एक ऐसा शख़्स जिसने पौधारोपण को बनाया अपने जीवन का परम लक्ष्य

पेड़ को बेटी मानने वाले चन्द्र भूषण तिवारी उन चन्द लोगों में से एक हैं, जो अब शख्स से शख्सियत बन गये हैं। उनका शुमार पग चिन्हों पर चलने वालों में नहीं, बल्कि पग चिन्ह बनाने वालों में होता है। एक दशक में एक लाख पेड़ लगाने का संकल्प पूरा करने वाले चन्द्रभूषण तिवारी, पेड़ वाले बाबा के नाम से विख्यात हैं।

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"देवरिया में जन्में लखनऊ में निखरे चन्द्र भूषण तिवारी जैसे लोग आज पर्यावरण असन्तुलन के दौर में एक संजीवनी की भांति हैं, जिनके प्रयासों से पृथ्वी का श्रृंगार बचा है, साथ ही प्रकृति और पर्यावरण, सृष्टि और सृजन को संरक्षित करने की प्रेरणा भी प्राप्त होती है। रामसेतु निर्माण में नल-नील, हनुमान जैसे अनेक वीरों के मध्य जिस प्रकार गिलहरी का योगदान था, कुछ ऐसा ही अपना योगदान मानते हैं पर्यावरण संरक्षण के सन्दर्भ में चन्द्रभूषण तिवारी, जिन्हें लोग पेड़ वाले बाबा के नाम से भी जानते हैं।"

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"चंद्र भूषण तिवारी ने दस लाख पौधे लगाने का संकल्प लिया है और अभी तक वे एक लाख पौधे लगा चुके हैं।"

पत्थर की मूर्तियां आकर्षण तो पैदा कर सकती है, लेकिन अॉक्सीजन नहीं। आज के उपभोक्तावादी दौर में आक्सीजन के उत्सर्जकों की अंधाधुंध कटाई ने सभ्यता के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। शुक्र है, कि ऐसे उपभोक्तावादी समय में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आसन्न संकट को समझ कर प्रकृति से स्वयं के रिश्ते को समझते हैं और लोगों को समझाते भी हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी, लखनऊ में रहने वाले ऐसे ही प्रकृति प्रेमी चंद्र भूषण तिवारी हैं, जिन्होंने पौधारोपड़ को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है, जिन्हें आम जनमानस पेड़ वाले बाबा के नाम से भी जानता है। 

चंद्र भूषण कहते हैं, कि तेजी खतम हो रहे पेड़ों की समस्या विकराल है, इसीलिए संकल्प भी विशाल है। दुनिया रोज-ब-रोज बदल रही है। जैसी पहले थी उससे बेहतर हो रही है। लोग जागृत हो रहे हैं। अपने समाज के बारे में सोचने लगे हैं, एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा, जब लोभ पर त्याग, लाभ पर कर्तव्य विजय पायेगा। पर्यावरण पर मंडराते खतरे को रेखांकित करते हुए चंद्रभूषण तिवारी कहते हैं, कि अभी तक वे एक लाख से अधिक पौधे लगा चुके हैं जबकि उन्होंने अपने जीवन में दस लाख पौधे लगाने का संकल्प लिया है। उनके अनुसार प्रकृति के बिगड़े संतुलन को कायम रखने के लिए लोगों को आगे आकर वृहद स्तर पर पौधे लगाने का काम करना होगा।

चंद्र भूषण खुद तो अधिक से अधिक पौधे लगाते ही हैं, लोगों को भी पौधे लगाने के लिए जागरुक करते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों का मानवीय विषयों एवं प्रकृति की ओर ध्यान खींचना और वृक्ष को अपनी बेटी मानते हुए हर घर के सामने एक पेड़ लगाकर उस घर से दिली रिश्ता जोडऩा पेड़ वाले बाबा के जीवन का उद्देश्य है। बाबा अपनी मुहिम में कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। उनकी इस लगन के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल बी.एल. जोशी ने उन्हें सम्मानित भी किया।

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स्कूलों में जा-जाकर गरीब बच्चों को शिक्षा देने वाले चंद्रभूषण तिवारी पढ़ाने की फीस के बदले स्टूडेंट्स से दस पौधे लगाने का वादा लेते हैं।

