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जोमैटो की कहानी, स्टार्टअप पोस्टर बॉय दीपिंदर गोयल की जुबानी

इंटरव्यू विद आंत्रेप्रेन्योर...

श्रद्धा शर्मा
24th Oct 2017
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जोमैटो ने लागत घटाने और रेवेन्यू जेनरेट करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। नौकरी डॉट कॉम की विंग इन्फो एज के आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष मार्च 2017 तक जोमैटो का लाभ 80 प्रतिशत बढ़कर 333 करोड़ हो गया। इन्फो एज की जोमैटो में छोटी सी हिस्सेदारी भी है। जोमैटो लगातार लाभ हासिल करने की ओर अग्रसर है। आप थोड़ी सी गहराई में जाएंगे तो आपको मालूम चलेगा कि जोमैटो को लिए फायदा एक जरूरी लक्ष्य है। वित्तीय वर्ष 2017 में जोमेटो का ऑपरेटिंग कॉस्ट 77 करोड़ रुपये थी जो कि आने वाले समय में काफी कम होता जा रहा है। मैंने उनसे काफी विस्तार में बात की जिसके कुछ अंश यहां आपके सामने प्रस्तुत हैं-

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पतले-दुबले कद-काठी के दीपिंदर का कामकाज कुछ ऐसा लगता है कि वे इस स्टार्टअप की दुनिया पर राज करने के लिए भूखे हैं। इन दो सालों में दीपिंदर को कई उतार चढ़ावों का सामना करना पड़ा। कई लंबी रातों में जागकर उन्होंने काम किया जिसका असर आज साफ दिखता है।

मैं दीपिंदर गोयल से दो साल पहले 2 फरवरी 2015 को मिली थी। उस वक्त जोमैटो अपने शुरुआती दौर में था और कुछ दिन पहले ही कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में बिजनेस कर रहे 'अर्बनस्पून' का अधिग्रहण किया था। जब दीपिंदर मुझसे मिलने के लिए आगे बढ़े तो उनकी चाल में गजब का आत्मविश्वास झलक रहा था। उस वक्त मैंने यही कहा था कि वाह क्या गजब का कॉन्फिडेंस है। जोमैटो के को-फाउंडर और सीईए ने टी-शर्ट और जींस पहन रखी थी। देखने से वह एकदम खुशमिजाज इंसान लग रहे थे। जब मैंने उनसे दूसरी कंपनी के लोगों को हायर करने की स्ट्रैटिजी के बारे में पूछा तो उन्होंने काफी सुलझे अंदाज में कहा था कि इससे किसी को दिक्कत क्यों है। दरअसल उस वक्त ऐसी अफवाहें उड़ी थीं कि जोमैटो मनमाने तरीके से लोगों को नौकरियां दे रहा है। उन्होंने कहा था कि अगर कोई अपनी कंपनी छोड़ रहा है तो इसमें उन्हें क्यों दिक्कत होगी। उनका साफ कहना था कि अगर कोई कंपनी चाहे तो जोमैटो के कर्मचारी को नौकरी के लिए कॉल कर सकती है।

खैर, इन सब बातों को दो साल से ज्यादा हो रहे हैं। अभी उनसे मेरी मुलाकात कुछ महीने पहले ही हुई। मिलकर ऐसा लगा कि कुछ ज्यादा बदलाव तो नहीं हुआ है, लेकिन हां काफी कुछ बदल चुकाहै । पतले-दुबले काठी के दीपिंदर का कामकाज कुछ ऐसा लगता है कि वे इस स्टार्टअप की दुनिया पर राज करने के लिए भूखे हैं। इन दो सालों में दीपिंदर को कई उतार चढ़ावों का सामना करना पड़ा। कई लंबी रातों में जागकर उन्होंने काम किया जिसका असर आज साफ दिखता है। मैं गुडगांव के ले मेरिडियन होटल के कॉफी लॉउंज में बैठकर उनका इंतजार कर रही थी। उन्होंने मुझे मैसेज किया कि वह किन्हीं कारणों से लेट हो रहे हैं, लेकिन कुछ ही देर में वे आ गए। उन्होंने अपने लिए चाय और मेरे लिए ब्लैक कॉफी ऑर्डर की और फिर हम साथ बैठकर जोमैटो की कहानी सुनने लगे। जोमैटो के यहां तक का सफर कर लेने की कहानी बड़ी रोचक है। मैंने इसे स्टार्टअप की दुनिया का पोस्टर बॉय बनते देखा है। बिजनेस अखबारों की हेडलाइन पर जोमैटो कई बार छाया रहा है। इसने भारतीय स्टार्टअप जगत को एक नई दिशा दी है। 2014-15 के वक्त भारतीय इकोसिस्टम में इसकी खूब चर्चा हुई थी। लेकिन अचानक से 2015 के अंत में जोमैटो के साथ कई मुश्किलों की खबरें आने लगीं। उस वक्त जोमैटो के लिए फंडिंग की समस्या आ गई थी।

