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गूगल की नौकरी छोड़, समाजसेवा और प्रकृति को बचाने की मुहिम से जुड़ा यह शख़्स

केरल के आदर्श भट ने ये काम करने के लिए छोड़ दी गूगल की मोटे पैकेज की नौकरी...

11th Apr 2018
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मूलरूप से केरल के रहने वाले आदर्श भट ने गूगल की नौकरी छोड़ समाज सेवा से जुड़ने का फ़ैसला लिया और फ़िलहाल वह कर्नाटक के कुमटा में स्थित पंचभूत कन्ज़र्वेशन फ़ाउंडेशन से जुड़े हुए हैं। 

आदर्श कीटीम

आदर्श कीटीम


पंचभूत फ़ाउंडेशन स्थानीय अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए एक ख़ास तरह के मॉडल का इस्तेमाल करती है। आदर्श बताते हैं कि फ़ाउंडेशन की व्यवस्था में हर आदमी का कार्य निर्धारित है और एक व्यक्ति के काम का फ़ायदा दूसरे व्यक्ति को मिलता है।

आज हम आपके साथ एक ऐसे शख़्स की कहानी साझा करने जा रहे हैं, जिसने एक सफल कॉर्पोरेट करियर छोड़कर, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को संरक्षित करने की मुहिम को चुना। हम बात कर रहे हैं मूलरूप से केरल के रहने वाले आदर्श भट की, जिन्होंने गूगल की नौकरी छोड़ समाज सेवा से जुड़ने का फ़ैसला लिया और फ़िलहाल वह कर्नाटक के कुमटा में स्थित पंचभूत कन्ज़र्वेशन फ़ाउंडेशन से जुड़े हुए हैं। इस फ़ाउंडेशन का उद्देश्य है, लोगों को ऐसे आर्थिक और सामाजिक विकास की शिक्षा देना, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल तो हो, लेकिन प्रकृति को किसी भी तरह का नुकसान न हो। अब आदर्श भट भी इस अवधारणा और मुहिम का हिस्सा हैं।

इंडिया फ़ेलो प्रोग्राम से ग्रैजुएशन के बाद, आदर्श भट, एक बेहतर जीवनशैली का संदेश अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य के साथ पंचभूत फ़ाउंडेशन से जुड़े। आदर्श बताते हैं कि उनकी परवरिश केरल के कासरगोड़ में हुई। आंध्र प्रदेश के ऋषि वैली स्कूल से पढ़ाई करने बाद वह इकनॉमिक्स में ग्रैजुएशन के लिए जय हिंद कॉलेज चले गए। आदर्श बताते हैं कि प्रकृति और जीवन के प्रति आध्यात्मिक नज़रिए की नींव स्कूल ने ही उनके भीतर रख दी थी। पढ़ाई के दौरान ही, एक अडवाइज़री ग्रुप में उनकी नौकरी लग गई। आदर्श बताते हैं कि इस नौकरी की वजह से उन्हें पर्याप्त अनुभव मिला और आर्थिक तौर पर भी उन्हें काफ़ी फ़ायदा मिला। ग्रैजुएशन पूरा होने के बाद उनकी नौकरी गूगल में लग गई।

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कुछ वक़्त नौकरी के बाद ही उन्हें समझ आ गया कि वह चार दीवारों के बीच घिरी कॉर्पोरेट लाइफ़स्टाइल के लिए नहीं बने हैं। इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़कर इंडिया फ़ेलो प्रोग्राम जॉइन कर लिया। आदर्श ने ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में 13 महीने बिताए और दो गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर ज़मीनी स्तर पर काम किया। इस दौरान उनकी उम्र थी, महज़ 21 साल। ओडिशा के बाद वह उत्तराखंड चले गए। इस दौरान, उत्तराखंड, बाढ़ और भूस्खलन की प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा था।

आदर्श बताते हैं कि उन्होंने उत्तराखंड में एक साल बिताया और इस दौरान उन्होंने आजीविका चलाने के लिए कुछ ऐसे विकल्प ढूंढे, जो राहत शिविरों तक ही सीमित न हों। इस क्रम में उन्होंने साबुन और अगरबत्ती की फ़ैक्ट्रियां लगाने में स्थानीय लोगों की मदद की, ताकि लोगों को रोज़गार के बेहतर अवसर मिल सकें। आदर्श बताते हैं कि रोज़गार पैदा करने की यह मुहिम सिर्फ 5 लोगों के साथ शुरू हुई थी और अब 70 लोग अपने रोज़गार के लिए पूरी तरह से इनपर निर्भर हैं।

