#AcidAttack: कब लगेगी तेजाब की बिक्री पर पाबंदी, कब रुकेगा महिलाओं पर अत्याचार?

By जय प्रकाश जय
January 12, 2019, Updated on : Tue Sep 17 2019 14:02:05 GMT+0000
#AcidAttack: कब लगेगी तेजाब की बिक्री पर पाबंदी, कब रुकेगा महिलाओं पर अत्याचार?
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एसिड अटैक पीड़िताएं


"तेजाब के हमले में झुलसती पूरी दुनिया की आधी आबादी, तमाम लड़कियां और महिलाएं जान गंवा चुकीं, उनकी ज़िंदगियां बर्बाद हो चुकीं, तमाम औरतें बदतर हालात में जीवन यापन करने को विवश हैं लेकिन बाजार में तेजाब बेचने वाले और पशुता के आदी खरीदारों की आज भी कमी नहीं, उनके लिए कोई नियम-कानून जरूरी नहीं।"


जब दुनियाभर में महिलाओं पर तेजाब से हमले हो रहे हों तो किस-किस का नाम लें, भारत की प्रज्ञा, लक्ष्मी, इंदरजीत कौर, बांग्लादेश की फरीदा, पाकिस्तान की नुसरत....ऐसे दुनिया के हजार नाम, हजार दुख। ऋषभ देव शर्मा के शब्दों में बेकसूर 'न' कहने की ऐसी अंतहीन सज़ाएं। 'उन्होंने जोरों से घोषणा की- अब से तुम आजाद हो, अपनी मर्ज़ी की मालिक यानी उसने सोचा, अब मैं अब अपने सारे निर्णय ख़ुद लूंगी, इन देवताओं का बोझ कंधों पर न ढोना पड़ेगा। मैंने खुले आसमान में उड़ान भरी ही थी कि फ़रिश्ते आ गए। बोले-हमारे साथ चलो। हम तुम्हें अमृत के पंख देंगे। मैंने इनकार कर दिया। मेरा अकेले उड़ने का मन था। फ़रिश्ते आग-बबूला हो गए। उनके अमृतवर्षी पंख ज्वालामुखी बन गए। गंधक और तेजाब की बारिश में मैं झुलस गई। सर्प-विष की पहली ही फुहार ने मेरी दृष्टि छीन ली और मेरी त्वचा को वेधकर तेजाब की जलन एक एक धमनी में समाती चली गई। मैं तड़प रही हूँ। फ़रिश्ते जश्न मना रहे हैं - जीत का जश्न। जब जब वे मुझसे हारे हैं, उन्होंने यही तो किया है। जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी, जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा, तब तब या तो मुझे आग के दरिया में कूदना पड़ा या उन्होंने अपने अग्निदंश से मुझे जीवित लाश बना दिया। जब जब मैंने अपनी राह ख़ुद चुनी। 


'जब जब मैंने उन्हें 'ना' कहा - तब तब या तो मुझे धरती में समाना पडा या महाभारत रचाना पड़ा। मैंने कितने रावणों के नाभिकुंड सोखे कितने दुर्योधनों के रक्त से केश सींचे, कितनी बार मैं महिषमर्दिनी से लेकर दस्युसुंदरी तक बनी कितनी बार...कितनी बार... पर उनका तेजाब आज भी अक्षय है, घृणा का कोश लिए फिरते हैं वे अपने प्राणों में; और जब भी मेरे होठों से निकलती है एक 'ना' तो वे सारी नफ़रत सारा तेजाब उलट देते हैं मेरे मुँह पर। मैं अब नरक में हूँ अन्धकार और यातना के नरक में। अब मुझे नींद नहीं आती आते हैं जागती आँखों डरावने सपने। नहीं, उड़ान के सपने नहीं, आग के सपने, तेजाब के सपने, साँपों के सपने, यातनागृहों के सपने, वैतरणी के सपने। यमदूतो! मुझे नरक में तो जीने दो।'