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जब दो साल बाद मुझे इस शख्सियत से मिलने का मौका मिला तो मैं इस लार्जर दैन लाइफ वाले इंसान से मिलने के लिए काफी उतावली थी। जोमैटो ने लागत घटाने और रेवेन्यू जेनरेट करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। नौकरी डॉट कॉम की विंग इन्फो एज के आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष मार्च 2017 तक जोमैटो का लाभ 80 प्रतिशत बढ़कर 333 करोड़ हो गया। इन्फो एज की जोमैटो में छोटी सी हिस्सेदारी भी है। जोमैटो लगातार लाभ हासिल करने की ओर अग्रसर है। आप थोड़ी सी गहराई में जाएंगे तो आपको मालूम चलेगा कि जोमैटो को लिए फायदा एक जरूरी लक्ष्य है। वित्तीय वर्ष 2017 में जोमेटो का ऑपरेटिंग कॉस्ट 77 करोड़ रुपये थी जो कि आने वाले समय में काफी कम होता जा रहा है। मैंने उनसे काफी विस्तार में बात की जिसके कुछ अंश यहां आपके सामने प्रस्तुत हैं-

श्रद्धा शर्मा: सबसे पहले तो आपको एक महीने में तीस लाख ऑर्डर का टार्गेट हासिल करने के लिए बधाई। इतनी बड़ी सफलता हासिल करने के बाद आप कैसा महसूस कर रहे हैं?

दीपिंदर गोयल: हमें जहां होना चाहिए था हम वहां पर हैं, लेकिन अभी भी काफी कुछ करने को बचा हुई है। इस वक्त तीस लाख का आंकड़ा हमारे लिए काफी मायने रखता है। मुझे मालूम चल गया है कि इस बिजनेस में कौन सी चीज आपके काम की है और क्या गैरजरूरी। अब कई और चीजों को करने का वक्त है। असली चुनौती इस बात की है कि हमारे यहां अधिकतर खाना घर पर बनता है और रेस्टोरेंट्स कभी उसे रिप्लेस नहीं कर सकते हैं। हमारे यहां ये धारणा बन गई है कि घर के खाने जैसी क्वॉलिटी बाहर मिल ही नहीं सकती। मैं इस बात से सहमत हूं, लेकिन घर पर बना खाना बनाने से बाहर खाना कई बार आसान लगता है।

एक आम भारतीय परिवार घर के लिए परचून के सामान में लगभग 10,000 रुपये तो हर महीने खर्च ही हो जाते हैं। अगर आंकड़ा लगाया जाए तो हर रोज 300-400 रुपये हर फैमिली रोजाना खाने पर खर्च करती है। हमें 50 रुपये में किफायती, स्वादिष्ट और साफ-सफाई से बना खाना डिलिवर करने के बारे में सोचना होगा। इसी की बदौलत हम देश के करोड़ो लोगों का पेट भर सकेंगे। यह काम मुश्किल तो है, और ऐसा भी नहीं है कि इन सारे सवालों के जवाब मेरे पास हैं, लेकिन हां हमारे पास कुछ आइडियाज जरूर हैं।

मेरे कहने का मतलब ये है कि करोड़ों लोगों की तुलना में एक महीने में तीस लाख ऑर्डर प्लेस हो जाना काफी छोटा लक्ष्य है। इसीलिए अभी तो हम इन आंकड़ों से खुश हैं, लेकिन हम इस बात पर भी फोकस कर रहे हैं कि आगे और क्या किया जाना चाहिए।

श्रद्धा: यह तो नामुमकिन सा लगता है क्योंकि लोग हमेशा खाने के बारे में शिकायत करते रहते हैं, या नहीं?

