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गरीबी के खिलाफ जंग में शिक्षा को हथियार बनाकर जीत हासिल करने वाले सामाजिक उद्यमी हैं अच्युत सामंत

आदिवासियों में शिक्षा की अलख जगाकर भुखमरी और गरीबी को हमेशा के लिए मिटाने की साहसी कोशिश का नाम है अच्युत सामंत ... दुनिया को ‘देने की कला’ भी सिखा रहे हैं नयी शैक्षिक और सामाजिक क्रांति के जनक ... भूखे पेट की आग ने अच्युत के मन में पैदा किया था ज़रूरतमंदों की मदद करने का जुनून ... बचपन में गरीबी का आलम ये था कि कई दिनों तक मुट्ठी-भर अनाज भी नहीं मिलता था ... माँ के पास पहनने को सिर्फ एक साड़ी थी ... फिर भी, माँ ने दिन-रात मेहनत कर अपने सातों बच्चों को पाला-पोसा ... माँ का कष्ट कम करने के मकसद से अच्युत ने सात साल की उम्र से ही रुपये कमाना शुरू कर दिया था और कमाई के साथ ही शुरू की थी ‘समाज-सेवा’ भी ... पढ़ने के लिए नंगे पाँव चलकर आठ किलोमीटर दूर स्कूल जाते थे अच्युत ... डिग्री कॉलेज में पढ़ते समय ही जूनियर्स को ट्यूशन पढ़ना शुरू कर दिया था ... पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद लेक्चरर की नौकरी पर लगे ... फिर एक क्रांतिकारी विचार ने उन्हें बना दिया नयी शैक्षणिक और सामाजिक क्रांति का नायक

1st Sep 2016
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ओड़िसा के अच्युतानंद सामंत देश के मशहूर शिक्षाविद, सामाजिक उद्यमी, समाज-शास्त्री और समाज-सेवी हैं। इन्होंने देश में एक नयी शैक्षिक और सामाजिक क्रांति की शुरुआत की है। इस नयी क्रांति का सूत्रपात्र कर अच्युत सामंत ने एक ऐसा महान कार्य किया जिसे दुनिया की कोई भी सरकारी और गैर-सरकारी संस्था अभी तक नहीं कर पायी है। अच्युत के बनाये और बसाये कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में पच्चीस हज़ार आदिवासी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जा रही है। बड़ी बात ये भी है कि इन पच्चीस हज़ार बच्चों के रहने, खाने-पीने और दूसरी सुविधाओं का इंतज़ाम भी कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में ही किया गया है। भारत की प्राचीन ‘गुरुकुल शिक्षा पद्धति’ से कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में आदिवासी बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी दिए जा रहे हैं। अच्युत सामंत की संस्था में पढ़ाई-लिखाई कर रहे ये सारे बच्चे ऐसे गरीब परिवारों से हैं, जिनके लिए दो जून की रोटी जुटाना भी मुश्किल है। कई बच्चे ऐसे हैं जिनके घर-परिवार के लोगों ने कभी भी पढ़ाई-लिखाई ही नहीं की, इन बच्चों के सारे पुरखे अशिक्षित ही थे। कई बच्चे ऐसे भी हैं जिनके माता-पिता माओवादी-नक्सली हैं। यानी, एक की स्थान पर हज़ारों गरीब आदिवासी बच्चों की ज़िंदगी संवारी जा रही है। एक जगह पर सबसे ज्यादा आदिवासी बच्चों को शिक्षा देने वाली दुनिया की सबसे बड़ी संस्था भी कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज ही है। इसी संस्था की वजह से अच्युत सामंत की ख्याति और लोकप्रियता दुनिया-भर में फ़ैल रही है।

आदिवासी बच्चों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा आवासीय विद्यालय और महाविद्यालय शुरू करना अच्युत सामंत के लिए कोई आसान काम नहीं था। वे ऐसे शख्स हैं जिन्होंने बचपन में गरीबी के थपेड़े बहुत खाए हैं। उन्हें कई दिनों तक भूखे भी रहना पड़ा था। जब वे चार साल के थे तभी उनके पिता का साया उन सिर पर से उठ गया था। विधवा माँ मी मदद करने के मकसद से बहुत ही छोटी उम्र में अच्युत ने कमाना शुरू कर दिया था। गरीबी उनकी बहुत ही करीबी रही है। वे भूखे पेट की आग में भी जले हैं। बचपन में ही उन्हें अहसास हो गया था कि शिक्षा से ही गरीबी दूर की जा सकती है। खुद शिक्षित होने के बाद उन्होंने गरीब बच्चों को शिक्षित करने का महाआन्दोलन शुरू किया। ये आंदोलन कामयाब भी रहा। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज दुनिया के सामने इस बात की एक अद्भुत मिसाल बनकर खड़ा है कि अगर इरादे नेक हों तो बड़े सपने भी साकार होते हैं, हार न मानने का ज़ज्बा हो तो नामुमकिन कहे जाने वाले काम को भी मुमकिन किया जा सकता है।

अच्युत के पास नो कोई गुरु था, न मार्ग-दर्शक और ना ही गॉड-फादर, लेकिन लोगों की मदद करने का जुनून ऐसा था कि उन्होंने एक के बाद एक कई शिक्षा संस्थान खड़े किये। इन्हीं शिक्षा संस्थाओं ने विश्वविद्यालय का भी रूप लिया। अपनी इन्हीं शिक्षा संस्थाओं के ज़रिये अच्युत सामंत ने कामयाबी की एक असाधारण कहानी लिखी। इसी कहानी की वजह से ओड़िसा राज्य ने शिक्षा के क्षेत्र में विश्व के नक़्शे पर अपनी ख़ास पहचान बनाई । गरीबी, भुखमरी, पिछड़ेपन के लिए जाना जाने वाला ओड़िसा राज्य अब अच्युत की शिक्षा संस्थाओं से शुरू हुई नयी शैक्षिक क्रांति की वजह से भी दुनिया-भर में जाना जाने लगा है।

