संस्करणों
विविध

मयखाने की तरह मदहोश कर देती है कालिया की 'ग़ालिब छुटी शराब'

11th Nov 2018
Add to
Shares
16
Comments
Share This
Add to
Shares
16
Comments
Share

लंबी अस्वस्थता के बाद लाजवाब किस्सागो रवींद्र कालिया का दुनिया से चले जाना हिंदी साहित्य के लिए एक युग के खत्म होने जैसा लगता है। प्रश्न शेष रह गए हैं कि उन्हें याद किस तरह किया जाए। आज (11 नवंबर) उनका जन्मदिन है। उनकी कालजयी कृति 'ग़ालिब छुटी शराब' पाठकों को मयखाने की तरह मदहोश कर देती है।

image


 सहजता रवींद्र कालिया के स्वभाव का सबसे खूबसूरत हिस्सा था। हालांकि कहने वाले इसे उनका ऊपरी खोल भी कहते थे। वे किसी से लेखक और संपादक की हैसियत से कभी नहीं मिलते थे।

ग्यारह नवम्बर उन्नीस सौ उनतालीस को जालंधर में जन्मे एवं भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए, मृतप्राय: पत्रिकाओं में भी जान फूंक देने वाले लिक्खाड़ उपन्यासकार, कहानीकार, पत्रकार, लेखक रवींद्र कालिया का आज जन्मदिन है। वह हिंदी के उन गिने-चुने संपादकों में रहे हैं, जिन्हें पाठकों की नब्ज़ और बाज़ार का खेल बखूबी पता था। उनके शब्दों ने कभी 'धर्मयुग' में धूम मचाई तो कभी ‘नया ज्ञानोदय’ में। अपनी कालजयी कृति 'ग़ालिब छुटी शराब' में वह लिखते हैं - 'मोहन राकेश ने अपने मोटे चश्‍मे के भीतर से खास परिचित निगाहों से देखते हुए उनसे पूछा, बम्‍बई जाओगे? बम्बई? कोई गोष्‍ठी है क्‍या? नहीं, ‘धर्मयुग' में। ‘धर्मयुग' एक बड़ा नाम था, सहसा विश्‍वास न हुआ। उन्‍होंने अगले रोज़ घर पर बुलाया और मुझ से सादे काग़ज़ पर ‘धर्मयुग' के लिए एक अर्ज़ी लिखवायी और कुछ ही दिनों में नौकरी ही नहीं, दस इंक्रीमेंट्स भी दिलवा दिये।'

'ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी-कभी, पीता हूँ रोज़े-अब्रो-शबे-माहताब में।' एक बार जब वह बीमारी में अपना इलाज कराने अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने तमाम कागजात देखने के बाद पूछा- 'आप कब से पी रहे हैं?' उन्होंने डॉक्टर को बताया- 'यही कोई चालीस वर्ष से। पिछले बीस वर्ष से तो लगभग नियमित रूप से।' डॉक्टर ने पूछा- 'रोज कितने पेग लेते हैं?' कालिया ने बताया- 'मैंने कभी इस पर गौर नहीं किया था। इतना जरूर याद है कि एक बोतल शुरू में चार-पाँच दिन में खाली होती थी, बाद में दो-तीन दिन में और इधर दो-एक दिन में। कम पीने में यकीन नहीं था। कोशिश यही थी कि भविष्‍य में और भी अच्‍छी ब्रांड नसीब हो। शराब के मामले में मैं किसी का मोहताज नहीं रहना चाहता था, न कभी रहा। इसके लिए मैं कितना भी श्रम कर सकता था। भविष्‍य में रोटी नहीं, अच्‍छी शराब की चिंता थी।'

डॉक्टर ने कहा- 'आप जीना चाहते हैं तो अपनी आदतें बदलनी होंगी। जिंदगी या मौत में से आप को एक का चुनाव करना होगा।' डॉक्टर की बात सुन कर कालिया को हँसी आ गई। मूर्ख से मूर्ख आदमी भी जिंदगी या मौत में से जिंदगी का चुनाव करेगा। डॉक्टर को मेरी मुस्कुराहट बहुत नागवार गुजरी, उसने कहा- 'आप हँस रहे हैं, जबकि मौत आप के सर पर मँडरा रही है।' कालिया ने कहा- 'सॉरी डॉक्टर! मैं अपनी बेबसी पर हँस रहा था। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि यह दिन भी देखना पड़ेगा।' डॉक्टर ने पूछा- 'आप यकायक पीना नहीं छोड़ पाएँगे। इतने बरसों बाद कोई भी नहीं छोड़ सकता। शाम को एकाध, हद से हद दो पेग ले सकते हैं।' कालिया ने बताया- 'मैं 'विद्ड्राअल सिंप्टम्स' (मदिरापान न करने से उत्‍पन्‍न होनेवाले लक्षण) झेल न पाऊँगा।'