दीपिंदर: सब कुछ मुमकिन है। आपको बस समस्या का समाधान करने के लिए दिमाग लगाना होगा। हम सही जवाब की तलाश में हैं।

श्रद्धा: अगर आप अपने बीते सफर को देखें तो उद्यम के हाइवे पर अपने को कहां पाते हैं?

दीपिंदर: हमें मालूम है कि हम कहां जा रहे हैं, हम क्या बनाना चाहते हैं, हमें पता है कि हमें करना क्या है और ये भी मालूम है कि कैसे करना है। हम ये अच्छे से जान चुके हैं कि सिर्फ पैसों की बदौलत बड़ी कंपनी नहीं बनाई जा सकती। बल्कि सच तो ये है कि बड़ी कंपनियां बिना पैसों के ही खड़ी होती हैं। हमारी टीम में अच्छे लोग हैं, यहां तक कि पिछले दो सालों के बाद हमें ऐसा लगता है कि हम अभी स्कूल से निकले हैं। हमें गहराई से ये अहसास होता है कि एजुकेशन एक लंबा सफर होता है और हमें सिर झुकाकर समस्याओं से निपटते और सीखते रहना होता है।

श्रद्धा: आप स्टार्टअप्स के पोस्टर बॉय रह चुके हैं। लेकिन पिछले दो साल मुश्किल भरे रहे हैं। जोमैटो को काफी प्यार भी मिला लेकिन लोगों ने इसे नजरअंदाज भी किया। आपके रवैये और व्यवहार के बारे में भी गलत खबरें सामने आईं इससे पूरा परिदृश्य बदला। हमें नहीं पता कि अंदर की हकीकत क्या है, लेकिन आपको दोनों तरफ की बात पता है, आप इसके बारे में कैसा महसूस करते हैं?

दीपिंदर: मुझे लगता है कि मैं बदला नहीं हूं। सिर्फ एक बदलाव ये आया है कि मैंने मीडिया से मुखातिब होना छोड़ दिया है और आप इसे चाहे मेरी 'मुंहफट' बातचीत कह लें या मेरा 'अक्खड़पन' लेकिन मुझे ऐसा लगा कि जैसा मैं कह रहा हूं लोग उसे उस तरह से नहीं लेते हैं। इसलिए मेरा सेंस ऑफ ह्यूमर ज्यादातर लोगों को समझ नहीं आता क्योंकि लोग मुझे ठीक से जानते नहीं हैं।

दूसरी बात मैं पंजाब से हूं। मुझे नहीं पता कि बातों को कैसे घुमाना चाहिए। मुझे पता है कि मैं बिना चेतावनी के सोचता हूं और फिर मुझे गलत साबित कर दिया जाता है।

श्रद्धा: कुछ इन्वेस्टर्स से भी ये सुनने को आया कि आपके साथ डील करना काफी मुश्किल है?

दीपिंदर: मुझे पता है कि वे ऐसा क्यों कहते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं समझौते नहीं करता हूं। इसलिए नहीं कि मैं किसी खास पद पर हूं बल्कि बस सिर्फ इसलिए कि मैं किसी भी चीज से समझौता करना पसंद ही नहीं करता हूं। मैं एकदम साफ-सुथरा काम करने में यकीन रखता हूं। अधिकतर जब भी हमने फंडिंग इकट्ठा की, तो यह भीतर का इंट्रेस्ट रहा। कई बार इन्वेस्टर्स ने हमसे कई डेटा की मांग की जिनमें से कुछ डेटा के बारे में तो हम खुद ही नहीं जानते थे। हमने उन्हें डेटा देने से मना कर दिया क्योंकि हमारे पास वो था ही नहीं। दरअसल हमारे पास इतना वक्त ही नहीं है कि हम ऐसे डेटा इकट्ठे करने में समय जाया करें। हमारे पास सिर्फ एक बिजनेस है जिसे हम चलाते हैं। अब आपको यह फैसला करना है कि आप इन्वेस्टमेंट करना चाहते हैं या नहीं।

श्रद्धा: कुछ ऐसी अफवाहें भी चली थीं कि जोमैटो को मार्केट में आए सबसे ज्यादा वक्त हो गया है लेकिन फिर भी यह फंड नहीं इकट्ठा कर पा रहा है। एक और चीज थी वैल्युएशन को लेकर। इन बातों में कितनी सच्चाई है?

दीपिंदर: हां और नहीं। हम पिछले कुछ महीने पहले मार्केट में थोड़े समय के लिए गए थे। हमारे लिए परिचालन पूंजी की आवश्यकता ही काफी कम थी इसलिए हमें पैसों की जरूरत नहीं पड़ी। हम जो खोज रहे थे वह हमें मिला ही नहीं इसलिए हमने पैसे ही नहीं जुटाए।

श्रद्धा: क्या आप मानते हैं कि हाई वैल्युएशन से समस्याएं खड़ी होती हैं?

दीपिंदर: मुझे लगता है कि ये उस चीज के बारे में है जो आपका बिजनेस डिजर्व करता है। अगर आप उस चीज को हासिल नहीं कर पा रहे हैं तो आपको कुछ समय के लिए फंड नहीं जुटाना चाहिए। अगर आप जरूरत से ज्यादा फंड इकट्ठा करने के चक्कर में लगे हैं तो एक वक्त के बाद आप मुश्किल में पड़ जाएंगे।

श्रद्धा: मैं उस पत्र की तारीफ करती हूं जो आपने अपनी सेल्स टीम को लिखा था। एक सीईओ के लिए ये काफी मुश्किल फैसला रहा होगा?

दीपिंदर: कई सारी चीजें सही भी होती हैं और मुश्किल भी। उस ईमेल को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया और कई लोगों ने उसे काफी नकारात्मक नजरिए से लिया। लेकिन छह फाउंडर्स ने मुझे मेल लिखकर कहा कि उन्होंने अपनी जिंदगी में सेल्स टीम के लिए ऐसा मेल पहले कभी नहीं देखा। एक ने तो यह भी कहा कि उसने उस मेल का प्रिंटआउट लेकर अपनी डेस्क पर लगा दिया है। पूरे संगठन के लिए ईमेल संचार का सबसे सुलभ माध्यम है। मैं बोलने से अच्छा लिख सकता हैं। हालांकि मेल के बारे में एक बुरी चीज है कि वे बड़ी आसानी से लीक हो जाते हैं।

श्रद्धा: पिछले जो सालों में लाभप्रदता के काफी मायने हो गए होंगे। आपने जोमैटो को कैसे फायदे के करीब पहुंचाया? आपने क्या सही किया?

दीपिंदर: मुझे लगता है कि सबसे बड़ा बदलाव तो ये था कि हमने ऐडवर्टाइजिंग और बाकी कई चीजों पर आंख मूंदकर पैसा बहाना बंद कर दिया। कई सारी चीजों की लागत घटाई गई। इसके अलावा हमारा रेवन्यू लगातार बढ़ता रहा। हमारा अभी का प्रति माह रेवेन्यू दो साल पहले की तुलना में चार गुना ज्यादा है। अगर आपके बैंक में काफी सारा पैसा है तो आपकी समस्याओं का जवाब पैसे के इर्द-गिर्द ही घूमेगा। आप सबसे आसान जवाब खोजने की तैयारी करेंगे। समस्याओं से निपटने का एक और रास्ता ये हो सकता है कि आप पैसों को समाधान से थोड़ा अलग कर दें। आपको सवालों के जवाब मिलने लगेंगे। कैश फ्लो की वजह से पिछले नौ महीनों से हमारा बैंक बैलेंस नियत है। हमने रेवन्यू के साथ-साथ अडवांस कलेक्शन पर भी जोर दिया।

श्रद्धा: क्या आप काफी ज्यादा पैसा खर्च कर रहे थे जिसकी वजह से आपको इसमें कटौती करनी पड़ी?

दीपिंदर: ये दो साल पहले की बात है, हम कई सारे देशों में जोमैटो को लॉन्च कर रहे थे। हर दो महीनों में किसी न किसी देश में हमारी लॉन्चिंग हो रही थी इस वजह से हमें उन देशों में अपना बिजनेस स्थापित करने में काफी पैसा लगाना पड़ा। लेकिन जब एक बार सब स्थापित हो गया तो फिर खर्च में कमी आ गई। हमें कुछ देशों में कर्मचारियों की छंटनी भी करनी पड़ी। जब हम छंटनी कर रहे थए तो किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन जैसे ही टिनीआउल बंद हुआ लोगों ने हमें भी उसी में खींच लिया। उस वक्त तक भारतीय मीडिया ने इस बात की परवाह ही नहीं कि हमें लोगों की छंटनी करनी पड़ रही है।

श्रद्धा शर्मा: आपको लगता है कि टिनीआउल जैसे स्टार्टअप में होने वाली अंतरकलह से आपके बिजनेस की धारणा पर कुछ असर पड़ा?