नयी शैक्षिक और सामाजिक क्रांति के नायक अच्युत सामंत की कहानी में भी गरीबी की मार है, भूखे पेट की आग है, कठिनाईयों के कई सारे दौर हैं, दुःख है, पीड़ा है, संघर्ष है और इन सब के बीच हर न मानने का ज़ज्बा है, दूसरों की मदद करने के लिए कुछ भी कर गुजरने का जुनून है। अच्युत सामंत की कहानी में कई प्रेरक प्रसंग है, सफलता के मंत्र है और ‘देने की कला’ के आदर्श तौर-तरीके भी हैं। 

आदिवासी बच्चों के साथ अच्युत सामंत 

आदिवासी बच्चों के साथ अच्युत सामंत 


इस कहानी की शुरू एक बहुत ही पिछड़े और सुविधाओं के अभावों से ग्रस्त ओड़िसा के एक गाँव- कलारबंका से होती है, जहाँ अच्युत सामंत का जन्म हुआ। अच्युत सामंत का जन्म 20 जनवरी, 1965 को कटक जिले के कलारबंका गाँव में हुआ। पिता अनादिचरण सामंत जमशेदपुर में टाटा कंपनी में छोटे से मुलाजिम थे। माँ नीलिमा रानी गृहिणी थीं। अनादिचरण और नीलिमा रानी की कुल सात संतानें थीं। अच्युत का नंबर छठा था। अच्युत के 2 बड़े भाई और तीन बड़ी बहनें थीं। उनकी एक छोटी बहन भी है जिनका नाम इति है।

अच्युत जब चार साल के थे तब उनके पिता की एक रेल-हादसे में मृत्यु हो गयी। अनादिचरण जब जमशेदपुर से अपने गाँव आ रहे थे तब ये रेल-हादसा हुआ था। ये हादसा क्या हुआ, परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। हादसे ने सारे परिवार की खुशियाँ एक झटके में छीन लीं। अनादिचरण की मृत्यु से सात बच्चे अनाथ हो गए और उनके भरण-पोषण की सारी ज़िम्मेदारी माँ पर आ गयी। अनादिचरण की तनख्वाह से ही घर-परिवार चलता था, उनके गुज़र जाने के बाद रोज़ी-रोटी का जरिया भी बंद हो गया।

पति की मौत के बाद नीलिमा रानी को अपने सातों बच्चों के साथ जमशेदपुर से वापस अपने गाँव कलारबंका लौटना पड़ा। नीलिमा रानी अपनी सबसे छोटी बेटी, जोकि उस समय सिर्फ एक महीने की थीं, और बाकी 6 बच्चों के साथ गाँव लौट आयीं। अनादिचरण अपने पीछे कोई धन-दौलत और संपत्ति छोड़कर नहीं गए थे। इसी वजह से बच्चों का पालन-पोषण करने में नीलिमा रानी को कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। जिन लोगों ने अच्युत को बचपन से जाना है वे बताते हैं कि उनके पिता अनादिचरण बहुत ही दयालु आदमी थे। जो कोई उनसे मदद मांगता था वे कभी भी न नहीं कहते थे। गाँव के गरीब और ज़रूरतमंद लोगों की मदद करना अनादिचरण की आदत थी। गाँव में बहुत ज्यादा गरीबी थी और चूँकि अनादिचरण नौकरी करते थे उनकी आर्थिक स्थिति दूसरे गांववालों से काफी बेहतर थी। संस्कारी थे, बड़े दिल वाले थे , इसी वजह ज़रूरतमंदों की हर मुमकिन मदद करते थे। अनादिचरण जो भी कमाते थे उसी से घर-परिवार चलता था और जो बचता था वे उसे लोगों में बाँट देते थे, इसी वजह से जब उनकी मृत्यु हुई तब उनके परिवारवालों के पास कुछ नहीं था।

अपनी माँ नीलिमा रानी के साथ अच्युत सामंत 

अपनी माँ नीलिमा रानी के साथ अच्युत सामंत 


अच्युत की माँ नीलिमा रानी संपन्न और संस्कारी परिवार से थीं। वे स्वाभिमानी महिला थीं। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने किसी से मदद नहीं माँगी और खुद मेहनत, मजदूरी करते हुए अपने बच्चों का लालन-पालन और भरण-पोषण किया। लेकिन, सात बच्चों के लिए खाने-पीने, रहने-सोने और पढ़ाने-लिखाने का बंदोबस्त करना आसान नहीं था। बच्चों की परवरिश के लिए माँ नीलिमा रानी ने दूसरों के घर जाकर झूठे बर्तन भी मांजे। अपने झोपड़ी-नुमा घर के सामने वाले बगीचे में सब्जियां उगाई और उन्हें बेचा। चूँकि उन दिनों चावल की मिलें नहीं थीं, धान के छीलन और ओसाई का काम अक्सर मजदूर ही करते थे। अच्युत की माँ ने गांववालों के यहाँ से धान लाकर उसके छीलन और ओसाई का काम कर उसे चावल बनाने का भी काम किया। बड़ी मेहनत वाले इस काम में बालक अच्युत अपनी माँ की मदद किया करते था। इतना सब कुछ करने के बावजूद कई बार ऐसा होता था कि बच्चों को भूखे पेट ही सोना पड़ता। कठोर परिश्रम के बावजूद माँ सभी बच्चों को भरपेट खाना नहीं खिला पाती थीं। कई बार तो अच्युत और उनके भाई-बहनों को दो-तीन दिन तक भूखा ही रहना पड़ता था। जब कभी कमाई होती और घर में भात और सब्जी बनती तब माँ पहले बच्चों को ही खिलाती। सात बच्चों को भोजन मिल जाने के बाद अगर कुछ बचता तो वो माँ के हिस्से में आता।

