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सिख किसान ने कनाडाई एग्रीकल्चर 'हॉल ऑफ फेम' में शामिल हो रचा इतिहास

12th Nov 2018
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पीटर ढिल्लों कनाडा के महान शख्सियतों की फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं। उनके करौंदा कारोबार 2.5 अरब डॉलर से ज्यादा का हो चुका है। अपने पिता के साथ वह ग्यारह साल की उम्र से ही इसकी खेती और बिजनेस में जुट गए थे। आज वह क्रैनबेरी के सबसे बड़ा कनाडाई निर्माता और बहुराष्ट्रीय कंपनी ओशन स्प्रे के शेयरधारक हैं।

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करौंदे का पौधा कांटेदार झाड़ीनुमा एवं सदाबहार होता है, जो प्रायः 3 से 4 मीटर ऊंचाई तक बढ़ता है। भारतीय किसान इसको खेत के चारो और जंगली एवं पालतू पशुओं से सुरक्षा के लिए भी लगाते देते हैं।

कनाडा में जा बसे सिख किसान पीटर ढिल्लो वहां के सबसे बड़े करौंदा उत्पादक बन चुके हैं। हाल ही में उन्होंने कनाडाई एग्रीकल्चर 'हॉल ऑफ फेम' में नामित होकर इतिहास रच दिया है। इससे पहले ढिल्लों ने 2014 में ओशियन स्प्रे का पहला अश्वेत अध्यक्ष बनकर भी ढिल्लों ने इतिहास रचा था। पीटर ढिल्लो अल्पसंख्यक समुदाय के पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जो कृषि और कृषि-खाद्य व्यवसाय में अपनी छाप छोड़ने के साथ ही कनाडा के महान शख्सियतों की फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं। ढिल्लो वर्तमान में ओशियन स्प्रे के अध्यक्ष भी हैं। ओशियन स्प्रे 90 से ज्यादा देशों में अपना उत्पाद बेचता है और इसकी वार्षिक बिक्री 2.5 अरब डॉलर से ज्यादा है। ओशियन स्प्रे अमेरिका और कनाडा में करौंदा किसानों का एक सहकारी विपणन है। ढिल्लों कहते हैं कि वह कनाडा के महान नागरिकों में शामिल होकर बहुत खुश हैं। यह उनके लिए बहुत सम्मान की बात है और वह बहुत ही विनीत महसूस कर रहे हैं क्योंकि यहां बहुत से लोग हैं, जो इस सम्मान के हकदार हैं।

पीटर ढिल्लों ने 11 साल की उम्र से ही करौंदे के व्यवसाय के बारे में जानने समझने लगे थे। वह बताते हैं कि उनकी माँ उन्हे अपने खेतों में काम करने के लिए बचपन से ही उनको प्रेरित करने लगी थीं। गर्मियों के दौरान वह हमेशा अपने काम का आनंद लेते हैं। तेज गर्मी में भी उन्हे काम पर जाना पड़ता है। पिता के रहने तक उन्हे अपनी जिम्मेदारियों का गहराई से अहसास नहीं हुआ। बाद में उन्होंने पूरा बिजनेस स्वयं संभाल लिया। उन्होंने अपने पिता से बहुत कुछ सीखा। उन्होंने सिखाया कि हमेशा कड़ी मेहनत करते रहना। उनकी ये सीख रही कि अपने समुदाय के लोगों का ध्यान रखना। उन्होंने यूबीसी से स्नातक किया, इतिहास में बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री ली, एलएलबी के साथ ब्रिटेन में भी अपनी शिक्षा जारी रखी।

विश्वविद्यालय शिक्षा पूरी करने के बाद वह अपने करौंदे के व्यवसाय में जुट गए। उस समय उनकी अपने प्रॉडक्ट की एक छोटी सी कंपनी थी। वह पिता के साथ इसे बड़ा बनाने में व्यस्त रहने लगे। वह गर्व से कहते हैं कि आज वह क्रैनबेरी के सबसे बड़ा कनाडाई निर्माता और बहुराष्ट्रीय कंपनी ओशन स्प्रे के कनाडाई शेयरधारक हैं। उनको कनाडा में क्रैनबेरी किंग के रूप में जाना जाता है। वह अपने पिता के साथ बिताए गए खूबसूरत क्षणों को याद करते हुए कहते हैं कि आज भी मुझे उनका अभाव खलता है। पिता के साथ हमेशा उनका अच्छा रिश्ता रहा। वह सबसे अच्छे दोस्त थे। उनके पास पिता की एक छोटी सी पेंटिंग है, जिससे वह अक्सर बातें किया करते हैं।