दीपिंदर गोयल: मुझे नहीं पता। मेरे पास कोई आईडिया नहीं है। जब ऐसी बातें चलने लगती हैं तो हम इन सबको छोड़कर अपने काम पर फोकस्ड हो जाते हैं। साथ ही मुझे पता है कि मैं एक खास ओर झुकाव रखने वाला हूं, लेकिन फिर भी जोमैटो के बारे में लोगों में कई सारी गलत धारणाएं व्याप्त हैं। हमें अक्सर अमेरिकी स्टार्ट अप येल्प के साथ जोड़कर देखा जाता है और हमारी तुलना भी क जाती है, लेकिन जहां तक मेरा मानना है हम दो अलग-अलग तरह के बिजनेस हैं, जिसका परिचालन भी अलग-अलग तरीके से होता है। लेकिन हम यहां कोई लोकप्रियता का खिताब हासिल करने के लिए तो बैठे नहीं हैं। आंकड़े खुद ही हमारी कहानी बयां कर देंगे।

श्रद्धा: आपने बड़ा सपना किया, आपने बड़ा सोचा। अगर आपको 2015 के दूसरे हाफ में कुछ और फंडिंग मिलती तो क्या आप दुनिया के बाकी देशों में भी अपने बिजनेस का विस्तार जारी रखते?

दीपिंदर: वैश्विक विस्तार असफल नहीं हुआ, बल्कि कुछ कारणों से धीमा पड़ गया। अभी हमारे पास 13 देश ऐसे हां जहां हम काफी अच्छा काम कर रहे हैं और मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि हम पूरी दुनिया में सबसे बड़े रेस्टोरेंट सर्च प्लेटफॉर्म हैं। हम जिन देशों में हैं वहां हमें खुद को बेहतर तरीके से मोनेटाइज करना है, लेकिन हमने सोचा था कि हम काफी आसानी से ग्लोबल मार्केट लीडर बन जाएंगे यही हमारी गलती थी और हमें इस पर फिर से काम करना है। उस वक्त हमारी वित्तीय प्रक्रिया काफी कमजोर थी, जो काम एक डॉलर में होना चाहिए था वह चार डॉलर में हो रहा था। अब हमने इन सब पर ध्यान दिया और ये बचत शुरू भी हो गया है।

श्रद्धा शर्मा: उसके बाद आपने इंडिया में अपने बिजनेस में सुधार किया

दीपिंदर: और यूएई में भी। दोनों देश मेरे लिए घर जैसे हैं। इन दोनों मार्केट्स में प्रतिस्पर्धा भी काफी बढ़ गई है।

श्रद्धा शर्मा: स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म की वजह से?

दीपिंदर: नहीं सिर्फ उनकी वजह से नहीं। क्योंकि वह केवल फूड ऑर्डरिंग प्लेटफॉर्म है। मार्केट में और भी कई प्लेयर्स हैं जैसे टेबल रिजर्वेशन सिस्टम। कॉम्पिटिशन तेज होने के बाद से हमने अपने होम मार्केट में दोगुनी मेहनत की है, क्योंकि आप कितने भी देशों में बिजनेस कर रहे हों, आप अपने घरेलू मार्केट पर पकड़ नहीं छोड़ सकते हैं।

श्रद्धा: घरेलू मार्केट पर कभी आपकी पकड़ कमजोर हुई है?

दीपिंदर: मुझे लगता है कि पिछले तीन-चार सालों तक हमारे पास एकाधिकार था। उस वक्त हम नए सर्विस और प्रॉडक्ट लॉन्चिंग पर कम ही ध्यान दे रहे थे। हम दरअसल इंतजार कर रहे थे कि मार्केट ग्रो करे तो हम आगे बढ़ें। इसीलिए हम और कई सारे देशों में अपना बिजनेस का विस्तार कर रहे थे।

श्रद्धा: क्या आप मानते हैं कि ईमानदारी और सीधे बात करने का तरीका ही आपकी सफलता का मंत्र रहा?