पेड़ वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध आचार्य चंद्रभूषण तिवारी की जीवन यात्रा बड़ी ही काफी मर्मस्पर्शी है। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में एक छोटे से गांव भंटवा तिवारी में पैदा हुए चंद्र भूषण ने पौधारोपड़ के द्वारा एक ऐसी मुहिम शुरू करने का फैसला किया, जिससे उनकी जिंदगी बदल गई। अब ये राजधानी और सूबे के अन्य हिस्सों में पेड़ वाले बाबा के नाम से मशहूर हैं।

आचार्य चंद्रभूषण तिवारी ने योर स्टोरी से विशेष बातचीत में अपने जीवन के उन पहलुओं को भी सामने रखा, जिससे आम आदमी कुछ सीख सकता है। बाबा बताते हैं, गांव के जिस स्कूल में पढ़ता था वहां हर शनिवार बालसभा होती थी। मैं भी उसमें हिस्सा लेता था। बाद में मैं अपने गांव में भी बालसभा कराने लगा। इस दौरान मैं लोगों को आम, जामुन और कटहल के पौधे भी देता था। इस काम से गांव में प्रशंसा मिली।

भटवां तिवारी गांव में प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद चंद्र भूषण लखनऊ आ गये। लखनऊ विश्वविद्यालय से इन्होंने स्नातक की उपाधि हासिल की। फिर बीएड किया और फिर इन्हें केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिल गई। चंद्र भूषण कहते हैं, कि लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान मैं राजधानी की झुग्गी-झोपडिय़ों में बच्चों के बीच चला जाता था। राजधानी में घर-घर जाकर बच्चों के लिए पुराने कपड़े दान के तौर पर ले आता था। गरीब-बेसहारा बच्चे काफी खुश होते थे। वे कहते हैं, कि 1995 में जिस दौरान वे ओडिशा के केंद्रीय विद्यालय में नौकरी कर रहे थे, वो साल उनकी ज़िंदगी का निर्णायक साल साबित हुआ। लखनऊ के गरीब बच्चों ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी, जिसमें बच्चों ने लिखा अंकल आप कब आओगे, खिलौने और मिठाई कब लाओगे। किताबें कब मिलेंगी। पत्र पढ़ने के बाद तिवारी ने नौकरी छोड़ लखनऊ आने का फैसला कर लिया।

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प्रकृति से स्वयं के संबंध को समझने की जरूरत: चंद्रभूषण तिवारी उर्फ पेड़ वाले बाबा

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चंद्र भूषण तिवारी ने बच्चों के लिए स्कूल खोले हैं, जिसमें वे गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देते हैं। उन बच्चों के घरों से दान लेने के बदले वे उस घर में वृक्ष लगाकर उस परिवार से हमेशा-हमेशा के लिए एक खास रिश्ता जोड़ लेते हैं।

नौकरी छोड़ने के बाद शुरू हुआ चंद्र भूषण के जीवन का असली संघर्ष। ओडिशा से लखनऊ पहुंचने पर उन्होंने उन बच्चों से मुलाकात की जिन्होंने उन्हें ख़त लिखा था और उसके बाद अपने जीवन को पूरी तरह से बच्चों और वृक्षों को समर्पित कर दिया। राजधानी में बाबा ने बच्चों के लिए चार स्कूल खोले हैं। इन स्कूलों में वे गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देते हैं। चंद्र भूषण बताते हैं, कि हर घर से दान लेने के बदले वहां एक वृक्ष लगाकर रिश्ता जोड़ने की मुहिम की वजह से ही वह कब तिवारी से पेड़ वाले बाबा बन गए, पता नहीं चला। आज लोग उन्हें पेड़ वाले बाबा के नाम से पुकारते हैं। स्कूलों में जा-जाकर गरीब बच्चों को शिक्षा देने वाले चंद्रभूषण तिवारी पढ़ाने के बदले में स्टूडेंट्स को दस पौधे लगाने का वादा लेते हैं।

पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन पर चिंता जाहिर करते हुए चंद्र भूषण कहते हैं, कि संयुक्त राष्ट्र भी चिंतित है और अपने स्तर पर इसे सुधारने का प्रयास भी कर रहा है, लेकिन जब तक समाज का हर एक व्यक्ति जागरूक नहीं होगा इस खतरे को नहीं टाला जा सकता और प्राकृतिक संतुलन को कायम रखने में वृक्षों की भूमिका को भी नजरअंदाज ही किया जा सकता है। ऐसे में उन्होंने खुद दस लाख पौधे लगाने का संकल्प लिया है और दूसरों को भी अधिक से अधिक पौधे लगाने के लिए प्ररित करते रहते हैं।

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