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एक 'चायवाली' की दर्द भरी दास्तां

"सम्मान तो दिया पर मेरा मान छीन लिया": प्रिया सचदेव, उदयपुर की चाय वाली।

25th Apr 2017
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मैं एक लड़की हूं, क्या यही मेरा गुनाह है?

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मैं, प्रिया सचदेव उदयपुर की रहने वाली हूं। मेरे लिए मेरा चाय का ठेला ही मेरा मान था और आज उसे ही छीन लिया गया है। मैंने करीब 1 वर्ष पहले एक चाय का ठेला लगाया था। ग्रेजुएट होने के बाद मैं कोई भी बिज़नेस कर सकती थी, लेकिन मैंने चाय का ठेला लगाकर चाय बेचने का निर्णय लिया। अपनी मेहनत और लगन से मैंने three addictions नाम का चाय का ठेला लगाया, जो सिर्फ लड़कियों के लिए है। 

अपने इस ठेले को लगाने का मेरा मकसद पैसा कमाना नहीं बल्कि उन लड़कियों को एक सहज माहौल देना था, जो चाय के ठेले पर खड़े होकर बिंदास चाय पीना चाहती हैं। एक लड़की होते हुए मैंने भी कई बार ये महसूस किया है, चाय की दुकान में मैं लड़कों की तरह सहज, फ्री और बिंदास हो कर चाय नहीं पी पाती। नजाने कौन सा संकोच हैं, जो कहीं न कहीं मेरे भीतर बैठा हुआ है। अपनी इसी सोच को साथ लिए मैं बाकी की लड़कियों के बारे में भी सोचती हूं और यही महसूस कर पाती हूं, कि मेरी ही तरह शायद वे भी। जिस दिन ये खयाल पनपा उसी दिन ये निर्णय ले लिया कि मैं लड़कियों के लिए एक ऐसा चाय का ठेला लगाऊंगी, जहां वो भी बाकी के लोगों की तरह आज़ादी के साथ चाय की चुस्कियां लेते हुए अपने दिल की बातें कर सकें।

एक लड़की होने के नाते ये सफर मेरे लिए आसान नहीं था। मुझे और मेरे परिवार को पड़ोस और समाज से काफी तिरस्कार भी झेलना पड़ा। सभी को मेरा लड़की होकर चाय का ठेला लगाना डाइजेस्ट नहीं हो पा रहा था। मेरे इरादों को तोड़ने और मेरे ठेले को हटाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाये गये। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मुझे भरोसा था, कि मैं जो कर रही हूं, वो सही है। यदि मैं कुछ गलत नहीं कर रही हूं, तो मेरे साथ भी कुछ गलत भी नहीं होगा।

मैं अपने काम से खुश और संतुष्ट थी। मुझे बहुत अच्छा लगता था चाय बना कर लड़िकियों को पिलाना और उस दौरान उनके साथ कई तरह के विषयों पर बातचीत करना... मेरे सपने को पंख तब लगे जब हर अख़बार, न्यूज़ चैनल और रेडियो पर मेरे काम को काफी सराहना मिली।जब मुझे नारी शक्ति का सम्मान मिला तब मानो कोई बड़ा सपना पूरा हो गया था। लेकिन सबकुछ एक पल में ही चकना चूर हो गया।

मेरे ठेले को तबाह कर दिया गया, उसे मुझसे छीन लिया गया। एक पल के लिए मैं शिकायत भी नहीं करती, लेकिन कम से कम जिन लोगों ने मेरे ठेले को मुझसे छीना वे मुझे वाजिब जवाब तो दें... कि, इस तरह का दुर्व्यवहार मेरे साथ क्यों?

मैं हताश हो गयी हूँ, ये सोच कर कि क्या मेरा लड़की हो कर चाय का ठेला चलाना गुनाह है? क्या लड़कियों को एक खुला माहौल देने की मेरी सोच गलत थी? नारी शक्ति को बढ़ावा देने की मेरी सोच गलत थी?

मेरे ठेले के पास तो और भी कई सारे ठेले थे, फिर मेरा ही ठेला क्यों हटाया गया? मेरा ठेला न मिले, लेकिन मेरे सवालो का जवाब तो मिले! 

मैं एक लड़की हूं, क्या यही मेरा गुनाह है?

मुझे मेरे इस अभियान में योरस्टोरी का साथ मिले तो बहुत खुशी होगी।

प्रिया सचदेव

उदयपुर में चाय का ठेला लगाने वाली 

"चायवाली"


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