दीपिंदर: मुझे लगता है हर चीज के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। मेरा मानना है कि ईमानदार रवैया अपनाने से हमें काफी मदद मिली। खासकर हायरिंग के प्रोसेस में। हम जो कहते हैं कई लोग उसे पसंद नहीं करते हैं इसलिए उन्हें लगता है कि हमारे साथ काम करना सही नहीं है। इससे हमारा काफी समय बच जाता है। जो लोग हमारी बातों को पसंद करते हैं वो हमारे साथ काम करने को उत्सुक करते हैं और हमें लिखते भी हैं कि वे हमारी टीम का हिस्सा बनना चाहते हैं। इससे हमारा काम काफी आसान हो जाता है।

श्रद्धा: इन्वेस्टरों ने इस सफर में किस तरह का सहयोग किया, खासतौर पर पिछले दो सालों में?

दीपिंदर: मुझे लगता है कि उनका रवैया काफी सहायक सिद्ध हुआ है। मुझे उन्हें लेकर कोई शिकायत नहीं रही। न लोगों से और नही उस माहौल से। सामान्य तौर पर मैं यही कहूंगा कि वे काफी मददगार, प्रोऐक्टिव और भरोसेमंद साबित हुए हैं। हमारे इन्वेस्टर नए नजरिए लाते हैं जो हमारी सोच से अलग होते हैं। इसलिए हम उनके साथ अडवाइजर जैसे पेश आते हैं न कि बॉस की तरह। मैं ऐसे कई फाउंडर्स को जानता हूं जो अपने इन्वेस्टरों से एक बॉस की तरह पेश आते हैं न कि सहयोगी की तरह। इससे क्या होता है कि रिश्तों और संबंधों में कमजोरी आती है और रिलेशन सही नहीं बन पाते।

उदाहरण के तौर पर मोहित भटनागर भारत में इन्वेस्टर कम्युनिटी के सबसे सभ्य और खुशमिजाज इंसान माने जाते हैं। हम रोजाना न जाने कितने मुद्दों पर वॉट्सऐप मैसेज साझा करते हैं। वे काफी सहज और वास्तविक इंसान हैं, उन्हें जो भी बात कहनी होती है सीधे बोल देते हैं। कुल मिलाकर मैं अच्छे और बुरे दोनों समय में काफी लकी रहा हूं। बुरे समय में मैं इरीना वित्तल के पास गया जिन्होंने मेरी दुविधा हल की और जब भी जरूरत पड़ी संजीव बिकचंदानी मेरे साथ रहे।

श्रद्धा: क्या बोर्डरूम में बीटिंग जैसी कुछ बात होती है?

दीपिंदर: वहां ऐसी कोई बात नहीं होती है। सबकुछ हकीकत है, ठीक है? इसलिए अगर कोई बताता है कि हकीकत क्या है तो इस केस में सबको इन्फॉर्म कर दिया जाता है। बोर्ड में सब मौजूद रहते हैं। वहां जो कोई गलती कर रहा होता है उसे दिखा दिया जाता है। आप चाहे उससे सहमत हों या नहीं।

श्रद्धा: तो ये एक प्रतिवर्तित कहानी है जिसे अभी आप लिख रहे हैं। लेकिन क्या लाभप्रदता संभव हो पाएगी?

दीपिंदर: कोई जरूरी नहीं है कि ऐसा हो। यह हमारा चुनाव है। लगभग 20 प्रतिशत लागत नए एरिया और प्रयोग में खर्च हो रही है। हम इन्वेस्टमेंट मोड में काम कर रहे हैं। कई देशों में हमने अपना कारोबार बंद कर दिया है और उनमें से कुछ ऑफिसों में हमने लीज पर ऑफिस ले रखे थे। वहां पर हमें अभी भी किराया देना पड़ता है इसलिए अगले साल से वो सब क्लियर हो जाएगा। तो तकनीकी तौर पर बिजनेस पहले से ही ठीक ठाक प्रॉफिट मार्जिन बना रहा है।

