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मिलिए बेटे की याद में 100 से ज्यादा बेसहारा बुजुर्गों का पेट भरने वाले दंपति से

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3rd Nov 2017
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लोगों की जिंदगी में बहुत सी ऐसी घटनाएं घटती जो उनकी दुनिया ही बदल देती हैं। कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिनसे उबरना बहुत मुश्किल होता है। कुछ ऐसा ही हुआ था इस दंपति के साथ जिसने उन्हें लोगों के लिए प्रेरणा बनने पर मजबूर कर दिया। 

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मुंबई में रहने वाले एक मध्यम वर्गीय दंपति प्रदीप तन्ना और उनकी पत्नी दमयंती पिछले पांच सालों से मुफ्त भोजन की सेवा प्रदान कर रहे हैं। ये मुफ्त भोजन सभी के लिए नहीं बल्कि उन बेसहारा बुजुर्गों के लिए है जो सड़कों पर छोड़ दिए गए हैं। 

ये परिवार इन सीनीयर सिटीजन्स के लिए मुफ्त टिफिन सेवा चला रहा है और ये सब वे अपने बेटे की याद में कर रहे हैं जो 2011 में एक ट्रेन दुर्घटना में हमेशा के लिए उनको छोड़कर चला गया था।

लोगों की जिंदगी में बहुत सी ऐसी घटनाएं घटती जो उनकी दुनिया ही बदल देती हैं। कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिनसे उबरना बहुत मुश्किल होता है। कुछ ऐसा ही हुआ था इस दंपति के साथ जिसने उन्हें लोगों के लिए प्रेरणा बनने पर मजबूर कर दिया। मुंबई में रहने वाले एक मध्यम वर्गीय दंपति प्रदीप तन्ना और उनकी पत्नी दमयंती पिछले पांच सालों से मुफ्त भोजन की सेवा प्रदान कर रहे हैं। ये मुफ्त भोजन सभी के लिए नहीं बल्कि उन बेसहारा बुजुर्गों के लिए है जो सड़कों पर छोड़ दिए गए हैं। ये परिवार इन सीनीयर सिटीजन्स के लिए मुफ्त टिफिन सेवा चला रहा है और ये सब वे अपने बेटे की याद में कर रहे हैं जो 2011 में एक ट्रेन दुर्घटना में हमेशा के लिए उनको छोड़कर चला गया था।

दंपति के 23 वर्षीय बेटे निमेश की मौत चलती ट्रेन से गिरने हुई थी। बेटे की मौत से सदमें में आए मां-बाप ने जैसे-तैसे खुद को संभाला और कुछ करने की ठानी। उन्होंने अपने बेटे की याद में वो किया जो हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा बन सकता है जिसे जिंदगी में वाकई में कुछ करना है लेकिन लक्ष्य निर्धारित नहीं है। प्रदीप तन्ना ने अपने बेटे के नाम पर एक ट्रस्ट बनाया गया। आज ये ट्रस्ट उसकी याद में टिफिन सेवा के माध्यम से हर दिन 100 से ज्यादा वरिष्ठ नागरिकों को उनके इलाके में मुफ्त भोजन देता है।

2011 में निमेश तन्ना मुंबई में ही एक मीटिंग में हिस्सा लेने के लिए लोकल ट्रेन पर चढ़े। लेकिन वो कभी उस मीटिंग को अटेंड नहीं कर पाए जिसके लिए वे घर से निकले थे। निमेश का सिर बाहर निकला हुआ था। ट्रेन तेज रफ्तार से चल रही थी कि तभी अचानक निमेश का सिर एक पोल से जोर से टकराया और निमेश वहीं गर गया। उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। तन्ना परिवार को उनके इकलौते बच्चे की मौत ने झकझोर कर रख दिया था। लेकिन उन्होंने अपने बेटे की मौत को जाया नहीं जाने दिया और वो किया जिसकी लोग मिसाल देते हैं। परिवार ने बेहद असाधारण तरीके से अपने बेटे को श्रद्धांजलि अर्पित करने का फैसला किया।

साभार: फेसबुक

साभार: फेसबुक


उन्होंने जरूरतमंदों को मुफ्त भोजन प्रदान करने के लक्ष्य के साथ श्री निमेश तन्ना चैरिटेबल ट्रस्ट (एसएनटीसीटी) शुरू किया। इस ट्रस्ट को 26 जनवरी 2013 को पंजीकृत किया गया। एसएनटीसीटी ने स्वयं की रसोई से 30 लोगों के लिए मुफ्त भोजन प्रदान करके एक विनम्र शुरुआत की। मौजूदा समय में एसएनटीसीटी 100 से ज्यादा लोगों को मुफ्त भोजन प्रदान कर रहा है। खास बात ये है कि ये लोग पिछले दो सालों से बिना एक दिन मिस किए बेसहारा लोगों को भोजन दे रहे हैं। मुलुंड में उनके घर में एक नई रसोई है जहां सात कर्मचारी बेसहाराओं के लिए स्वस्थ भोजन तैयार करते हैं।

जरूरतमदों तक भोजन समय से पहुंचे इसके लिए उन्होंने मुंबई के विश्व-प्रसिद्ध डब्बावालों के साथ टाई-अप किया है। बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दमयंती तन्ना ने कहा, "हम हर महीने 110 नागरिकों को पका-पकाया भोजन प्रदान करते हैं और हम 100 लोगों को अनाज देते हैं ताकि वे खुद से स्वयं खाना बना सकें। हम आदिवासी क्षेत्रों में जरूरतमंद बच्चों को कपड़े, किताबें, स्टेशनरी आइटम भी देते करते हैं। हमने उन बुजुर्ग लोगों को निशुल्क डब्बा देने का फैसला किया है जिन्हें उनके बच्चों ने छोड़ दिया है या खुद उन्होंने अपने बच्चों और प्रियजनों को खो दिया है।"

दमयंती तन्ना आगे कहती हैं कि "हम सब ये अपने आप से करते हैं और थोड़ा बहुत हमारे दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलता है उससे करते हैं। हमारे ट्रस्ट में जात-पात, ऊंच-नीच और धर्म का कोई मोल नहीं है। प्रदीप तन्ना ने बताया कि "बेटे को खोने के बाद हम टूट गए थे और समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। उसके बाद तय किया कि हम न सिर्फ जिंदगी जिएंगे बल्कि अपने बेटे की यादों को भी जिंदा रखेंगे। करीब डेढ़ साल बाद मेरे पत्नी ने हमें ये करने का आइडिया दिया। हमने कभी भी जात-पात, ऊंच-नीच और धर्म में कोई भेदभाव नहीं किया। हम केवल उन लोगों के लिए खाना देते हैं जो 60 साल से ऊपर हैं और जिन्हें वाकई में खाने की जरूरत है।"

इस परिवार की हर कोई तारीफ कर रहा है। आज लगभग हर बड़े शहर की सड़कों पर आपको तमाम बेसहारा लोग हाथ में कटोरा लिए दिख जाएंगे। कुछ हालातों के मारे होते हैं कुछ मांसिक स्थिति खराब होने के कारण परिवार द्वारा घर से निकाल दिए गए होते हैं। लेकिन इंसानियत के नाते हर किसी का फर्ज बनता है कि वह इन बेसहारा लोगों को सम्मानपूर्वक जिंदगी बसर करने का मौका दें। ये परिवार वो सब कर रहा है जिसमें वे सक्षम हैं। इस परिवार ने इंसनियत की मिसाल पेश की है।  

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