरोध में थे। तृप्ति कहती हैं, ‘‘हम इस विषय पर कोई भी सौदा करने के लिये तैयार नहीं थे और चूंकि परिवारों में पुरुष सदस्य प्रवासी थे इसलिये उन्हें इस बात का जरा भी अंदाना नहीं था कि उनके परिवार की महिलाओं को पानी के लिये क्या-क्या करना पड़ रहा है। उन्हें नरम पड़ने में कुद वर्षों का समय लगा। इसके अलावा तृप्ति को भुंगरू का विरोध करने वाले कुछ निजी व्यवसायिक हितों का भी सामना करना पड़ा। उनके लिये ‘नईरीता सर्विसेज़’ उनके एकाधिकार और जमीनों पर कब्जा करने के काम में खलल डाल रहा था। ‘‘यह काफी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि वे काफी रसूखदार लोग थे। लेकिन स्थानीय लोगों और कम्यून सवामित्व की सहायता से हम इन लोगों को इस चंगुल से मुक्त करवाने में कामयाब रहे।’’

पर्यावरण के अनुसार कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिये भुंगरू के डिजाइन को आमतौर पर बदलना पड़ता है। अबतक नईरीता 12 विभिन्न पर्यावरण विशेषताओं के आधार पर 12 भुंगरू डिजाइनों को तैयार कर चुका है। इन डिजाइनों की वजह से यह रेगिस्तानी इलाकों में 311 मिलीमीटर बारिश और भारी ग्रेनाइट युक्त भूमि वाले क्षेत्रों में 1800 मिलीमीटर बारिश में भी काम करने में सक्षम है। अगर मापदंडों पर खरे उतरने वाली आवश्यक और पर्याप्त शर्तों का पालन नही ंहो रहा हो तो भुंगरू को स्थापित नहीं किया जा सकता।’’

एक सकारात्मक कदम यह रहा है कि अब सरकारी विभाग भी इस तकनीक को अपनाने लगे हैं। तृप्ति कहती हैं, ‘‘भुंगरू को भारतवर्ष के 12 राज्यों के नीति नियंताओं ने स्वीकार कर लिया है। कुछ केंद्रीय मंत्री और सांसद हमारे इस संदेश को संसद और नीति आयोग तक लेकर गये हैं जबकि दूसरी तरफ नीति निर्माताओं ने भुंगरू को सार्क और अफ्रीका में बढ़ावा देने में गहरी रुचि दिखाई है।’’

भुंगरू की पूरी प्रक्रिया स्थानीय कौशल को अपने साथ जोड़ने और सामग्री के चारों तरफ घूमती है। यह वास्तव में गांधीवादी सिद्धांतो पर आधारित है। लेकिन यही उनके पास मौजूद एकमात्र विकल्प है। यह तर्क आसानी से दिया जा सकता है कि बाहर से आयात करवाये हुए संसाधन स्थानीय संसाधनों के मुकाबले बेहतर साबित होते हैं लेकिन तृप्ति कहती हैं कि भारत में तकनीक बेहद महेंगी होने के चलते यह विकल्प परिहार्य नहीं है। भारत के किसान की सामाजिक और आर्थिक स्थिति एक यूरोपीय या अमरीकी देश के किसान से बिल्कुल भिन्न है। वे कहती हैं, ‘‘हमारे राष्ट्रपिता का मानना था कि केवल स्थानीय कौयाल और सामग्री ही ग्राम स्वराज की रीढ़ हो सकती है। संपूर्ण तकनीकी पहलुओं को उन लोगों द्वारा संचालित किसा जाना है जिन्हें इसके ओर-छोर के बारे में कुद भी पता नहीं है। इन छोटे ओर गरीब किसानों को न सिर्फ संचालन में बल्कि मामूली रखरखाव के कामों में भी आत्मनिर्भर बनाना होगा।’’

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तृप्ति का अनुमान है कि भारत को अभी भी भुंगरू को पूरी तरह से अपनाने में एक दशक से भी अधिक का समय लग सकता है। इस तकनीक के निर्माता बिप्लब ने मानवीय आधार पर इसका पेटेंट करवाने से इंकार कर दिया है। उन्हें भरोसा है कि अगर गुजरात के सभी लघुधारक स्थायी सिंचाई पद्धतियों का प्रयोग करना शुरू कर दें तो ‘‘वे राजय की अर्थव्यवस्था में 800 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान कर सकते हैं।’’ यहां यह भी कहना बेहद जरूरी है कि हालांकि भारत के किसान बहुत सी चुनौतियों का समाना करते हैं लेकिन पानी की कमी के लिये वे भी आंशिक रूप से जिम्मेदार हैं।

नईरीता के माध्यम से सहायता पाई हुई अधिकतर महिलाएं तृप्ति से एक ही बात दोहराते नहीं थकतीं और वह हैंः भुंगरू मारा माते लक्ष्मी छे, भुंगरू अमारा घर ने समृद्ध बनाया, सौथी बधारे महात्तया नू मुद्धो ए छे की भुंगय अपन ने इज्जत अपेला छे।’’ (भुंगरू मेरे लिये लक्ष्मी माता है, भुंगरू ने हमारी सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाया है, सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भुंगरू की वजह से हमें आत्मसम्मान और मान्यता मिली है)

तृप्ति कहती हैं, ‘‘अब आप भुंगरू के भविष्य को मुझसे बेहतर तरीके से परिभाषित कर सकते हैं।’’

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