श्रद्धा: मैं यहां निष्पक्ष तौर पर बात कर रही हूं, लेकिन मैंने देखा है कि बेंगलुरु में स्विगि जैसे प्लेटफॉर्म ज्यादा एक्सेसबल हैं। हो सकता है कि यह सिर्फ मेरे इलाके में हो। लेकिन क्या आपको लगता है कि स्विगी मार्केट में कॉम्पिटिशन दे रहा है? आप उनसे अलग क्या कर रहे हैं? क्या आप बेंगलुरु जैसे शहर पर ज्यादा फोकस इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि दिल्ली-एनसीआर पहले से ही एक बड़ा मार्केट है।

दीपिंदर: फूड डिलिवरी में अगर आपके पास अच्छी सर्विस हैं तो आप मार्केट में आगे बढ़ सकते हैं और हमने सिर्फ इसीलिए बेंगलुरु और हैदराबाद का मार्केट खो दिया है। बाकी सभी चीजों में हम बेहतर हैं और आगे भी बढ़ रहे हैं। एक और बात कि हम यहां पिछले 9 सालों से हैं और पूरे देश में 7,500 रेस्त्रां सिर्फ ऐसे हैं जो एक्सक्लूसिवली जोमैटो से जुड़े हुए हैं। 25,000 में से वे 7,500 रेस्त्रां वे हैं जो जोमैटो ऑर्डर पर भी मौजूद हैं। मर्चेंट के साथ भरोसा बनाना काफी मुश्किल और लंबा प्रोसेस हैं और हमने वक्त के साथ-साथ काफी भरोसा हासिल किया है। हम मर्चेंट को वेंडर नहीं बल्कि पार्टनर के तौर पर ट्रीट करते हैं। हमारे पास बेंगलुरु और हैदराबाद में ऐसे एक्सक्लूसिव रेस्त्रां बहुत कम हैं। लेकिन मुंबई और दिल्ली में अधिकतर रेस्त्रां खासतौर पर हमारे साथ हैं।

खैर, मैं जोमैटो ऑर्डर को और ज्यादा विकसित करने के बारे में काफी उत्साहित है। बस इंतजार करो और देखो। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि भारत और यूएई हमारे घर हैं और हम घर को सुरक्षित करने और जीतने के लिए सबकुछ कर देंगे।

श्रद्धा: क्या आप मानते हैं कि धारणा या नजरिया एक बड़ा रोल निभाता है?

दीपिंदर: धारणा कई बात पर निर्भर करती है जैसे आप डिलिवरी बिजनेस में हैं और डिलिवरी बॉय आपके ब्रांड की टी शर्ट में रोड पर गुजर रहा है उससे लोगों पर असर पड़ता है। दिल्ली का उदाहरण ले लीजिए यहां जिनके पास डिलिवरी बॉय के लिए रंगीन टीशर्ट हैं उनका साइज हमारे साइज से 10 गुना कम हो सकता है। लेकिन आप सोचेंगे कि हमने यहां कुछ खास नहीं किया है क्योंकि यहां फूड डिलिवरी करने के लिए कोई रेड-टीशर्ट नहीं हैं। मैं सिर्फ बता रहा हूं कि हम बेंगलुरु में कॉम्पिटिशन के काफी नजदीक हैं। हम इस समस्या को जल्द ही सॉल्व करने वाले हैं।

श्रद्धा: आप इसे कैसे करेंगे?

दीपिंदर: अगर मैंने आपको बता दिया तो फिर मुझे आपको जान से मारना पड़ेगा। (हंसते हुए)

श्रद्धा: क्या जोमैटो आज भी मार्केट में बेस्ट प्रॉडक्ट रखने का श्रेय ले सकता है?

दीपिंदर: प्रॉडक्ट के कुछ स्वरूपों में मैं जरूर स्वीकार करूंगा कि पिछले कुछ सालों में गुणवत्ता में गिरावट आई है, लेकिन मैं अपने समय का 95 प्रतिशत प्रॉडक्ट पर ही खर्च करता हूं। मैं हमेशा यह देखने के लिए काफी उत्साहित रहता हूं कि पिछले सप्ताह या महीने में जो फैसले लिए गए हैं उनका क्या प्रभाव पड़ रहा है।

श्रद्धा: आपका अगला आश्चर्यजनक ग्राउंड ब्रेकिंग प्रोजेक्ट कौन सा होगा?

