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मिलिए भारत में समलैंगिकता पर कानून बदलने के लिए काम कर रहे वकीलों से

21st Jul 2018
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भारत उन राष्ट्रों में से एक है जो अभी भी समलैंगिकता को अपराध मानता है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने समान-सेक्स संबंधों अर्थात समलैंगिकता को गैर आपराधिक मानने का फैसला किया, तो ये भारत में यौन अल्पसंख्यकों के लिए सबसे बड़ी जीत होगी।

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आईपीसी की धारा 377 के तहत 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से अननैचुरल संबंध बनाते हैं और दोषी करार दिए जाते हैं तो उनको 10 साल की सजा से लेकर उम्रकैद की सजा हो सकती है। यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और गैरजमानती है।

भारत समलैंगिक अधिकारों को लेकर ऐतिहासिक निर्णय लेने की कगार पर है। वर्तमान में, भारत उन राष्ट्रों में से एक है जो अभी भी समलैंगिकता को अपराध मानता है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने समान-सेक्स संबंधों अर्थात समलैंगिकता को गैर आपराधिक मानने का फैसला किया, तो ये भारत में यौन अल्पसंख्यकों के लिए सबसे बड़ी जीत होगी। आईपीसी की धारा 377 के तहत 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से अननैचुरल संबंध बनाते हैं और दोषी करार दिए जाते हैं तो उनको 10 साल की सजा से लेकर उम्रकैद की सजा हो सकती है। यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और गैरजमानती है।

धारा 377 कहती है - "किसी भी व्यक्ति , महिला या जानवर के साथ स्वैच्छिक रूप से संभोग करने वाले व्यक्ति को अपराधी माना जाएगा और उसे आजीवन कारावास की सजा या दस साल तक के कारावास की सजा हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।" भारतीय दंड संहिता की धारा 377 जिसे हम इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 377 के नाम से भी जानते है एक विवादित धारा है।

ये धारा ब्रिटिश काल में बनी थी जिसके अंतर्गत समान लिंग के कोई भी दो व्यक्ति अगर आपस में सम्बन्ध बनाते है तो उसे अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि साल 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने 'नाज फाउंडेशन' के केस में एक एतिहासिक फैसला देते हुए इसे गलत करार दिया था। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बदलते हुए 2013 में यह कहते हुए रद्द कर दिया कि LGBT ग्रुप के अधिकारों से जुड़े इस मुद्दे को संसद के द्वारा निपटना चाहिए। तब शीर्ष अदालत ने अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिये दायर याचिकायें भी खारिज कर दी थीं।

हालांकि अब फिर से एक बार ये गंभीर मुद्दा बड़े स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वर्तमान में, वकीलों और कार्यकर्ताओं के समूह द्वारा नौ न्यायाधीशीय खंडपीठ की मांग की जा रही है। हालांकि हम आपको उन चार वकीलों के बारे में बता रहे हैं जो इस मुद्दे के लिए काम कर रहे हैं।

1. आनंद ग्रोवर

आनंद ग्रोवर वरिष्ठ वकील और कार्यकर्ता हैं, जो समलैंगिकता और मानवाधिकारों के लिए काम कर रहे हैं। 2009 में, जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता और एचआईवी को गैर आपराधिक करार दिया था तब, आनंद ग्रोवर ने ही भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को रद्द करने के लिए नाज फाउंडेशन के कानूनी मामले का नेतृत्व किया था। हालांकि 2013 में, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पारित फैसले को रोक दिया और समलैंगिकता को फिर से अपराध की श्रेणी में डाल दिया। दोनों बार, आनंद ने समलैंगिकता को गैर आपराधिक करने में सक्रिय भूमिका निभाई। atimes के मुताबिक भारतीय कानून का प्रतिष्ठित चेहरा इंदिरा जयसिंग के पति आनंद ग्रोवर वर्तमान में ड्रग पॉलिसी पर वैश्विक आयोग के कार्यकारी सदस्य हैं। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ 'वकील सामूहिक' भी शुरू किया है।

2. श्याम दीवान

आधार प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन के खिलाफ लड़ने वालों में सबसे आगे रहे वरिष्ठ वकील श्याम दीवान 'गोपनीयता के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा' दिलाने की मांग कर रहे याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। चर्चित वकील अनिल दीवान के बेटे श्याम ने नाज फाउंडेशन का भी प्रतिनिधित्व किया, जिसने दिल्ली उच्च न्यायालय में सबसे पहले समलैंगिकता को गैर अपराधिक कराने के लिए याचिका दायर की थी। प्राइवेसी पर एक ट्वीट के जरिए प्रतिक्रिया देते हुए दीवान कहते हैं, "गोपनीयता (प्राइवेसी) के तहत अकेले रहने का अधिकार, विचारों की स्वतंत्रता, असंतोष की स्वतंत्रता, शारीरिक अखंडता, सूचनात्मक आत्मनिर्भरता शामिल है।"

3. मेनका गुरुस्वामी

रोड्स स्कोलर, मेनका गुरुस्वामी पेशे से एक वकील हैं। मेनका उन छात्रों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जो भारत भर के 350 सदस्यीय लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) संगठन का हिस्सा हैं। उन्होंने इससे पहले पहले न्यूयॉर्क में एक लॉ फर्म और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार सलाहकार के रूप में काम किया है। उन्होंने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ और येल विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी है। इसके अलावा उन्होंने भारत के अटॉर्नी जनरल के ऑफिस में लॉ पर काम किया है। किसी एक सुनवाई के दौरान, उन्होंने कहा था, "यह प्यार है जिसे संवैधानिक रूप से पहचाना जाना चाहिए, न केवल यौन कृत्यों के रूप में।"

4. मुकुल रोहतगी

इस नाम से भारत के ज्यादातर लोग परिचित हैं। भारतीय सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी नवतेज सिंह जौहर के मामले में मुख्य याचिकाकर्ता थे, जो आईपीसी की धारा 377 की वैधता को चुनौती देने वाली छह याचिकाओं में से एक थी। काफी सम्मानित और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी भारत के 14वें अटॉर्नी जनरल भी रहे हैं। फर्स्टपोस्ट के मुताबिक हाल ही में एक सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अवध बिहारी रोहतगी के बेटे मुकुल रोहतगी को यह कहते हुए सुना गया था, "इस मामले की जटिलता सिर्फ कामुकता ही नहीं है, इसका असर होगा कि समाज इन लोगों को कैसे देखता है, उनके बारे में क्या धारणा है, आजीविका और नौकरियों को लेकर समाज उन्हें कैसे देखता है।"

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