संस्करणों
विविध

कैसे मरेगा भ्रष्टाचार का कैंसर?

10th May 2016
Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share

समय-समय पर ऐसा कहा जाता है कि भ्रष्टाचार कैंसर की तरह है जो भारत को बर्बाद करता जा रहा है. लेकिन यह कैंसर मरने से इनकार कर रहा है. अब, इस श्रेणी में ताजातरीन है अगुस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाला. यह नया नहीं है. इसने 2014 के चुनाव के पहले भी जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा था, यूपीए की सरकार के समय. लेकिन यह एक बार फिर उछल गया है, इसका श्रेय मिलान की उस कोर्ट को जाता है जिसके फैसले के बाद देश पिछले कुछ दिनों से इस मुद्दे पर बहस कर रहा है. सत्ताधारी पार्टी, बीजेपी कांग्रेस पर आरोप लगा रही है तो वहीं कांग्रेस बीजेपी पर हमला कर रही है और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जैसे पहले होता आया है इसका समाधान नजर नहीं आता.

यह एक क्लासिक केस है जो यह दिखाता है कि हमारे सिस्टम में किस तरह की गड़बड़ियां हैं और किस चीज ने देश की राजनीति को ग्रस्त कर रखा है. अगुस्ता वेस्टलैंड डील की शुरुआत वाजपेयी सरकार में हुई थी और हेलीकॉप्टर में स्पेसिफिकेशन बदलाव के आदेश 2003 में दिए गए थे जब एनडीए की सरकार थी. ऐसा आरोप लगाया गया कि यह अगुस्ता वेस्टलैंड को मदद पहुंचाने के लिए किया गया था और लाखों यूरो तब और बाद में दिए गए थे. वाजपेयी की सरकार 2004 में चुनाव हार गई और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए. यह डील उन्हीं के कार्यकाल में तय हुई. घोटाला 2014 के चुनाव के समय लोगों के सामने आया.

मिलान कोर्ट के फैसले ने बीजेपी को बड़ा अवसर दे दिया है कांग्रेस को किनारा लगाने के लिए, जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. कोर्ट का फैसला सोनिया गांधी और अहमद पटेल का संदर्भ देता है लेकिन कोई दोष साबित नहीं करता है लेकिन फिर भी उनकी भूमिका की जांच की जानी चाहिए.

जाहिर तौर बीजेपी आक्रामक है और वह कांग्रेस को पटकना चाहती है. लेकिन कुछ सवाल यहां वाजिब हैं.

पहला सवाल-जब से अगुस्ता वेस्टलैंड घोटाले का उजागर हुआ है इटली की सरकार इस मामले में तेजी से बढ़ी, उसने मामले की जांच करवाई, रिपोर्ट सौंपी गई, निचली अदालत ने फैसला सुनाया और अपीलीय अदालत ने भी अपना आदेश सुनाया. अब कंपनी के दो वरिष्ठ अधिकारी जिन्हें घूस देने का दोषी पाया गया है वे जेल के अंदर बंद है. दुखद भाग यह है कि भारत में यहां तक की ठीक से जांच भी नहीं शुरू हुई है. भूल जाइए दोषियों को सजा की बात.

मैं इस मामले में मनमोहन सिंह सरकार की सुस्ती को समझ सकता हूं क्यों कि वे कठघरे में थे. लेकिन मोदी सरकार क्यों नहीं आगे बढ़ी? उसने पिछले दो साल में कुछ ठोस क्यों नहीं किया?

सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने मामले को जल्द नहीं निपटाया. उन्हें कौन रोक रहा था और क्यों?

मोदी तो कहते हैं कि वे भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेंगे और ना खाएंगे और ना ही खाने देंगे. अगर वे अपने दृढ़ संकल्प में इतने सच्चे हैं तो देश की जनता इस घोटाले के असली चेहरों को जान गई होती. तो उनकी तरफ से देश को स्पष्टीकरण देना बनता है. दूसरी बात, बीजेपी के नेता यह चीख-चीखकर कह रहे हैं कि इस मामले में सोनिया गांधी ने पैसा लिया है तो कार्रवाई क्यों नहीं की गई ? तमिलनाडु की रैली में भी प्रधानमंत्री उनके बारे में ऐसा ही कुछ कह चुके हैं लेकिन एक बार फिर चीजें आगे बढ़ती नहीं दिख रही है. सवाल जवाब के लिए उन्हें नोटिस देकर बुलाया तक नहीं जा रहा है. पूछताछ और गिरफ्तारी तो दूर की बात है. मजेदार बात यह है कि बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने सोनिया गांधी से घूस लेने वालों के नाम बताने को कहा है. यह ऐसा ही है जैसे किसी चोर के सामने गिड़गिड़ाना की वह अपने साथी का नाम बता दें. वास्तव में कांग्रेस ने मोदी सरकार को चुनौती दी है कि वह दो महीने में जांच पूरी करें ना कि उनके नेताओं को बदनाम करें. लेकिन सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई.

हमारे सिस्टम और भ्रष्टाचार से लड़ाई के लिए प्रतिबद्धता को लेकर यह घोटाला कई परेशान करने वाले सवाल खड़े करता है.

1 क्या स्थापित राजनीतिक पार्टियां गंभीरता से भ्रष्टाचार से लड़ने की इच्छुक हैं?

जवाब ना है. बल्कि, यह एक राजनीतिक हथकंडा है विरोधियों को शांत करने के लिए. चुनाव के समय बीजेपी अगुस्ता वेस्टलैंड का मामला उठा राजनीतिक लाभ लेना चाहती है. वाकई अगर बीजेपी इतनी गंभीर होती तो जांच अब तक हो गई होती और भ्रष्टाचारी जेल में होता जैसे इटली में है.

2 क्या राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक है? इसका भी जवाब एक बार फिर ना है.

अगर कांग्रेस गलत करने की दोषी है तो बीजेपी भी जिम्मेदार हेलीकॉप्टर के मानकों को बदलने के लिए जिससे अगुस्ता वेस्टलैंड कंपनी को फायदा पहुंचा.

3 क्या जांच एजेंसी को निष्क्रयता के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

इसका भी जवाब एक बार फिर न है. अगुस्ता वेस्टलैंड का मामला संकेत देता है कि कोई संस्थागत ढांचा नहीं है जो जांच करे और दोषी को सजा दिला पाए. जांच एजेंसियों को सत्ताधारी पार्टी कंट्रोल करती है और वे सरकार की रहमोकरम पर काम करती है. इसलिए सीबीआई और ईडी को जांच की कमी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. जिम्मेदारी सत्ताधारी नेताओं की बनती हैं

4 समाधान क्या है? भ्रष्टाचार से कैसे लड़ा जा सकता है?जवाब बहुत ही सरल है. जांच को अंजाम तक पहुंचाने के लिए जांच एजेंसियों को आजाद करना होगा सरकार की चंगुल से. एजेंसियों को आजाद बनाना होगा और जांच को समय सीमा में बांधना होगा.

5 क्या ऐसा हो पाएगा? जवाब एक जबरदस्त ना है. क्यों? इसका जवाब मुझे देने दीजिए. अन्ना के आंदोलन के समय स्वतंत्र और शक्तिशाली लोकपाल बनाने की मांग की गई थी जिससे भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सके. जबरदस्त दबाव के बाद संसद के जरिए एक कमजोर लोकपाल बनाया गया लेकिन अबतक उसकी जगह खाली है. लोकपाल की कुर्सी में अबतक कोई नहीं बैठा है. अगर मोदी सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए इतनी ही प्रतिबद्ध है तो अपने आपको साबित करने के लिए लोकपाल को नियुक्त कर लेती. लेकिन हाय!

मुझे डर है कि अगुस्ता वेस्टलैंड सौदा भी बोफोर्स के रास्ते चला जाएगा और आखिरकार उससे कुछ नहीं निकलेगा. दोषी आजाद घुमेंगे और जनता के पैसे लूट लिए जाएंगे.

संविधान के जरिए एक नई जन क्रांति की जरूरत है जिससे संतुलन को उसके मूल स्थिति पर वापस डाला जा सके. क्या ऐसा होगा? यह लाख टके का सवाल है क्योंकि कैंसर के स्थायी इलाज की जरूरत है ना कि नारेबाजी और वाक्पटुता की. 

(यह लेख मूलत: अंग्रेजी में आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने लिखा है जिसका अनुवाद एस इब्राहिम ने किया है)

Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें