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अब तो कविता के नाम पर निठल्लों की तुकबंदियां

साहित्य की दुनिया से...

जय प्रकाश जय
7th May 2018
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कविता आम लोगों से निकलकर सभागारों तक सिमट गयी है। एक मजाक बन गयी है। जरूरत है इसे संवारने की,जो अब बहुत ही मुश्किल लगता है। चाहे जिस गांव, शहर में जाइए, ढेरो ऐसे मन मूढ़ मुंडी हिलाते मिल जाएंगे- वाह-वाह, क्या कहने, क्या खूब लिखा आपने, गजब कर दिया, ऐसा तो ग़ालिब-मीर, रसखान भी कहां लिख पाते। तुलसी दास और कालिदास तो बस ऐसे ही। इसलिए छुटभैयों का मन मधुमास हुआ जा रहा है, जले-कटे पर नमक की तरह।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


कवि शैलेंद्र शांत कहते हैं कि कविता के स्तर में गिरावट की शिकायत पुरानी है। गढ़े गए नए-पुराने प्रतिमानों के बावजूद। यह अपनी जगह ठीक भी है। छंदों से मुक्ति को भी कुछ लोग संकट की वजह मानते रहे हैं। हालांकि निराला से लेकर मुक्तिबोध की कविताएं इसे गलत करार देती हैं।

एक मित्र-कवि हैं। नाम नहीं बताऊंगा। उनका कविता संग्रह आया है - 'मन हुआ मधुमास'। पढ़ते हुए सोचने लगा कि ऐसे वक्त में किसी का मन वासंती कैसे हो सकता है, जबकि देश के लाखो युवा रोजगार के लिए मारे-मारे फिर रहे हों, कर्ज की मार से दोहरे हो रहे अन्नदाता आत्महत्याएं कर रहे हों, भिखारियों से हर शहर के चौराहे यतीमी की चादर तान लिए हों, लाखों की संख्या में लोग अपनी जमीनों, जड़ों से पलायन कर महानगरों के किनारे-किनारे झुग्गी-झुपड़ियों के तनोवा तानते जा रहे हों, रिक्शों पर सोकर दिन काट ले रहे हों। फूल खिलना किसे अच्छा नहीं लगता है लेकिन जब पेट में दाना पड़े तब तो। पेट में नहीं गुद्दी तो नाचे फरगुद्दी। भूखे पेट भजन करने वाले कितने! भरे पेट की कविता, लगता है अपने वक्त के साथ छल है। बहाना है स्वांतः सुखाय। पेट में पड़ा चारा तो नाचे बेचारा। और हां, अहो रूपम, अहो ध्वनिः भी कुछ कम नहीं। चाहे जिस गांव, शहर में जाइए, ढेरो ऐसे मन मूढ़ मुंडी हिलाते मिल जाएंगे- वाह-वाह, क्या कहने, क्या खूब लिखा आप ने, गजब कर दिया, ऐसा तो ग़ालिब-मीर, रसखान भी कहां लिख पाते। तुलसी दास और कालिदास तो बस ऐसे ही।

इसलिए छुटभैयों का मन मधुमास हुआ जा रहा है, जले-कटे पर नमक की तरह। इसी किस्म की निठल्लेगीरी पर कभी ख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा था - 'निठल्ले की डायरी'। कुल 25 व्यंग्यों के इस संकलन में एक व्यंग्य है- 'युग की पीड़ा का सामना'। ये व्यंग उन साहित्यकारों पर है, जो अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं हैं। ''हमारा निठल्ला एक कॉफ़ी हाउस में एक कवि से मिलता है जो युग की पीड़ा से ग्रस्त हैं। वो अकेले हैं और अकेले क्यूँ हैं ये उन्ही कि ज़बान से सुनिए- वह उन्हें देखता रहा। बड़े दर्द से बोला - मैं निपट अकेला हूँ। मैंने पूछा - अकेले क्यों हो? उसने कहा - क्योंकि मैं किसी से मिलता जुलता नहीं हूँ। सबको मेरे पास आना चाहिए। वे नहीं आते हैं, तो अकेला हूँ। क्या निठल्ला इनको इनकी पीड़ा से निजात दिला पायेगा?....साहित्यकारों में भी पीढ़ियों की सोच में मतभेद रहता है। वो एक ताकतवर ओहदा अपने पास रखते हैं। इस ओहदे की ही तो लड़ाई है।'' तो आंधी-तूफान के वक्त में किसी कवि का मन मधुमास हुआ जा रहा है तो क्या करें लोग, और क्या करे सरकार।

कवि शैलेंद्र शांत कहते हैं कि कविता के स्तर में गिरावट की शिकायत पुरानी है। गढ़े गए नए-पुराने प्रतिमानों के बावजूद। यह अपनी जगह ठीक भी है। छंदों से मुक्ति को भी कुछ लोग संकट की वजह मानते रहे हैं। हालांकि निराला से लेकर मुक्तिबोध की कविताएं इसे गलत करार देती हैं। कविता आंदोलनों ने भी एक-दूसरे को दाखिल-खारिज कर कविता को संकट से निकालने की दावा करती रही हैं। इधर, हाल में नब्बे के दशक की कविता ने भी यह काम किया। कुछ कवि तो इन आंदोलनों से नामी-गिरामी-इनामी तो हो जाते रहे हैं, इतिहास या पाठ्यक्रमों में जगह बनाने की जंग में भी कुछ कामयाब हो जाते रहे हैं पर समाज में वह स्वीकृति नहीं मिल पा रही है, जिसकी अपेक्षा हो।

फेसबुक, ब्लॉग आदि ने कविता के उत्पादन को बढ़ाने में मददगार की भूमिका अदा की है। युवा लेखन के आयोजनों से भी बहुत सारे कवि सामने आए हैं। यह कविता के लिए अच्छा संकेत है कि बुरा, इस पर एकमत की कोई संभावना नहीं। इसको लेकर गैर कवियों को ही नहीं सुकवियों को भी चिंता है। अच्छी कविताएं लिखने का दावा करने वालों की चिंता है कि बुरी कविता ने उनकी अच्छी कविताओं के सामने संकट पैदा कर दिया है। रचना जगत की इसी तरह निठल्लागीरी पर कभी काशी-चिंतकों ने गजब का प्रयोग किया। ठलुआ क्लब बना डाला। ठलुआ यानी निठल्लों का क्लब। ठलुआ क्लब, महामूर्ख सम्मेलन से लेकर उलूक महोत्सव जैसे न जाने कितने विलक्षण तरह के आयोजन करता रहता है। ठलुआ क्लब की शेरो-शायरी के भी क्या खूब मधुमासी अंदाज हैं -

अपने गमों को बस दिल में दबा लो

नया गोदरेज पाउडर हेयर डाई

बस काटो, घोलो और लगा लो।

नाच मेरी बुलबुल नाच, तुझे पैसा मिलेगा

हम सीआईडी से हैं,

कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा!

ब्लड डोनेट करने से पहले हमेशा उसका ग्रुप जांचना

बसंती इन कुत्तो के सामने कभी मत नाचना!

महंगाई के इस दौर में करना पड़ता है अपने खर्चे पर काबू

एक चुटकी सिन्दूर की कीमत तुमक्या जानो रमेश बाबू?

कविता के नाम पर इस तरह का छिछोरापन भी बहुतों को पसंद आता है। बल्कि जानिए कि इसका एक अच्छा-खासा बाजार खड़ा हो गया है भौंड़े हास्य-व्यंग्य के नाम पर। लोग दुखी हैं अपने वक्त से, करें क्या, इसी बहाने थोड़ा हंस-मुसकरा लेते हैं। इस गंभीरता में उतरने की उन्हें कोई जरूरत नहीं होती कि अच्छे सृजन का अभाव और अग्राह्यता देश-समाज के लिए कितनी अहितकर है, हमारे सांस्कृतिक पतन के लिए कितनी उत्तरदायी। कवि कपिल शर्मा या असरानी तो नहीं होता। उसके अपने कुछ दायित्व हैं। दरअसल, हमने अपने मनोरंजन को भी अपनी तात्कालिक सहूलियत के अनुरूप परिभाषित करना प्रारंभ कर दिया है।

फिल्म उद्योग में 'हास्य की हवा' समाज में सतहीपन की स्थापना का ही एक हिस्सा है। छोटे-मोटे जायकेदार जुमले गढ़ने को चतुर माना जाता है। क्या सचमुच हँसने से जीवन के तनाव में कमी आती है? मन में अवसाद की झील बन गई है और क्या चुटकुलों के कंकड़-पत्थर दिया गया है और साहित्य में फूहड़ हास्य की तथाकथित उसमें लहरें बनाते हैं? आज हम ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि व्यंग्य, फूहड़ व्यंग्य और फूहड़ हास्य अथवा कॉमेडी में क्या फर्क है। जो दिखता है, वो बिकता है और टीआरपी के चक्कर में फंसकर चैनलों ने भी फूहड़ मज़ाक को अपना लिया है, जबकि हमारा टीवी का इतिहास स्तरीय राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत हास्य वाले कार्यक्रमों से भरपूर रहा है। यदि गंभीर साहित्य नहीं, हास्य-व्यंग्य की ही बात करें तो एक वक्त में हमारे साहित्यिक पुरखे इसकी भी राह दिखा गए हैं, लेकिन कोई उधर नजर डालने की जहमत तो उठाए। हिंदी के जाने माने कवि गोपाल प्रसाद व्यास की एक कविता है 'भाभीजी नमस्ते', देखिए कि हर पंक्ति में कितना सघन हास्य है और हमारी सांस्कृतिक मर्यादा का भी कितनी सतर्कता से ध्यान रखा जाता है -

'भाभीजी, नमस्ते!'