'ढिल्लों सेंटर फॉर बिजनेस एथिक्स' की स्थापना 2015 में हुई थी। इस केंद्र का लक्ष्य करौंदे के व्यवसाय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना है। वह कहते हैं कि तमाम व्यावसायिक नेता वास्तव में अच्छे लोग हैं। हर रोज उन्हें जटिल स्थितियों का सामना करना पड़ता है लेकिन विश्वास है कि उनका केंद्र उनको अपेक्षित सहयोग देने में कारगर होगा। वह अपनी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, अध्यक्ष और मुख्य संचालन अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं। वह बोस्टन पिज्जा इंटरनेशनल में भी काम कर चुके हैं। उन्होंने अन्य कई कृषि क्षेत्रों में भी वरिष्ठ पदों पर कार्य किया है, जिनमें पिट मीडोज फार्म लिमिटेड के उपाध्यक्ष और आर एंड एच क्रैनबेरी लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी रहे हैं। वह अप्रैल 2014 से ओशन स्प्रे क्रैनबेरी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे हैं। वह दिसंबर 2017 से बैंक ऑफ कनाडा के निदेशक भी हैं। आज वह किसी परिचय के मोहताज नहीं। उनका काम खुद बोलता है।

करौंदे का पौधा कांटेदार झाड़ीनुमा एवं सदाबहार होता है, जो प्रायः 3 से 4 मीटर ऊंचाई तक बढ़ता है। भारतीय किसान इसको खेत के चारो और जंगली एवं पालतू पशुओं से सुरक्षा के लिए भी लगाते देते हैं। बाढ़ के साथ-साथ पौधों से प्राप्त फलों द्वारा अतिरिक्त आय प्राप्त हो जाती है। इसके कच्चे फलों का सब्जी, चटनी, अचार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। पक्के फलों द्वारा जेली, मुरब्बा व स्क्वैस जैसे परीरक्षित पदार्थ बनाए जाते हैं। यह भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण में भी सहायक रहता है। इसके फलों में विटामिन सी एवं लौह तत्व होते हैं। इसका उपयोग मिठाई एवं पेस्ट्री को सजाने के लिए रंगीन चेरी की जगह भी किया जाता है।

यह सभी प्रकार की मृदा में आसानी से उगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में अमरूद के बागों के लिए ख्यात चिरईगांव (वाराणसी) अब करौंदे की खेती के लिए भी जाना जाने लगा है। इसकी खेती किसानों को मालामाल कर रही है। आचार व मुरब्बा के स्वाद की ख्वाहिश किसानों, व्यापारियों व खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े उद्यमियों के चेहरे पर खुशियां बिखेर रही है। वर्तमान में करौंदा लगभग सैंतीस सौ रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। कम उत्पादन के बाद भी इससे कम से कम प्रति बीघे लगभग पचहत्तर हजार रुपये की कमाई हो जाती है। चिरईगांव में प्रतिदिन औसतन अस्सी से सौ कुंतल तक करौंदे की आवक हो जाती है।

राजस्थान के श्रीगंगानगर क्षेत्र में भी किसान करौंदे की खेती कर रहे हैं। यहां के किसान करौंदे के फल बेचकर अच्छा खासा मुनाफा कमा रहे हैं। कृषि अनुसंधान केंद्र किसानों को करौंदे के पौधे उपलब्ध करा रहा है। अब तक क्षेत्र के किसान आठ हजार करौंदे के पौधों की बाड़ लगा चुके है। भारत में राजस्थान के अलावा मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तरप्रदेश और हिमालयी क्षेत्रों में भी किसान इसकी फसल ले रहे हैं। अम्बेडकरनगर (उ.प्र.) के परेम गाँव निवासी करौंदे के किसान संतोष कुमार सिंह बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 2008 में करौंदा के 300 पौधे जुलाई महीने में अपनी फसल के आस-पास लगाए थे। उस समय दो रुपए में एक पौधा पड़ा था। तब से आज तक कोई लागत नहीं पड़ी है क्योंकि फसल में जो खाद पानी डालते हैं, पौधों तक आसानी से पहुंच जाता है। डेढ़ साल के बाद इसके फल लगने शुरू हो गए। एक करौंदे के पेड़ से कम से कम 10 किलो फल आराम से निकल आता है। दुकानदार सीधे उनसे रोजाना करौंदा खरीद लेते हैं। फुटकर बाजार में ये 12 रुपए किलो तक बिक जाता है।

यह भी पढ़ें: गरीब दिव्यांगों को कृत्रिम अंग बांटने के लिए स्कूली बच्चों ने जुटाए 40 लाख रुपये

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