वह लिखते हैं- 'आज थर्मामीटर मुझे चिढ़ा रहा था। गिलास, बोतल और बर्फ की बकट मेरे सामने जैसे मुर्दा पड़ी थीं। मैंने सिगरेट सुलगाया और एक झटके से बोतल की सील तोड़ दी। 'आखिर कितना पिओगे रवींद्र कालिया?' सहसा मेरे भीतर से आवाज उठी। 'बस यही एक या दो पेग।' मैंने मन ही मन डॉक्टर की बात दोहराई। 'तुम अपने को धोखा दे रहे हो।' मैं अपने आप से बातचीत करने लगा, 'शराब के मामले में तुम निहायत लालची इनसान हो। दूसरे से तीसरे पेग तक पहुँचने में तुम्‍हें देर न लगेगी। धीरे-धीरे वही सिलसिला फिर शुरू हो जाएगा।' मैंने गिलास में बर्फ के दो टुकड़े डाल दिए, जबकि बर्फ मदिरा ढालने के बाद डाला करता था। बर्फ के टुकड़े देर तक गिलास में पिघलते रहे। बोतल छूने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहा था। भीतर एक वैराग्य भाव उठ रहा था, वैराग्य, निःसारता और दहशत का मिला-जुला भाव। कुछ वैसा आभास भी हो रहा था जो भरपेट खाने के बाद भोजन को देख कर होता है। एक तृप्ति का भी एहसास हुआ। क्षण भर के लिए लगा कि अब तक जम कर पी चुका हूँ, पंजाबी में जिसे छक कर पीना कहते हैं। आज तक कभी तिशना-लब न रहा था। आखिर यह प्‍यास कब बुझेगी? जी भर चुका है, फकत एक लालच शेष है।'

तो इस तरह किस्सागोई वाली उनकी कालजयी कृति 'ग़ालिब छुटी शराब' आद्योपांत पाठकों को स्वयं में समेटे रहती है। जब रवींद्र कालिया ने इस दुनिया से कूच किया, उनको याद करते हुए रवीश रंजन शुक्ला लिखते है- 'इलाहाबाद में ठंड की वो धुंधभरी शाम थी, जब हम साहित्यिक पत्रिका में एक लेख पढ़कर तेलियरगंज के उनके डुप्लेक्स में मिलने चल गए थे। घर के बाहर लगे नेम प्लेट पर ममता और रवींद्र कालिया लिखा देखा। दरवाजे पर लगी बेल को दबाते हुए हमें संकोच हो रहा था। घर की घंटी बजी। खुद रवींद्र कालिया जी ने दरवाजा खोला। लंबा सा कुर्ता और जींस पहने शांत-सौम्य शख्सियत को देखते ही हम तीन दोस्तों में पैर छूने की होड़ लग गई। उन्होंने हल्के से मना करने की कोशिश की। हमने अपना परिचय दिया कि सर, हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के क्रिएटिव राइटिंग सेल से हैं।

आपके लेख और कहानियां पढ़ते हैं, इसीलिए आपसे मिलने चले आए। हंसते हुए उन्होंने ड्रांइग रूम में बैठाया।...उनकी गर्मजोशी देखकर हमारे मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ तो वो दिल्ली आकर ही खत्म हुआ।...बहुत सारे मसलों पर रवींद्र कालिया अपनी राय बेबाकी और व्यवहारिकता से रखते थे। मेरी उनसे आखिरी मुलाकात ज्ञानपीठ के दफ्तर में हुई थी। कई मुद्दों पर उऩसे बातचीत हुई। उनकी सेहत ठीक नहीं थी, लेकिन हंसते बोले खुद सीढ़ियां चढ़ते रहे, फिर खामोश हो गए। कुछ देर बाद बोले, मीडिया अंक की एक कॉपी जरूर ले जाना। वो इलाहाबाद छोड़कर दिल्ली आ गए थे, लेकिन दिल्ली के साहित्यकारों की गुटबाजी से खुश नहीं थे। वह एक ऐसी खुशनुमा शख्सियत और बेबाक रचनाकार थे, जिन्हें साहित्य के मठाधीश भले वो तव्वजो न देते रहे हों, जिसके वो हकदार थे, लेकिन रवींद्र कालिया हमारे जैसे लाखों उन लोगों की जेहनियत में इंसानियत भरने के लिए जरूर जाने जाएंगे, जो या तो उनसे मिलते रहे या उनकी रचनाओं को पढ़ते रहे हैं।'

लंबी अस्वस्थता के बाद रवींद्र कालिया का दुनिया से चले जाना हिंदी साहित्य के लिए एक युग के खत्म होने जैसा बचा है। इसके बाद जो प्रश्न रह गए हैं, वे यह कि उन्हें याद किस तरह किया जाए। उनकी बेमिसाल कहानियां और मानीखेज संस्मरण उन्हें एक बड़े लेखक के रूप में हमेशा याद किये जाने के लिए काफी हैं। पूरी साहित्यिक बिरादरी रवींद्र कालिया को लेखक से भी ऊपर एक अच्छे संपादक के रूप में याद करेगी। खुद लेखक होने से कहीं बड़ा काम है लेखकों की एक नई पीढ़ी को जन्म देना। और उससे भी कहीं बहुत मुश्किल उन्हें पहचान देना या उस पहचान के लिए खड़े होना। सहजता रवींद्र कालिया के स्वभाव का सबसे खूबसूरत हिस्सा था। हालांकि कहने वाले इसे उनका ऊपरी खोल भी कहते थे। वे किसी से लेखक और संपादक की हैसियत से कभी नहीं मिलते थे। उन्होंने 'काला रजिस्टर', 'नौ साल छोटी पत्नी', 'जरा सी रौशनी' जैसी बेमिसाल कहानियां भी लिखीं। संस्मरण विधा को भी उन्होंने एक नया और विस्तृत आयाम दिया।

यह भी पढ़ें: बचपन में छोटे से घर की फर्श पर सोते थे गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई

Add to
Shares
16
Comments
Share This
Add to
Shares
16
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें