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विकलांगों की ज़िंदगी रौशन करने में किया जीवन समर्पित पूनम ने

विगलांगों के लिये बने नेश्नल ट्रस्ट की अध्यक्ष हैं पूनम नटराजनविकलांग बेटे के जन्म के बाद जलाई अलख की मशालघर के गैराज में शुरू किया पहला सहायता केंद्रपिछले 30 वर्षों से कर रही हैं विकलांगों की सेवा

23rd Mar 2015
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आंकड़े बताते हें कि भारत में करीब 2 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी तरह की विकलांगता से पीडि़त है जो कि देश की कुल आबादी का लगभग 2 प्रतिशत हिस्सा हैं। आंकड़े हमें यह भी बताते हें कि विकलांगों में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों की संख्या अधिक है।

हमारे देश में मुख्यतः 5 प्रकार की निशक्तता या विकलांगता के मामले सामने आये हैं। आंकड़ों का अध्यनन करने से पता चलता है कि भारतवर्ष में दृष्टि संबंधित असमर्थता से पीडि़ता विकलांगों की संख्या सबसे अधिक है। कुल विकलांगो में 48.5 प्रतिशत इस निःशक्कता से पीडि़त हैं। इसके बाद पैरों से संबंधित विकलांगता के कुल 27.9 प्रतिशत मामले सामने आते हैं। इसके बाद मानसिक विक्षिप्तता (10.3 प्रतिशत), गूंगे या बोलने से लाचार (7.5 प्रतिशत) और बहरे या सुनने से लाचार (5.8 प्रतिशत) आते हैं।

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स्थिति की गंभीरता को सामने लाने के लिये सिर्फ से आंकड़े ही काफी हैं लेकिन विकलांगों की समस्याओं का अंदाजा इन आंकड़ों से कहीं अधिक है। इस बारे में हमने विगलांगों के लिये बने राष्ट्रीय न्यास ( नेश्नल ट्रस्ट) की अध्यक्ष पूनम नटराजन से वार्ता की और विस्तार से उनके न्यास और उसके कार्यकलापों के बारे में जाना। नेश्नल ट्रस्ट भारत सरकार के अधीन काम करने वाली एक संवैधानिक संस्था है जिसका मुख्य उद्देश्य विकलांग और विशेष आवश्यकता वाले लोगों के लिये काम करना है।

पूनम जीवन में सामने आने वाली हर चुनौती को अवसर में बदल देती हैं ओर यही वह बात है जो उन्हें औरों से अलग बनाती है। ऐसा ही कुछ उन्होंने अब से लगभग 30 साल पहले अपने विकलांग बेटे के जन्म के बाद किया जब उन्होंने जीवन में सामने आई सभी कठिनाईयों का डटकर सामना किया ओर बेटे की विकलांगता के बावजूद हार नहीं मानी।

पूनम बताती हैं कि ‘‘बेटे के जन्म के समय मैं विश्वविद्यालय में शोध कर रही थी। डाॅक्टरों ने मुझे बताया कि मेरे बेटे की विकलांगता के मामले में वे कुछ नहीं कर सकते और उन्होंने अपने हाथ खड़े कर दिये। मैंने तभी उन डाॅक्टरों को गलत साबित करने की ठानी और खुद को अपने बेटे की विकलांगता के हिसाब से प्रशिक्षित किया। जल्द ही मुझे यह कार्य मजेदार लगने लगा। मेरे बेटे ने मुझे रूढि़वादी समाज को भूलकर आगे बढ़ने की शिक्षा दी और मेरा जीवन और समाज के प्रति नजरिया ही बदल गया। निःशक्तता जीवन के प्रति आपके नजरिये को भी बदलती है और आप उच्च प्रयोजन के साथ जीवन को एक अलग परिपेक्ष में देखने लगते है।’’

