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खुद ड्राइविंग कर सड़क मार्ग से दिल्ली से लंदन पहुंचीं ‘वुमेन बियाँड बाउँड्रीज़’, फहराया नारी शक्ति का परचम

Pooja Goel
3rd Dec 2015
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23 जुलाई को दिल्ली के इंडिया गेट से प्रारंभ हुआ सफर 27 अक्टूबर को लंदन पहुंचकर हुआ समाप्त....

निधि तिवारी, रश्मि कोप्पर और डाॅ. सौम्या गोयल नामक तीन महिलाओं ने कर दिखाया यह कारनामा....

अकेले निधि ने 97 दिनों के सफर में 17 देशों से गुजरते हुए 23800 किलोमीटर की दूरी तक की ड्राइविंग...


तीन महिलाएं, 23,800 किलोमीटर, 17 देश, 97 दिन और सड़क के रास्ते किया जाने वाला अनोखा सफर। मूलतः बैंगलोर की रहने वाली तीन महिलाओं, निधि तिवारी, रश्मि कोप्पर और डाॅ. सौम्या गोयल ने भारत की राजधानी दिल्ली से लंदन के बीच का यह चुनौतीपूर्ण सफर सड़कमार्ग से सिर्फ एक स्काॅर्पियो गाड़ी से पूरा करके यह अनोखा कारनामा करने में सफलता पाई है। 23 जुलाई को इंडिया गेट स्थित मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम से प्रारंभ हुआ यह सफर 95 दिन बाद 27 अक्टूबर को लंदन जाकर समाप्त हुआ और आज की इन महिलाओं ने दुनिया को दिखा दिया कि शादीशुदा और बाल-बच्चेदार होने के बावजूद वे किसी से भी किसी भी प्रकार से पीछे नहीं हैं।

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इस अभियान की सबसे रोचक बात यह रही कि इस सफर पर निकली महिलाओं की इस टोली के पास पूरे सफर के लिये सिर्फ एक ही वाहन था और सिर्फ एक ही महिला चालक, निधि तिवारी ने करीब 24 हजार किलोमीटर की इस यात्रा के दौरान वाहन की कमान अपने हाथ में रखी। वास्तव में यह पूरा अभियान और सफर निधि के ही दिमाग की उपज था और लंबी दूरी के सफर पर निकलना उनका पुराना शगल रहा है।

एक सैन्य अधिकारी की पत्नी और दो बच्चों की माँ निधि तिवारी एक जानीमानी और पेशेवर आउटडोर शिक्षक होने के अलावा आॅफ-रोड जीपर भी हैं जो जीप की सवारी करने के अलावा लंबी दूरी और अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ड्राइविंग करने में महारत रखती हैं। 

याॅरस्टोरी के साथ बातचीत में निधि कहती हैं, ‘‘इस सफर पर जाने से पहले मैं पश्चिमी घाटों के अलावा भारत के हिमालयी राज्यों उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और नेपाल, भूटान, अमरीका, दक्षिण कोरया और कीनिया में ड्राइविंग कर चुकी थी। मैं शादी से पहले से ही बैंगलोर में जीपिंग करती आई थी और उस दौरान मुझे बैंगलोर की पहली महिला जीपर भी कहा जाता था।’’
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शादी के बाद निधि दिल्ली आ गईं लेकिन यात्रा और ड्राइविंग के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ और एक सैन्य अधिकारी पति ने उननी उम्मीदों को पंख ही लगाने में मदद की। निधि बताती हैं कि शादी के बाद उन्होंने अपने पति के साथ खुद ही ड्राइव करके करीब-करीब पूरे देश की यात्रा की। इसके बाद वर्ष 2007 में वे पहली बार कार को ड्राइव करके लद्दाख लेकर गईं और उसके बाद से उन्हें ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ड्राइविंग करने में मजा आने लगा। 

वे आगे कहती हैं, ‘‘बीते वर्ष मैं अपनी जीप से लद्दाख की यात्रा पर गई थी और उस दौरान मैंने विषम परिस्थितियों का सामना किया और अन्य साथियों के पीछे हटने के बाद मैं सकुशल अकेले ही जीप से वापस आने में सफल रही। इसके बाद मैंने फैसला कि अब जब मैं लगभग पूरे देश ड्राइविंग कर ही चुकी हूं तो मुझे अपना दायरा आगे बढ़ाना चाहिये और अब अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर ड्राइविंग करनी चाहिये।’’
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लद्दाख से वापस आने के बाद उन्होंने अपनी पुरानी मित्र स्मिता राजाराम से इस बारे में वार्ता की और इन लोगों ने काफी विचार-विमर्श के बाद महिलाओं के बीच ड्राइविंग को लेकर जागरुकता जगाने के लक्ष्य के साथ वोमेन बियाँड बाउँड्रीज़ (Women Beyond Boundaries) का गठन किया। निधि कहती हैं कि भारत में लोगों के मस्तिष्क में महिलाओं के वाहन चलाने को लेकर कई तरह के शक घर किये हुए हैं और अधिकांश महीलाएं भी खुद की ड्राइविंग को लेकर सशंकित हैं। 

भारतीय महिलाओं के गाडि़यों के स्टियरिंग से दूर रहने के कारणों के बारे में बात करते हुए वे कहती हैं, ‘‘सबसे पहले तो भारतीय महिलाओं के बीच ड्राइविंग के कौशल की काफी कमी है। इसके अलावा यहां पर महिलाओं को वाहन अपने हाथ में लेने के मौके ही काफी कम मिलते हैं जिसके चलते उनके बीच ड्राइविंग को लेकर आत्मविश्वास की काफी कमी रहती है। हमारा इरादा अपने इस संगठन के माध्यम से महिलाओं के बीच ड्राइविंग के प्रति दिलचस्पी का विकास करने के अलावा उन्हें आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करना भी है ताकि वे पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर दुनिया के किसी भी हिस्से में गाड़ी चलाने में सक्षम बनें।’’

एक बार वोमेन बियाँड बाउँड्रीज़ का गठन करने के बाद अब इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी इस भारी-भरकम खर्च वाले ड्राइविंग अभियान के लिये एक प्रायोजक तलाशना। निधि बताती हैं कि उनके लिये यह काम सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण रहा और एक प्रायोजक तलाशने में उन्हें नाकों चने चबाने वाली कहावत की वास्तविकता समझ में आ गई। निधि आगे बताती हैं, ‘‘कई देश, कई दिन का सफर, दुर्गम रास्ते और एक अकेली महिला। अधिकतर प्रायोजकों के मन में यह सबसे बड़ी शंका थी। कुछ ने तो मुझे यहां तक कहा कि ‘क्या आप जानती हैं आप क्या करने की सोच रही हैं।’ इसके अलावा अधिकतर लोगों ने मुझे यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि मैं जो करने की सोच रही हूं उसे करना संभव ही नहीं है। लेकिन ऐसे लोग मुझे और प्रेरित ही कर रहे थे।’’

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इसी दौरान एक दिन उनकी वार्ता पुरानी गाडि़यों की खरीद-फरोख्त के काम मेें सक्रिय महिंद्रा फस्र्ट चाॅइस व्हील्स के संचालकों के साथ हुई जिन्होंने उनके इस अभियान में रुचि दिखाई लेकिन वे भी उनके अकेले इसे करने को लेकर सशंकित थे। निधि आगे बताती हैं, ‘‘महिंद्रा वालों के साथ मेरी काफी सकारात्मक बातचीत हुई लेकिन उन्होंने मुझसे साफ बता दिया कि सफर लंबा और जोखिम भरा है और अगर आप इस सफर के लिये अपने साथ कुछ अन्य साथियों को भी शामिल कर लें तो हम इस यात्रा को प्रायोजित कर देंगे।’’ इसके अलावा लेनोवो ने भी हमें सफर प्रारंभ होने पर टीमफोन, थिंकपैड और अन्य नैविगेशन उपकरण देने का वायदा किया जिनकी मदद से हमारा सफर बुत आसान बन गया।

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इसके बाद निधि ने स्कूल के पुराने दिनों की अपनी दो मित्रों रश्मि कोप्पर और डाॅ. सौम्या गोयल से संपर्क किया जो इस सफर में मेरी साथी बनने के लिये तुरंत ही राजी हो गईं। एक बेटी की माँ रश्मि कोप्पर बैंगलोर की एमएस रामैया यूनिवर्सिटी में होटल मैनेजमेंट की प्रोफेसर होने के अलावा साहसिक खेलों की शौकीन हैं और लंबी दूरी की एक शौकिया ड्राइवर हैं। इनके अलावा इस समूह की तीसरी साथी दो बच्चों की माँ डाॅ. सौम्या गोयल एक फिजिकल थिरेपिस्ट हैं जो यात्राओं की दीवानी हैं।

महिलाओं के इस समूह ने खुद को सफर के लिये मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करने के बाद एक बार दोबारा प्रायोजकों से संपर्क किया। निधि आगे बताती हैं, ‘‘हमारे तैयार होते ही महिंद्र ने हमें अपनी एक पुरानी स्काॅर्पियो गाड़ी मुहैया करवा दी जो करीब 68500 किलोमीटर चली हुई थी। चूंकि मैं पिछले काफी समय से ड्राइविंग करती आ रही हूं इसलिये मुझे यह बात भली-भांति मालूम है कि इस प्रकार के सफर के लिये यह एक बहुत ही बेहतरीन गाड़ी है और 2 लाख किलोमीटर तक चली हुई गाड़ी भी हमारी इस यात्रा के लिये कारगर होगी। इसके अलावा चूंकि हमें कई देशों से होकर गुजरना था और ऐसे में हमें केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और कार्यालयो से पूरा सहयोग और सकारात्मक माहौल मिला।’’

आखिरकार 24 जुलाई की सुबह को केंद्र सरकार के दो मंत्रियों, अनंत कुमार और सर्वानंद सोनेवाल ने महिलाओं की इस तिकड़ी को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया और इन्होंने पहले सप्ताह में म्यांमार तक कि करीब 2500 किलोमीटर की यात्रा पूरी की। इसके बाद ये महिलाएं चीन, किर्गिस्तान, कज़ाकिस्तान, उज़बेकिस्तान, रूस, युक्रेन, पोलेंड, चेक गणराज्य, जर्मनी और बेल्जियम इत्यादि देशों से होते हुए आखिरकार 27 अक्टूबर को 23800 किलोमीटर का सड़क के रास्ते का सफर पूरा करके लंदन पहुंचीं।

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निधि बताती हैं कि प्रारंभ में इनका इरादा नेपाल होते हुए आगे जाने का था लेकिन वहां पर हाल ही में आए भूकंप के चलते उन्हें म्यांमार होकर जाना पड़ा। हालांकि म्यांमार का उनका रास्ता भी इतना आसान नहीं रहा और वहां पर आई भयंकर बाढ़ के चलते उन्हें करीब एक महीने तक वहीं पर आगे जाने के लिये इंतजार करना पड़ा। निधि बताती हैं, ‘‘कई लोगों ने हमें राय दी कि हमें वापस लौट जाना चाहिये और अगले वर्ष दोबारा प्रयास करना चाहिये। मेरी दोनों साथी कुछ दिनों के लिये वापस लौट आईं लेकिन मैं इस सफर को करने के अपने निर्णय पर अडिग थ और वहीं रुकी रही। आखिरकार कुछ दिनों बाद रास्ता खुलने पर मैं अकेली ही आगे बढ़ी और मेंडलिन पहुंचने पर रश्मि और सौम्या दोबारा मेरे साथ जुड़ीं।’’

म्यांमार में करीब 4 हफ्तों तक रुकने के चलते इनके सामने वीसा से जुड़े मुद्दे आए और कुछ देशों में इस देरी के चलते इनके वीसा की अवधि समाप्त तक हो गई। निधि बताती हैं कि ऐसे में विभिन्न देशों में मौजूद दूतावासों और वहां के अधिकारियों और कर्मचारियों की भरपूर मदद के चलते वे सामने आई ऐसी चुनौतियों को पार पाते हुए अपने इस सफर को पूरा करने में कामयाब रहीं।

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निधि कहती हैं, ‘‘इस प्रकार से सफर का सीधा सा मतलब अधिकतर निर्जन क्षेत्रों से गुजरने के अलावा टूटी-फूटी सड़कों, चट्टानी क्षेत्रों, जंगलों, नदियों और नालों के अलावा बिल्कुल ही असामान्य क्षेत्रों के बीच सफर करने का है जो काफी रोचक होने के साथ-साथ कई मौकों पर बेहद खतरनाक भी साबित हो सकता है। लेकिन मैं बचपन से ही ऐसा करने वाली जिद्दी और निडर रही हूं और मेरे माता-पिता ने हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिये प्रेरित किया है। इसके अलावा एक फौजी पति के चलते मुझे ऐसे काम करने की और भी अधिक प्रेरणा मिली।’’
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निधि बताती हैं कि इस पूरी यात्रा के दौरान इन लोगों का 8 लाख रुपये प्रति व्यक्ति का खर्च आया है जो प्रायोजकों द्वारा खर्च की गई राशि से बिल्कुल अलग है। भविष्य की योजनाओं के बारे में बात करते हुए निधि कहती हैं, ‘‘हमारा इरादा आने वाले दिनों में वोमेन बियाँड बाउँड्रीज़ का विस्तार करते हुए और अधिक महिलाओं को अपने साथ जोड़ना और उन्हें ड्राइविंग के लिये प्रेरित करना है। इसके अलावा दिल्ली से लंदन तक का सफर सफलतापूर्वक करने के बाद हम ऐसे ही कुछ और अभियानों की योजना के बारे में भी विचार कर रहे हैं।’’

अंत में निधि कहती हैं, ‘‘यात्राओं का वास्ता शायद ही कभी उनके दौरान तय की जाने वाली दूरी से रहता हो। वे तो सिर्फ अनुभवों, दृश्यों, मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के बारे में है। यात्राओं का मतलब अपनी क्षमताओं को पहचानते हुए अपने लिये नित नए लक्ष्यों को निर्धारित करने और फिर उन्हें पाने के लिये खुद को प्रेरित करना है फिर चाहे वे नए फलक हों, नए लोग और यहां तक कि अपने भीतर बदलते रहने वाले नए व्यक्तित्व।’’


वेबसाइट / फेसबुक


विशेषः सभी तस्वीरें ‘वोमेन बियाँड बाउँड्रीज़’ के सौजन्य से

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