'आओ लाला, बैठो !' बोलीं भाभी हंसते-हंसते।

'भाभी, भय्या कहां गए हैं?'

'टेढ़े-मेढ़े रस्ते !'

'तभी तुम्हारे मुरझाए हैं भाभीजी, गुलदस्ते !'

'अक्सर संध्या को पुरुषों के सिर पर सींग उकसते !'

'रस्सी तुड़ा भाग ही जाते, हारी कसते-कसते !'

'लेकिन सधे कबूतर भाभी, नहीं कहीं भी फंसते !

अपनी छतरी पर ही जमते, ज्यों अक्षर पर मस्ते !'

'भाभीजी, नमस्ते !'

चला सिलसिला रस का !

'बैठो, अभी बना लाती हूं लाला, शर्बत खस का।'

'भाभी, शर्बत नहीं चाहिए, है बातों का चसका।'

'लेकिन तुमसे मगज मारना देवर, किसके बस का ?'

भाभी का यह वाक्य हमारे दिल में सिल-सा कसका।

तभी लगाया भाभीजी ने हौले से यूं मसका-

'ओहो, शर्बत नहीं चलेगा ? वाह, तुम्हारा ठसका !'

'कलुआ रे, रसगुल्ले ले आ ! ये ले पत्ता दस का !'

चला सिलसिला रस का।

भाभी जी का लटका !

कलुआ लेकर नोट न जाने कौन गली में भटका?

बार-बार अब हम लेते थे दरवाजे पर खटका।

बतरस-लोभी चित्त हमारा, रसगुल्लों में अटका।

कुरता छू भाभी जी बोली, 'खूब सिलाया मटका।'

'लेकिन हम तो देख रहे हैं ब्लाउज नरगिस-कट का।'

आंखों-आंखों भाभीजी ने हमको हसंकर हटका।

'ये नरगिस का चक्कर लाला, होता है सकंट का।'

भाभी जी का लटका !

हास्यरस या तो विशेषत: परिहास की कोटि का होता है या उपहास की कोटि का। इन दोनों शब्दों को परंपरागत अर्थ में सीमाबद्ध नहीं किया गया है। जो संतुष्टि प्रधान काव्य है, उसे हम परिहास की कोटि का मानते हैं और जो संशुद्धि प्रधान है, उसे उपहास की कोटि का। अनेक रचनाओं में दोनों का मिश्रण भी हुआ करता है। परिहास और उपहास दोनों के लिए सामाजिक स्थितिोयं की सुरुचि का ध्यान रखना आवश्यक है। मांसल शृंगारपरक हास, आजकल के शिष्ट समाज के लिए रुचिकर नहीं हो सकता है। देवता विषयक व्यंग सहधर्मियों को ही हँसाने के लिए हुआ करता है। उपहास के लिए सुरुचि का ध्यान अत्यंत आवश्यक है।

मजा इसमें ही है कि हास्यपात्र (चाहे वह व्यक्ति हो या समाज) अपनी त्रुटियाँ समझ ले परंतु संकेत देनेवाले का अनुगृहीत भी हो जाए और उसे उपदेष्टा के रूप में न देखे। वर्तमान में हास्य की शैलियों का बहुत विस्तार हुआ है। पद्य के साथ ही गद्य की भी अनेक विधाओं का विकास हुआ है। संस्कृत, पालि, अपभ्रंश साहित्य में हास्य व्यंग्य के हजारों उदाहरण मिल सकते हैं। कहीं ये उक्तियाँ गहरे उतर कर चोट करती हैं, कहीं सिर्फ गुदगुदा कर हंसने पर मजबूर कर देती हैं। हास्य-व्यंग्य ही नहीं, पूरे काव्य परिदृश्य पर पद्मश्री गोपालदास नीरज कहते हैं - 'मंचीय कविता का स्तर बहुत नीचे गिर गया है। एक वक्त था, जब लाखों लोग कविता सुनने के लिए जुटते थे, लेकिन आज कहां इतने लोग आते हैं।

कविता आम लोगों से निकलकर सभागारों तक सिमट गयी है। एक मजाक बन गयी है। जरूरत है इसे संवारने की, जो अब बहुत ही मुश्किल लगता है। पहले हमारी लोकप्रियता इतनी थी कि हमारे गीत, कविताएं छपकर हाथोहाथ बिक जाया करते थे। एक कवि सम्मेलन में एक शर्त रखी गयी ‍कि जो किताब खरीदेगा, वही कवि सम्मेलन सुन सकेगा। उसमें मेरी किताब का संस्करण खत्म हो गया। वह कविता और कविसम्मेलन का जमाना था। आज पैसा दो, तब भी कविता सुनने लोग नहीं आते हैं।'

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