दीपींदर: मैं आपको इसका सीधा सा जवाब देता हूं। अभी तक हम अफने कोर बिजनेस पर पूरा फोकस लगाए हुए थे। हमने प्रॉडक्ट को हर तरीके से इनोवेट किया और हमें उसमें सफलता भी मिली। उसके अलावा हम टेक्नॉलजी में इन्वेस्ट करने वाले हैं (जो पता नहीं काम करे भी या नहीं)। हमारे पास ऐसे कुछ मूनशॉट्स प्रॉजेक्ट हैं, लेकिन अभी उसके लिए सही समय नहीं है।

श्रद्धा: आप किस तरह की इन्फ्रास्ट्रक्टर सर्विस को बढ़ाने के बारे में सोच रहे हैं?

दीपिंदर: अभी हम क्लाउड किचन के बारे में सोच रहे हैं। हम अपना खुद का रेस्टोरेंट नहीं खोलेंगे, लेकिन उनके साथ पार्टनरशिप करके और उन्हें स्पेस से लेकर इन्फ्रा तक ऑफर करेंगे। हमारा एक औऱ सिद्धांत है कि न तो हम कभी अपना खुद का रेस्टोरेंट खोलोंगे और न ही खाना बानएंगे, क्योंकि हम फिर अपने कस्टमर्स यानी की रेस्टोरेंट मालिकों से प्रतिस्पर्धा करने लग जाएंगे।

श्रद्धा: लेकिन अभी जब स्विगी का विसलब्लोइंग एपिसोड हुआ था तो आप कॉम्पिटिशन के समर्थन में आ गए थे।

दीपिंदर: हां मैंने किया था, लेकिन विसलब्लोअर ने जो कहा था मैंने उस पर कमेंट नहीं किया था। मैंने कहा था कि ऐसा ऑर्गनाइजेशन के साइज की वजह से हुआ। अगर आप बहुत तेजी से आगे बढ़ेंगे तो आपके पास कई सारे कर्मचारी हो जाएंगे और उनमें से कई ऐसे भी होंगे जो असंतुष्ट होंगे। उस स्थिति में आप सही कर्मचारियों को नौकरी पर भी नहीं रख सकते हैं। लेकिन अगर आप ईमानदारी अपना रहे हैं तो आप कभी मुश्किल में नहीं फंसेंगे।

श्रद्धा: पचीस हजार रेस्त्रां आपके ऑर्डरिंग प्लेटफॉर्म पर हैं जो कि एक बड़ा माइलस्टोन है, अब आगे आपने क्या सोचा है?

दीपिंदर: 25,000 रेस्त्रां हमारे फूड ऑर्डरिंग नेटवर्क में हैं जिसमें से 7,500 ऐसे हैं जो सिर्फ हमारे प्लेटफॉर्म पर ही हैं।। टॉप-10 शहरों में लगभग 75000 रेस्त्रां होंगे, लेकिन अकेले शंघाई में 2,50000 रेस्त्रां हैं। भारत में बाकी दुनिया के मुकाबले प्रति व्यक्ति आय काफी कम है। यहां रेस्त्रां इंडस्ट्री अभी अपने शुरुआती दौर में है। हम अभी दाम कम करने और क्वॉलिटी बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। हम फल, सब्जी और मीट सप्लाई करने के बारे में सोच रहे हैं। हम ग्राहकों को बस ये विश्वास दिलाना चाह रहे हैं कि रेस्त्रां के खाने उतने ही सेफ हैं जितने कि घर में बना खाना।

श्रद्धा: तो क्या ये नंबर 75,000 से 2,50,000 पहुंच सकता है?

दीपिंदर: हां, अगर ज्यादा नहीं तो समय के साथ भारत के टॉप-10 शहरों में लाखों रेस्त्रां होंगे। क्योंकि हमारे यहां शहरों का आकार काफी बड़ा है। मुझे लगता है कि भारतीय बाजार ने पिछले चार-पांच सालों में काफी तरक्की की है। लेकिन ये तो अभी सिर्फ ट्रेलर है। अभी हमारे सेक्टर में वास्तविक प्रगति होनी बाकी है और हम इस बदलाव को देखने की प्रतीक्षा में हैं। मैं इन सब को देखते हुए काफी खुश हूं।

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