चूँकि हर दिन सभी बच्चों के लिए भोजन का इंतज़ाम करना भी मुश्किल था, माँ ने अनोखा नियम बनाया था। जब भी घर में भोजन बनता तो पहले घर के बड़े बच्चों को खाने का मौका मिलता। जो सबसे बड़ा होता वो पहले खाता और जो सबसे छोटा होता वो आखिरी में भोजन पाता। कई बार ऐसा होता था कि भोजन तीसरे या चौथे नंबर पर भी ख़त्म हो जाता और छठे नंबर वाले अच्युत को भूखा रहना पड़ता। सभी बच्चों के खा-पी लेने के बाद अगर कुछ बचता तो वो माँ खा लेतीं। इस नियम को बनाने के पीछे एक कारण था। माँ मानती थी कि जो उम्र में बड़े हैं वे खा-पीकर जल्दी बड़े हो जाएंगे और घर-परिवार चलाने में उनकी मदद करेंगे। माँ मानती थी कि छोटे बच्चों को बड़ा होने में समय लगेगा और बड़े जब कमाने लगेंगे तब वे छोटों की देखभाल कर लेंगें। इस नियम की वजह से हमेशा छोटे बच्चे अपने बड़े भाई-बहनों से ये उम्मीद लगाये बैठे रहते कि वे उनके लिए ज़रूर कुछ छोड़ेंगे। छोटों को कई बार भोजन मिलता भी और कई बार नहीं भी।

इसी नियम को तोड़ने की वजह से एक बार अच्युत पर उनकी माँ बहुत गुस्सा हो गयीं और अच्युत को लकड़ी से मारा भी। माँ की इस मार में अच्युत की एक आँख पर बुरी तरह से चोट लगी थी, वो खुशनसीब थे कि उनकी आँख की रोशनी जाने से बच गयी। हुआ यूँ था कि एक दिन अच्युत को जमकर भूख लगी थी। पेट की आग को बुझाना बहुत मुश्किल हो रहा था। अच्युत से भूख सही नहीं गयी,उनके रहा नहीं गया। अच्युत ने अपने एक बड़े भाई के लिए बनाकर रखा गया ‘चूड़ा’ खाना शुरू कर दिया। माँ को जब इस बात का पता चला तो वे आग-बबूला हो गयीं। गुस्सा में उन्होंने एक मोटी-तगड़ी लकड़ी से अच्युत पर वार किया। वार करने के बाद माँ वहां से चली गयीं और ये नहीं देखा कि उनकी मार का क्या असर हुआ है। लकड़ी की मार से अच्युत की आँख पर गहरी चोट लगी, खून निकलने लगा। छोटी बहन ने जब देखा कि अच्युत के चेहरे से खून निकल रहा है और आँख पर भी बुरी तरह से ज़ख्म हुआ है तब उसने माँ को बुलाया। माँ भी अच्युत की हालत देखकर घबरा गयीं। घाव देखकर माँ को बहुत अफ़सोस हुआ। अच्युत को तुरंत डाक्टर के पास ले जाया गया। अच्युत अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानते है कि उस दिन उनकी आँख बच गयी, उन्हें उस समय डर लगा था कि उनकी आँख की रोशनी चली जाएगी।

गरीबी ने अच्युत के परिवार को कई दिनों तक बुरी तरह से जकड़ कर रखा था। गरीबी की वजह से परिवार के सभी आठों लोगों – माँ और सात बच्चों ने कई कष्ट झेले। कई तकलीफों का सामना किया। भूखे पेट रखकर कर ही कई दिन और रात गुजारे। खूब मेहनत की, पसीना बहाया। एक-एक रूपया जुटाने के लिए दिन-रात एक किये। बावजूद इसके गरीबी नहीं गयी। अच्युत ने एक बेहद अन्तरंग बातचीत में हमसे कहा, “गरीबी इतनी ज्यादा थी कि मैं शब्दों में आपको सुना नहीं सकता। दो बातें कहूंगा आप समझ जाएंगे कि हमारी गरीबी कैसी थी – हम इतने गरीब थे कि परिवार के आठ लोगों के लिए दो दिन में एक बार के लिए भी खाना जुटाना भी मुश्किल होता था। माँ के पास सिर्फ एक ही साड़ी थी। उनके पास बदलने के लिए दूसरी साड़ी नहीं थी।” अच्युत ने ये भी कहा, “बचपन बचपन ही होता है। हर बच्चे का बचपन में एक सपना होता है। सभी बच्चे चाहते हैं कि बचपन में पढ़ाई करें, खेले-कूदें, वो सब काम करें जो बचपन में किये जाते हैं। कुछ बच्चों के भाग्य में ये सब नहीं होता। मेरे भाग्य में भी ये नहीं था।”