इस तेजाब की बारिश में झुलसती पूरी दुनिया की आधी आबादी। आज इस एसिड अटैक की वजह से बहुत सारी लड़कियों और महिलाओं की जान जानें चुकी हैं, ज़िंदगी बर्बाद हो चुकी है, बहुत सारी लड़कियां और महिलाएं बदतर हालात में जीवन यापन करने को विवश हैं। एसिड अटैक पर न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार को अब ऐसे कुछ सख्त क़ानून बनाने चाहिए जो इस देश के साथ साथ दुनिया के लिए एक ट्रेंड सेटर साबित हो साथ ही ऐसा कोई कानूनी प्रावधान भी होना चाहिए जिसमें एसिड हमलों की शिकार महिला को सभी तरह की सुरक्षा और सुविधाएं सुनिश्चित हो जाएं जैसे कि पीड़िता को मुफ्त इलाज के साथ साथ सरकारी नौकरी और सामजिक सुरक्षा के लिए 'एसिड अटैक विक्टिम डेवलपमेंट फंड' या फिर 'एसिड अटैक विक्टिम डेवलपमेंट सोसाइटी' आदि संस्थाओं का गठन भी होना चाहिए ताकि एसिड अटैक की पीड़ित को कहीं से कुछ तो राहत मिल सके। सवाल उठता है, ऐसा संभव कहां हो पा रहा है? 


केवल दूर दराज के इलाकों की ही बात नहीं है, देश की राजधानी दिल्ली में भी बिना नियम कानून के एसिड बिक रहा है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी एसिड हमले हो रहे हैं। इससे साफ है कि नियमों को लागू कराने का तंत्र हमारे देश में कितना सक्षम है। पुलिस पहले से ही अपनी जिम्मेदारियां निभाने में नाकाम साबित हो चुकी है। हमारे देश में पितृ प्रधान समाज इस अपराध की जड़ में है। हम महिलाओं के साथ किस तरह बर्ताव करें, इसमें बहुत सी समस्याएं हैं। जो, लोगों की संवेदनाएं जगा सकते हैं, इस अपराध और इससे होने वाली तकलीफ को लेकर उदासीन हैं। गौरतलब है कि तेजाब की बारिश औरत की पूरी जिंदगी तबाह कर देती है। वह महीनों, बरसों घर से बाहर नहीं जा पाती क्योंकि उसे लगातार महंगे इलाज की जरूरत होती है। बहुत सी ऐसी भी महिलाएं हैं, जिन्होंने अपनी आंखें खो दीं, किसी के कान गल गए तो किसी की नाक मिट गई, किसी के चेहरे का ढांचा ही बिगड़ गया। पीड़ित औरतें यह अपना दुखड़ा किस-किस को सुनाएं। 


अब वक्त के साथ आधी आबादी के तेवर तन रहे हैं। ऐसी घटनाओं के खिलाफ वे उठ खड़ी हुई हैं। संगठित होकर अभियान चला रही हैं। महिलाओं पर एसिड हमलों के मामले में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे देश खासे बदनाम हैं। हमारे देश में एसिड हमले की शिकार महिलाओं में जीवन का जज्बा जगाने की कोशिश की जा रही है। उनके पुनर्वसन की भी कोशिश हो रही है। एसिड अटैक से पीड़ित लक्ष्मी चाहती हैं कि इस तरह के अपराधों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हों। महिलाओं पर होने वाले एसिड हमलों के खिलाफ अभियान छेड़ने वाली लक्ष्मी को अमेरिका में उनके काम के लिए सम्मानित किया जा चुका है। तत्कालीन प्रथम अमेरिकी महिला मिशेल ओबामा ने उन्हें 'इंटरनेशनल विमेन ऑफ करेज' अवॉर्ड दिया। अवॉर्ड समारोह में लक्ष्मी ने अपनी भावनाएं कविता के जरिए उकेरते हुए कहा था कि ये सम्मान मिलने के बाद उन्हें भारत में बदलाव की उम्मीद है।


लक्ष्मी मानती हैं कि शायद दूसरी लड़कियां सोचें कि वे भी लड़ाई में शामिल हो सकती हैं। लक्ष्मी की अपील के बाद भारत की सर्वोच्च अदालत ने सरकार को हुक्म दिया था कि वह एसिड के कारोबार को नियमों में बांधें। महिलाओं पर हमले के लिए एसिड का दुरुपयोग किया जाता है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश में अकसर महिला से बदला लेने के लिए पुरुष ये हमले करते हैं। पाकिस्तान की शरमीन ओबैद चिनॉय की एसिड हमलों के पीड़ितों पर बनाई फिल्म को 2012 में ऑस्कर दिया गया लेकिन इसके बाद ये पीड़ित और घबरा गईं कि अब उनसे बदला लिया जा सकता है. पाकिस्तान में हर साल हजारों लोग तेजाब हमलों का शिकार बनते हैं. इनमें 60 फीसदी महिलाएं हैं। पाकिस्तान में एसिड सर्वाइवर्स फाउंडेशन के मुताबिक मात्र एक ही साल में वर्ष 2012 में लगभग साढ़े सात हजार महिलाएं एसिड अटैक की शिकार हुईं।


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