पंचभूत कन्ज़र्वेशन फ़ाउंडेशन का कैंपस

पंचभूत कन्ज़र्वेशन फ़ाउंडेशन का कैंपस


आदर्श का मन, किसी एक ही काम में लंबे वक़्त तक नहीं लगता था। उत्तराखंड के प्रोजेक्ट के बाद, आदर्श ने समाजसेवा के कामों से 5 साल का ब्रेक लिया और ऐडवेंचर स्पोर्ट्स से जुड़ गए। वह रॉक क्लाइंबिंग और स्लैकलाइनिंग आदि करने लगे। पंचभूत कैंपस में आज भी वह स्लैकलाइनिंग की प्रैक्टिस करते हैं।

कुमटा के निर्वाण बीच से महज़ 200 मीटर की दूरी पर स्थित पंचभूत कन्ज़र्वेशन की स्थापना मंगलदास शेट्टी ने की थी। आदर्श बताते हैं कि मंगलदास जी का मानना था कि, कन्ज़र्वेशन या संरक्षण को देखने के दो नज़रिए होते हैं। एक तो यह कि जो ख़त्म हो चुका है, उसे वापस लाने की कोशिश की जाए और दूसरा यह कि जो बचा हुआ है, उसे आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जाए। आदर्श कहते हैं कि उन्होंने दूसरा रास्ता चुना और इसके बाद स्थानीय लोगों के साथ मिलकर नदियों के संरक्षण में जुट गुए। आदर्श बताते हैं कि संगठन के माध्यम से ऐसे व्यवसायों को बढ़ावा दिया जाता है, जिनमें प्रकृति को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाए बिना और प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करके, आजीविका के नए-नए विकल्प पैदा किए जा सकते हों।

मॉनसून में दिखी पंचभूत कन्ज़र्वेशन फ़ाउंडेशन की मेहनत

मॉनसून में दिखी पंचभूत कन्ज़र्वेशन फ़ाउंडेशन की मेहनत


पंचभूत फ़ाउंडेशन स्थानीय अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए एक ख़ास तरह के मॉडल का इस्तेमाल करती है। इस मॉडल के बारे में समझाते हुए आदर्श बताते हैं कि फ़ाउंडेशन की व्यवस्था में हर आदमी का कार्य निर्धारित है और एक व्यक्ति के काम का फ़ायदा दूसरे व्यक्ति को मिलता है। आदर्श मानते हैं कि इस तरह की प्रक्रिया में विकास की गति धीमी हो सकती है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए यह उम्दा सोच है।

वर्तमान में संगठन होमस्टे मॉड्यूल्स तैयार कर रहा है। साथ ही, स्कूलों और कॉलेजों के लिए ख़ास टीचिंग और लर्निंग मॉड्यूल्स पर भी काम हो रहा है। होमस्टे मॉड्यूल के अंतर्गत, जिस स्थानीय व्यक्ति के पास ख़ुद की ज़मीन होती है और वह हॉस्पिटैलिटी के बिज़नेस में उतरना चाहता है, उसे संगठन से जोड़ा जाता है। इसके बाद पंचभूत संगठन की टीम मार्केटिंग और फ़ाइनैंस आदि में भी मदद दिलाती है। सस्टेनेबल लिविंग सॉल्यूशन्स का जिक्र करते हुए आदर्श ने एक उदाहरण दिया कि जैसे घर बनाने के लिए सीमेंट की जगह लकड़ी का इस्तेमाल करना।

पांच साल पहले शुरू हुए इस संगठन ने शुरूआती तीन सालों में लर्निंग मॉड्यूल्स तैयार किए, जिनके माध्यम से स्कूलों और कॉलेजों को प्रकृति संरक्षण के बारे में विद्यार्थियों को जागरूक करने में मदद मिल सके। पंचभूत फ़ाउंडेशन के नाम के पीछे के सिद्धांत और अवधारणा की चर्चा करते हुए आदर्श ने बताया कि पांच तत्वों (हवा, पानी, आग, ज़मीन, आकाश) के आधार पर ही संगठन का नाम रखा गया क्योंकि इन पांच तत्वों के इर्द-गिर्द ही संगठन के सभी काम होते हैं।

संगठन रेज़िडेंशियल प्रोग्राम्स के माध्यम से लोगों को फ़्लोरा, फ़ौना और मरीन इकॉलजी के बारे में जानकारी देता है। कई अन्य संगठन और संस्थान, इन प्रोग्राम्स से जुड़ते हैं और यही पंचभूत फ़ाउंडेशन की आय का ज़रिया है। करीब 25 देशों के शोधार्थी, पंचभूत फ़ाउंडेशन के प्रोग्राम्स से जुड़े चुके हैं। आदर्श ने बताया कि फ़ाउंडेशन कई सर्टिफ़िकेट कोर्स और अनुभव आधारित प्रोग्राम्स भी चलाता है।

यह भी पढ़ें: एक छोटे से स्कूल के टीचर्स बच्चों को सिखा रहे लैंगिक भेदभाव से लड़ना

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