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गरीबी की वजह से माँ अच्युत को स्कूल भी नहीं भेज पायी थीं। अच्युत का स्कूल में दाखिला भी बड़ी दिलचस्प घटना है। बड़ी रोचक बात ये भी है उनका नाम ‘अच्युत’ भी स्कूल में ही रखा गया था। स्कूल के मास्टर ने ही उनका नामकरण किया। स्कूल जाने से पहले तक सभी उन्हें ‘सुकुटा’ नाम से बुलाते थे। पिता अपनी छठी और सातवीं संतानों का नामकरण करने से पहले की गुज़र गए थे।

अच्युत बचपन में अपने गाँव के उन गरीब बच्चों के साथ खेला करते थे जो स्कूल नहीं जाते थे। एक दिन खेल-खेल में ही ये गरीब बच्चे गाँव के सरकारी स्कूल परिसर में पहुँच गए। बच्चों को अहसास हुआ कि वे खेलते-खेलते स्कूल में आ गए हैं और शोर करने की वजह से स्कूल के मास्टर उनकी पिटाई करेंगे। पिटाई के डर से दूसरे सारे बच्चे वहां से भाग गए। लेकिन, अच्युत वहीं रह गए। स्कूल ने मास्टर ने अच्युत को पकड़ लिया और पूछा – तुम स्कूल क्यों नहीं आते?क्यों नहीं पढ़ते? बालक अच्युत ने जवाब दिया-पढ़ना क्या होता है? फिर मास्टर ने कहा – तुम कल से यहाँ स्कूल में आकर पढ़ाई करो। इस पर अच्युत ने कहा – कौन पढ़ाएगा? मास्टर ने जवाब दिया – मैं पढ़ाऊंगा और तुम्हें लिखने के लिए पटिया भी दूंगा । अच्युत को ये प्रस्ताव अच्छा लगा और उन्होंने हामी भर दी। इसके बाद स्कूल के मास्टर अच्युत को क्लास-रूम में ले गए और रजिस्टर खोला। स्कूल के रजिस्टर में नाम दर्ज करवाने के लिए मास्टर ने अच्युत से उनका नाम पूछा। अच्युत ने बताया कि उनका कोई नाम नहीं है और सारे उन्हें 'सुकुटा'कहकर बुलाते हैं, ये बात सुनकर मास्टर हैरान रह गए। मास्टर ने अच्युत से उनके घर-परिवार वालों के बारे में पूछा। सभी के नाम जाने। इसके बाद मास्टर ने खुद ही बालक का नामकरण किया और नाम दिया ‘अच्युतानंद’। चूँकि बालक के परिवार का कुलनाम सामंत था, बालक का नाम पड़ गया अच्युतानंद सामंत। अच्युत ने बताया, “मैंने मास्टर को बताया था कि मेरे सबसे बड़े भाई का नाम अंतर्यामी है और दूसरे भाई का काम अनिरुद्ध है। मास्टर ने कहा था कि दोनों भाइयों के नाम भगवान के नाम हैं, इस लिए मैं तुम्हारा नाम भी भगवान के नाम पर ही रखूंगा और उन्होंने मेरा नाम अच्युतानंद रख दिया था।” घर लौटकर अच्युत ने माँ को जब स्कूल वाली घटना बतायी तो वे बहुत खुश हुईं। उनकी आँख से खुशी के आंसू छलक पड़े। खुशी स्वाभाविक थी – एक तो बच्चे का स्कूल में दाखिला हो गया था, वो भी बिना किसी खर्च के और दूसरा , मास्टर ने खुद बच्चे को नाम दे दिया था।

दाखिले के बाद अच्युत हर दिन स्कूल जाने लगे। लेकिन, वे अपनी माँ के दुःख-दर्द को अच्छी तरह से समझते थे, इसी वजह से उन्होंने छोटी-सी उम्र में ही अपनी माँ का हाथ बटाना शुरू कर दिया। अच्युत धान को चावल बनाने से जुड़े काम में माँ की मदद करते थे। वे अपने बगीचे में उगी सब्जी को बाज़ार में बेचने भी लगे। बचपन में ही अच्युत ने नारियल और केले बेचकर भी रुपये कमाने शुरू कर दिए थे। माँ हमेशा अपने बच्चों से कहती थीं कि किसी पर निर्भर मत रहो, अपना काम खुद करो, खुद कमाओ और खाओ। इन्हीं बातों से प्रभावित होकर अच्युत ने छोटी उम्र से ही अलग-अलग काम कर रुपये कमाना शुरू कर दिया था।

बड़ी बात ये थी कि अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अच्युत अपनी माँ को देते थे। कमाई से ही कुछ बचाकर वे अपनी छोटी बहन इति को भी रुपये देते थे। माँ और बहन को देने के बाद भी वे कुछ रुपये बचा लेते थे, जिससे वे अपने दोस्तों को चाय पिलाते थे और नास्ता भी करवाते थे। जैसे-जैसे कमाई बढ़ी अच्युत ने गरीब और ज़रूरतमंद लोगों की मदद करना भी शुरू कर दिया। वे आसपड़ोस की महिलाओं के लिए बाज़ार से खाने-पीने का सामान और भी दूसरी चीज़ें लाकर देते थे। अच्युत साइकिल पर बाज़ार जाते और इन महिलाओं ने लिए उनके ज़रूरी सामान लाकर देते। इस काम के बदले में महिलाएं उन्हें प्यार करतीं और आशीर्वाद देतीं। लोगों की मदद करने का गुण उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला था। अपने पिता की ही तरह अच्युत भी ज़रूरतमंदों की मदद करने में दूसरों से आगे रहते थे। अच्युत ने कहा, “बचपन में मैं सभी की मदद करता था। सभी मुझे ‘अच्छा बच्चा’ कहते थे। उसी समय मैंने फैसला कर लिया था कि मैं ज़िंदगी-भर इसी तरह लोगों की मदद करूंगा और ‘अच्छा इंसान’ कहलाऊंगा।”

