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कानून में संशोधन: अब कुष्ठ रोग को आधार बनाकर नहीं ले पाएंगे तलाक

posted on 11th January 2019
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सांकेतिक तस्वीर


2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने कुष्ठ रोग से प्रभावित लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र और राज्यों सरकारों को कदम उठाने के लिए कहा था। इस दौरान केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि कुष्ठ रोग अब एक साध्य रोग है, इसलिए यह संशोधन करना आवश्यक है।


हमारे समाज में सदियों से कई तरह की कुप्रथाएं व्याप्त थीं, लेकिन समय के साथ-साथ इनको खत्म किया गया और इनसे लड़ने के लिए कानून भी बनाए गए। लेकिन अभी तक कई कानून ऐसे थे जो काफी पुराने हो चले थे और उनमें वक्त के साथ संशोधन करना परिहार्य हो गया था। भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत एक ऐसा ही कानून था जिससे स्त्रियों और पुरुष के बीच गैरबराबरी पैदा होती थी। ऐसा ही एक और प्रावधान था जिसमें कुष्ठ रोग को आधार बनाकर तलाक लिया जा सकता था, लेकिन अब इस प्रावधान को खत्म कर दिया गया है।


लोकसभा ने हाल ही में व्यक्तिगत कानून (संशोधन) विधेयक 2018 पारित किया। इस बिल को केन्द्रीय राज्य कानून मंत्री पी. पी.चौधरी द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इस बिल के द्वारा पांच व्यक्तिगत कानूनों (हिन्दू विवाह अधिनयम, मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, विवाह विच्छेद अधिनियम(ईसाईयों के लिए), विशेष विवाह अधिनियम तथा हिन्दू एडॉप्शन व मेंटेनेंस एक्ट) में कुष्ठ रोग को तलाक का आधार नहीं रखा जायेगा।


इस बिल को लोकसभा में अगस्त, 2018 में प्रस्तुत किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य तलाक के लिए कुष्ठरोग के आधार को हटाना है। विधि आयोग ने 256वीं रिपोर्ट में कहा था कि कुष्ठ रोग से प्रभावित लोगों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण कानूनों व प्रावधानों को हटाया जाना चाहिए। 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने कुष्ठ रोग से प्रभावित लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र और राज्यों सरकारों को कदम उठाने के लिए कहा था। इस दौरान केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि कुष्ठ रोग अब एक साध्य रोग है, इसलिए यह संशोधन करना आवश्यक है।


कुष्ठरोग एक संक्रामक बैक्टीरियल रोग है, यह मायकोबैक्टीरियम लेप्रे के कारण होगा है। यह रोग मुख्य रूप से त्वचा, सम्बंधित तंत्रिकाओं तथा आखों को प्रभावित करता है। भारत सरकार ने इस रोग को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय कुष्ठरोग निवारण कार्यक्रम शुरू किया है। भारत में अब कुष्ठरोग एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, इसका अर्थ यह है कि देश में 10,000 लोगों में से 1 व्यक्ति से कम इस रोग से प्रभावित है।


आमतौर पर हमारे समाज में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में लोग लाखों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन जागरूकता के आभाव में कुष्ठ रोग पर चुप्पी साध लेते हैं। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। इस रोग को छुपाने की बजाए शुरुआती दौर में ही उसका उपचार तय किया जाए तो मुश्किलों से बचा जा सकता है। 


यह भी पढ़ें:  कभी विधायक और सासंद रहे अब 81 साल की उम्र में पूरी कर रहे हैं पीएचडी


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