पूनम आगे जोड़ते हुए बताती हैं कि, ‘‘विकलांग होने की वजह से कोई भी स्कूल मेरे बेटे को अपने यहां भर्ती करने के लिये तैयार नहीं हुआ। इसके बाद मैंने खुद ही एक प्रशिक्षण केंद्र प्रारंभ करने का इरादा किया। इस काम की शुरुआत में मैने लोगों से उनके बच्चों की विकलांगता को रहस्य न बनाकर रखने और खुलकर सामने आने के लिये प्रेरित करने से की। इस सफर के प्रारंभ से ही मुझे कई साहसिक साथी मिले जो निःशक्त लोगों की सहायता के लिये कुछ करना चाहते थे और सबके सहयोग से मैंने चेन्नई के अपने घर के गैराज में इस प्रशिक्षण केंद्र की नींव रखी।’’ पूनम द्वारा शुरू किये गए केंद्र का नाम विद्यासागर रख गया और वर्तमान में करीब 3500 विकलांग लोगों की जिंदगी इस केंद्र की वजह से निखर रही है।

पूनम द्वारा शुरू किया गया यह केंद्र जल्द ही पूरे चेन्नई में मशहूर हो गया ओर उनकी योग्यता और क्षमता को बाद में सरकार ने भी सराहा। पूनम का कहना है कि ,‘‘करीब 23 सालों तक उस केंद्र की निदेशक रहने के बाद मैं इस कार्य को आगे ले जाना चाहती थी। मैंने इस केंद्र को अपने खून-पसीने से सींचा था और अब मैं इसे खुद आगे बढ़ता हुआ देखना चाहती थी। उसी दौरान नेश्नल ट्रस्ट में एक एनजीओ विशेषज्ञ की आवश्कता निकली और मुझे लगा कि इस काम के द्वारा मैं अधिक से अधिक विकलांगों की सहायता कर पाऊंगी। इस ट्रस्ट की अध्यक्ष होने के नाते मेरा दायित्व है कि मैं कुछ ऐसा करूं जिससे सभी देशवासियों का विकलांगों के प्रति नजरिया बदले। मेरा प्रयास है कि मैं ऐसे विकलांग बच्चों के माता-पिता की सोच में बदलाव ला सकूं ताकि उन्हें यह भरोसा कायम हो सके कि उनका बच्चा किसी पर बोझ नहीं है और वह भी देश की तरक्की में हाथ बंटा सकता है।’’

पूनम आगे बताती हैं उनका अबतक का सफर काफी चुनौतीपूर्ण रहा हे लेकिन अब चूंकि उनके काम करने का दायरा और बड़ा हो गया है और उन्हें अपने जैसे लोगों से मिलने का मौका मिल रहा है इसलिये वे इस काम को और अधिक ऊर्जा के सााि कर पा रही हैं।

एक केंद्र चलाने में और किसी सरकारी तंत्र में काम करने में जमीन आसमान का अंतर है और खुद में बदलाव लाना पूनम के लिये भी इतना आसान नहीं था। पूनम कहती हें कि ‘‘सरकारी तंत्र में काम करने का अपना एक अलग तरीका होता है। आपको अपने काम के परिपेक्ष में लगातार लगे रहना होता है। लेकिन मुरे अंदर कुछ करने का जुनून था क्योंकि मैंने पाया था कि हमारे देश में अधिकतर लोगों को इस बारे में कोई जानकारी थी ही नहीं। मैंने कई ऐसे मामले ऐसे भी देखे भी जिनमें गरीब लोग अपने विकलांग बच्चे को सड़क पर लावारिस छोड़कर लापता हो गए थे। हालांकि हाल के वर्षों में लोगों में जागरुकता बढ़ी है और विकलांगता को लेकर लोगों का नजरिया बदला है लेकिन अब भी हमें खुद को बदलने में करीब 20 साल का समय और लगेगा। लेकिन हर बड़ा काम एक छोटे कदम से शुरू होता है और मुझे खुशी है कि मैं विकलांगता के प्रति लोगों की मानसिकता बदलने की दिशा में कुछ कर पा रही हूं।’’

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