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समाज-सेवा का काम अच्युत ने सात साल की छोटी उम्र में ही शुरू कर दिया था। छोटे-बड़े काम करते हुए उनकी कमाई होती रही साथ ही पढ़ाई-लिखाई भी चलती रही। झोपड़ी जैसे मकान में अच्युत लालटेन की रोशनी में पढ़ाई-लिखाई करते थे, घर में बिजली नहीं थी।

अच्युत बहुत जल्द समझ गए थे कि शिक्षा के ज़रिये ही उनके घर-परिवार की गरीबी दूर होगी। इसी वजह से उन्होंने खूब मन लगाकर पढ़ाई की। गाँव के सरकारी स्कूल से प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद अच्युत ने रघुनाथपुर के सरकारी हाई स्कूल में दाखिला लिया। स्कूल गाँव से आठ किलोमीटर दूर था और अच्युत हर दिन पैदल चलकर ही स्कूल जाते और पैदल ही घर लौटते थे। दसवीं पास करने के बाद अच्युत का दाखिला जगतसिंहपुर के इंटर कॉलेज में हुआ। उन्होंने मैथ्स, फिजिक्स और केमिस्ट्री को अपना मुख्य विषय चुना। ग्यारहवीं और बारहवीं पास करने के बाद अच्युत ने पुरी के एस.सी.एस. कॉलेज में बीएससी की पढ़ाई की। बीएससी की डिग्री लेने के बाद अच्युत ने उत्कल विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी की डिग्री हासिल की। अलग-अलग कालेजों की पढ़ाई के दौरान भी अच्युत कुछ न कुछ काम करते हुई अपने घर-परिवार की मदद करते रहे। उन्होंने न सिर्फ अपने घर-परिवार की ज़रूरतों को पूरा किया बल्कि ज़रूरतमंद और गरीब लोगों खासकर विद्यार्थियों की भी हर मुमकिन मदद की।

एमएससी की डिग्री हासिल करते ही अच्युत को एक स्थानीय फार्मेसी कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी मिल गयी। दिन के समय कोलेज में विद्यार्थियों को पढ़ाने के बाद अच्युत शाम को दूसरे बच्चों को ट्यूइशन भी पढ़ाने लगे। कुछ दिनों के लिए अच्युत ने बतौर लैब असिस्टेंट भी काम किया था। लेक्चरर की नौकरी मिलने से अच्युत को बहुत फायदा हुआ। उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। अच्युत बताते हैं, “परिवारवाले मेरे पढ़ाई पूरे होने और फिर नौकरी मिलने का इंतज़ार कर रहे थे। जैसे ही मुझे नौकरी मिली मेरे दोनों बड़े भाइयों की शादी हुई। पांच महीने के अंतराल में दोनों की शादी हुई थी। करीब डेढ़ साल बाद एक और बहन की शादी हो गयी। सभी बड़े भाई-बहनों की शादी होने के बाद सभी अपने-अपने घर चले गए। माँ, छोटी बहन और मैं एक साथ रहने लगे।” बड़े भाइयों और बड़ी बहनों के घर-परिवार को बसाने में अच्युत की बड़ी भूमिका थी।

फार्मेसी कॉलेज में पढ़ाते समय अच्युत के मन में एक क्रांतिकारी विचार का जन्म हुआ। उन्होंने सबसे गरीब और ज़रूरतमंद बच्चों को शिक्षा देने की ठान ली। अच्युत को लगा कि ओड़िसा के आदिवासी बच्चे सबसे पिछड़े हैं और उनका मार्ग-दर्शन करने वाला कोई नहीं है। अच्युत ने 125 आदिवासी गरीब बच्चों का चयन किया और अपने खर्च से उन्हें पढ़वाना-लिखवाना शुरू किया। यही वो समय था जब अच्युत ने पक्का इरादा कर लिया था कि वे जो कुछ कमायेंगे वो सारा गरीब और ज़रूरतमंद बच्चों को शिक्षित कर उन्हें आत्म-निर्भर बनाने में लगा देंगे। अच्युत अपने इसी इरादे पर हमेशा कायम भी रहे।

अच्युत के जीवन में उस समय बड़ा मोड़ आया जब उन्होंने अपने से खुदका एक आईटीआई यानी इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट खोलने का फैसला लिया। 1992-93 में अच्युत ने इसकी शुरुआत की। बड़ी बात ये है कि अच्युत के पास सिर्फ 5000 रुपये थे और संस्था चलाने के लिए उनके पास कोई अपना मकान या भवन नहीं था, फिर भी उनका इरादा इतना बुलंद था कि उन्होंने दो शिक्षा संस्थान खोले। ये दोनों शिक्षा संस्थान सिर्फ 5000 रुपये की लागत से किराये के मकान में खोले गए थे। 12 विद्यार्थियों और 2 साथी कर्मचारियों से अच्युत ने इन दो शिक्षा संस्थाओं की शुरुआत की।

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ये शुरुआत कोई मामूली शुरुआत नहीं थी। ये एक ऐतिहासिक शुरुआत थी। अच्युत ने दिन-रात मेहनत की और अपने शिक्षा संस्थाओं का विस्तार किया। ये विस्तार भी कोई मामूली विस्तार नहीं था। अच्युत के शिक्षा संस्थाओं के विस्तार की कहानी भी ऐतिहासिक है। ये कहानी अच्युत की कामयाबी की गाथा का एक बहुत बड़ा हिस्सा है।

महत्वपूर्ण बात है कि अच्युत ने युवा-अवस्था में ही इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की सोच ली थी, वो भी जब उनके पास न कोई ज़मीन थी न जायजात, कुछ भी नहीं था। उनका न कोई सलाहकार था न कोई मार्ग-दर्शक या गुरु। अच्युत ने अपनी मेहनत की कमाई से अपने शिक्षा संस्थान शुरू किये थे। शुरुआती दिनों में कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी और कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज को चलाने में अच्युत को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। इन संस्थाओं को विस्तार देने के लिए अच्युत ने कर्ज लिया था और ये कर्ज साल 1995 में बढ़कर करीब 15 लाख रुपये हो गया। उस समय ये बहुत बड़ी रकम थी। कर्ज के बोझ तले अच्युत दबते जा रहे थे। वे इतना परेशान हो गए कि उन्होंने खुदखुशी करने की भी सोची। लेकिन, इसी बीच उनकी कोशिशों का नतीजा निकला और एक बैंक ने 25 लाख रुपये का कर्ज दे दिया। इस रकम से अच्युत की न सिर्फ परेशानियां दूर हुईं बल्कि उन्होंने तरक्की की राह पकड़ी और उस पर बहुत ही तेज़ी से आगे बढ़े।

1997 में अच्युत को इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू करने की अनुमति मिल गयी, जिससे कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी एक इंजीनियरिंग कॉलेज में तब्दील हो गया। अच्युत ने ओड़िसा जैसे पिछड़े राज्य की राजधानी भुवनेश्वर में कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी के नाम से विश्वस्तरीय सुविधाओं वाला इंजीनियरिंग कॉलेज बनाया। 2004 में कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी, जोकि ‘कीट’ केआईआईटी के नाम से मशहूर है, को विश्वविद्यालय का दर्जा भी मिल गया। ‘कीट’ विश्वविद्यालय का दायरा 25 वर्ग किलोमीटर है और इसमें 22 कैंपस हैं। विश्वविद्यालय के सभी भवन सुन्दर, आकर्षक और पर्यावरणअनुकूल हैं। इस विश्वविद्यालय में 100 से अधिक अलग-अलग स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रमों वाली कक्षाओं और कालेजों में 25 हज़ार बच्चे पढ़ रहे हैं। इसी विश्वविद्यालय का कुलाधिपति बनकर अच्युत ने दुनिया में किसी भी विश्वविद्यालय का सबसे युवा कुलाधिपति होने का रिकार्ड भी अपने नाम किया है। 38 साल की उम्र में ही अच्युत ‘चांसलर’ बन गए थे।

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अच्युत ने ज़रूरतमंदों की मदद करने के मकसद ने एक सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल भी शुरू किया। वे अपने विश्वविद्यालय परिसर में मेडिकल कॉलेज, डेंटल कॉलेज और नर्सिंग कॉलेज भी चला रहे हैं। अच्युत ने गरीबों को चिकित्सा-सुविधा मुहैय्या कराने के मसकद से कई गाँवों में दवाखाने भी खोले हैं। कला, संस्कृति और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अच्युत ने काफी काम किया है और खूब नाम कमाया है। अच्युत की संस्था कलिंगा मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ओडिया भाषा में एक न्यूज़ चैनल भी चला रही है। वे ‘कादम्बिनी’ नाम से एक पारिवारिक पत्रिका भी ओडिया भाषा में निकाल रहे हैं। बच्चों के लिए उन्होंने ‘कुनिकथा’ के नाम से पत्रिका भी निकालनी शुरू की है।हिन्दू धर्म और आध्यात्म में विश्वास रखने वाले अच्युत ने किट टेम्पल ट्रस्ट की स्थापना की और कई सारे आध्यात्मिक केंद्र भी बनाये।

लेकिन, दुनिया भर में अच्युत की ख्याति उनकी समाज-सेवी संस्था कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज यानी ‘किस’ की वजह से फ़ैली। इस संस्था के काम-काज और उससे निकले नतीजे की वजह से अच्युत को न सिर्फ भारत में, बल्कि दुनिया के कई देशों में खूब मान-सम्मान मिला है और लगातार मिल भी रहा है। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज वो काम कर रही है जो दुनिया में कोई भी संस्था या सरकार नहीं कर रही है। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज की वजह से 25,000 आदिवासी विद्यार्थियों की जिंदगी सज-संवर रही है। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में ज़रूरतमंद और गरीब आदिवासी/वनवासी बच्चों को पहली कक्षा से स्नातकोत्तर तक की निःशुल्क शिक्षा दी जा रही है। इन पच्चीस हज़ार बच्चों के रहने, खाने-पीने और दूसरी सुविधाओं का इंतज़ाम भी कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में ही किया गया है। भारत की प्राचीन ‘गुरुकुल शिक्षा पद्धति’ से कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में आदिवासी बच्चों को शिक्षा और संस्कार दिए जा रहे हैं।

कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज एक जगह पर सबसे ज्यादा आदिवासी बच्चों को शिक्षा देने वाला दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है। बड़ी बात ये भी है कि इस संस्थान में आदिवासी बच्चों को सिर्फ स्कूल और कालेज के पाठ्यक्रमों की शिक्षा ही नहीं दी जाती बल्कि उनके सर्वांगिण और बहुमुखी विकास की भरसक कोशिश की जाती है। बच्चों को अलग-अलग खेल सीखने के मौके भी दिए जाते हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का अवसर भी दिया जाता है। पढ़ाई पूरी होने के बाद अलग-अलग जगह अच्छी और तगड़ी नौकरी दिलवाने का काम भी होता है। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज के विद्यार्थियों के लिए पांच फीसदी सीटें आरक्षित हैं। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में दाखिला लेने वाले कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज के विद्यार्थी दूसरे बच्चों की तरह की पढ़ाई में काफी तेज़ होते हैं और सारी प्रतियोगिता-परीक्षा में शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। इन आदिवासी विद्यार्थियों को बड़ी-बड़ी नामचीन कंपनियों में बड़े ओहदों पर तगड़ी रकम वाली नौकरियाँ भी मिल रही हैं।

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इन सब बड़ी-बड़ी बातों के बीच ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि आदिवासी बच्चों और उनके माता-पिता से एक रूपया भी लिए बिना उनको उन्नत-स्तरीय शिक्षा सुविधाएं देना किस तरह से संभव है। इस सवाल का जवाब अच्युत सामंत के तेज़ दिमाग में बहुत पहले ही आ गया था। यही वजह थी कि उन्होंने दो शिक्षा संस्थाएं खोली थीं। एक संस्था से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल दूसरे संस्था की समाज-सेवा से जुड़े कार्यों में किया जा सके। 

शुरू से ही अच्युत के लक्ष्य साफ़ थे। रास्ता तय था। इरादा नेक और पक्का था। हौसले भी बुलंद थे। उन्होंने तय कर लिया था कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी से जो कमाई होगी वो सारा कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज में लगाकर वे गरीब बच्चों को शिक्षित करेंगे। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी के विद्यार्थियों से ली जाने वाली फीस का 10 फीसदी हिस्सा कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज के 25,000 छात्रों की पढ़ाई में खर्च किया जाता है। कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी के सभी शिक्षक, कर्मचारी अपनी तनख्वाह का तीन फीसदी हिस्सा कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज को देते हैं।

गौर करने वाली बात ये भी है कि कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज को चलाने में एक दिन का खर्च करीब 50 लाख रुपये होता है। इसी तरह कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज की और भी कई सारे बातें बहुत ही दिलचस्प हैं। इस गुरुकुलीय शिक्षा संस्थान में बच्चों के लिए जिस रसोई घर में भोजन बनाया जाता है वो भी दुनिया में अपने किस्म का सबसे बड़ा रसोई-घर है। 25,000 बच्चों के दोपहर और रात के खाने के लिए इस रसोई-घर में हर दिन औसत 7,500 किलो चावल, 2,200 किलो दाल, 7,200 किलो सब्जी, 25,000 अंडे, 2,800 किलो चिकन, 600 किलो मछली का इस्तेमाल होता है। बच्चों को सुबह के नाश्ते में चावल, कॉर्नफ्लेक्स, दही और दूध दिया जाता है। बच्चों का भोजन पौष्टिक, संतुलित, स्वादिष्ट और सेहत के लिए फायदेमंद होता है।

अच्युत सामंत ने जिस उद्देश्य से कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज को खड़ा किया और जिस कुशलता के साथ वे उसे चला रहे हैं वो देश और दुनिया के सामने समाज-सेवा और राष्ट्र-निर्माण के लिए किसी शिक्षा संस्थान को चलाने के लिए एक शानदार मिसाल है। आदिवासियों को समाज और देश की मुख्यधारा से जोड़ने के साथ-साथ वे इन लोगों की गरीबी और पिछड़ेपन को भी दूर कर रहे हैं।

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कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज के रूप में दुनिया के सामने एक आदर्श शिक्षा संस्थान खड़ा करने वाले अच्युत सामंत की कई खासियतें हैं। वे अविवाहित हैं। अच्युत कहते हैं, “मैंने जीवन में हमेशा संघर्ष ही किया है। मेरे जीवन में सुख का समय ही नहीं मिला। आदमी शादी करने की उसी समय सोचता है जब वो सुखी होता है। मैं हमेशा संघर्ष करता रहा और शादी करने की सोचने का समय ही नहीं मिला। संघर्षपूर्ण जीवन में शादी करता तो वो गलत फैसला होता।”

दिलचस्प बात ये भी है कि अच्युत सामंत भुवनेश्वर में दो कमरों वाले किराये के मकान में रहते हैं। ज्यादातर समय सफ़ेद कपड़ों में ही रहते हैं। चप्पल पहनते हैं न कि जूते। जीवन उनका सादगी भरा है और वे हर दिन 16 से 18 घंटे काम करते हैं। उनका सारा समय शिक्षा संस्थाओं में ही बीतता है। अच्युत के नाम पर कोई ज़मीन या जायदाद भी नहीं है। उनके बैंक खाते भी ज्यादा रकम नहीं है। न बड़ी लक्ज़री कार है न आलीशान बंगला। उनकी जो सारी ज़रूरतें हैं उन्हें उनका बनाया विश्वविद्यालय पूरा करता है। अक्सर उन्हें अपने शिक्षा संस्थानों में पैदल चलते-फिरते और घूमते हुए देखा जा सकता है। अगर दूर जाना हो तो वे साइकिल का भी इस्तेमाल करते हैं। ऐसा भी नहीं है कि वे कार का इस्तेमाल नहीं करते, ज़रुरत महसूस होने पर वे कार से भी सफ़र करते हैं। अक्सर उन्हें सड़क किनारे वाली बंडी और ठेलों पर नास्ता करते या फिर भोजन करते भी देखा जा सकता है। अच्युत ने कहा, “मुझे खुद आश्यर्य होता है कि मुझमें इतनी ताकत कहा से आती है। मैं मानता हूँ कि मुझे भगवान से वरदान मिला है,कुछ अच्छा करने का। सब कुछ भगवान ही कर रहा है मैं तो बस एक माध्यम हूँ।” रोचक बात ये भी है कि अच्युत सामंत कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज परिसर में एक पेड़ के नीचे मेज़ लगाकर अपना दफ्तरी कामकाज करते हैं।

समाज-सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए अच्युत सामंत को देश-विदेश में कई पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। 25 विश्वविद्यालयों ने उन्हें ‘डी. लिट.’ की उपाधि से नवाज़ा है। देश-विदेश की जानी-मानी हस्तियाँ अच्युत के शिक्षा-संस्थानों का दौरा कर यहाँ हो रही सामाजिक और शैक्षिक क्रांति को जानने-समझने की कोशिश करती हैं। जो कोई यहाँ आता है वो इन शिक्षा संस्थाओं की कामयाबी से प्रभावित हुए बिना नहीं लौटता।

एक सवाल के जवाब में अच्युत सामंत ने कहा, “लोग मुझे अलग-अलग वजह से जानते हैं। कोई मुझे यूनिवर्सिटी के संस्थापक के रूप में जानता है तो को ‘किस’ को चलाने वाले के रूप में। कोई मुझे समाज-सेवी के रूप में जानता है। लेकिन, जब लोग ये कहते हैं कि अच्युत सामंत एक ‘अच्छा आदमी’ है, तब मुझे बहुत खुशी होती है। मैं अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी यही मानता हूँ कि मैं हमेशा एक अच्छा आदमी ही रहा। मैंने ज़िंदगी में कभी कोई गलत काम नहीं किया है, झूठ नहीं बोला है, चोरी-चपाटी नहीं की है, कभी किसी का बुरा नहीं किया है।”

ये पूछे जाने पर कि वे जीवन में और क्या-क्या हासिल करना चाहते हैं? इस सवाल के जवाब में अच्युत सामंत ने कहा, “मैं जब तक जिंदा हूँ, तब तक गरीबी दूर करने के लिए काम करता रहूँगा। ओड़िसा में इंतनी ज्यादा गरीबी है कि अच्युत सामंत जैसे एक हज़ार आदमी भी जन्म लेंगे तब भी ये गरीबी दूर नहीं होगी। लेकिन मेरे कोशिश रहेंगी कि मैं गरीबी को दूर करूँ, भुखमरी को दूर करूँ। गरीब आदिवासी लोगों को जीवन की मुख्यधारा में लाऊँ। दरिद्रता मिटाऊं।”

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ओड़िसा में गरीबी का आलम बताने के लिए अच्युत सामंत ने दो घटनाएं सुनाईं। उन्होंने कहा, “1984 में ओड़िसा के कालाहांडी में गरीबी की वजह से एक औरत ने अपने एक बच्चे को पांच सौ रुपये में बेच दिया था। तब प्रधानमंत्री खुद हालात का जायजा लेने के लिए कालाहांडी आये थे। तब दुनिया जान गयी थी कि ओड़िसा में कितनी गरीबी है। इस घटना के 32 साल बाद भी गरीबी दूर नहीं हुई है। पिछले दिनों एक आदमी को अपनी पत्नी की लाश घर ले लाने के लिए एम्बुलेंस नहीं मिली और अपनी पत्नी के शव को अपने कन्धों पर उठाकर घर ले गया। इस घटना से दुनिया-भर के लोगों का पता चल गया कि ओड़िसा में गरीबी नहीं गयी है।”

पिछले कुछ सालों से अच्युत एक नए सिद्धांत और नयी संकल्पना को लेकर लोगों के बीच उसका प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने इस नए जीवन-सिद्धांत तो नाम दिया है – ‘देने की कला’। अच्युत का कहना-मानना है कि जब तक संपन्न लोग ज़रूरतमंद लोगों को उनकी ज़रुरत की चीज़ें नहीं देंगे तब तक गरीबी दूर नहीं होगी। उनके अनुसार, देने से भी खुशी मिलती है। अच्युत कहते हैं, “मैंने बचपन से ही दुःख सहा है फिर भी लोगों की मदद की है। अब भी ऐसे ही कर रहा हूँ। लोगों के चहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश में ही लगा हूँ। खुद दुःख झेलकर दूसरों को खुश करना आसान नहीं है, लेकिन जो ऐसा करता है वो कामयाब होता है और उसे अंत में उसे ही बहुत ज्यादा खुशी मिलती है।”

दिलचस्प बात ये भी है कि अच्युत सामंत बचपन की अपनी गरीबी को वरदान मानते हैं। उनका कहना है, “मैं गरीब था। मैंने गरीब का जीवन कैसे होता है ये अपनी आँखों से देखा। गरीबी को अनुभव किया। मैं जानता हूँ कि गरीब क्या सोचता है और क्या चाहता है। मैंने गरीबी को देखा और समझा इसी वजह से मैं गरीबों की सही तरह से मदद कर पा रहा हूँ। अगर मैं बचपन में अमीर होता तो बड़ा होकर गरीबों को शायद रोटी दे देता। गरीबों को जानता हूँ इसीलिए उन्हें शिक्षा दे रहा हूँ।”

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