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26/11 में शहीद सुशील कुमार शर्मा के बेटे फैला रहे हैं प्यार और मानवता

सुशील कुमार शर्मा फाउंडेशन एक ऐसा फाउंडेशन, जो कमजोर पृष्ठभूमि की लड़कियों को देता है नि: शुल्क शिक्षा, साथ ही सीखाता है चित्रकारी और आत्मरक्षा के गुर।

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15th Nov 2017
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शहीद सुशील कुमार शर्मा 26/11 को छत्रपति शिवाजी टर्मिनल्स (सीएसटी) पर तैनात थे। उन्हें आतंकवादियों की एक गोली लग गई, जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई। उस दिन वो जल्दी घर जाना चाहते थे क्योंकि उनके बेटे का जन्मदिन मनाना था। 26/11 के हमलों के एक महीने बाद सुशील कुमार शर्मा के परिवार ने मध्य प्रदेश के ग्वालियर में अपने गृहनगर में एक संगठन का शुभारंभ किया।

साभार: फेसबुक, इंडियन एक्सप्रेस

साभार: फेसबुक, इंडियन एक्सप्रेस


जिसे शहीद सुशील कुमार शर्मा फाउंडेशन का नाम दिया गया। यह फाउंडेशन कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की लड़कियों को नि: शुल्क शिक्षा प्रदान करता है, साथ ही चित्रकारी और आत्मरक्षा के गुर भी सिखाता है।

आज आदित्य 21 साल के हैं। उन्होंने इस सामाजिक संगठन शुरू करने का फैसला किया क्योंकि उनके पिता देश सेवा के लिए प्रतिबद्ध थे। जब भी संभव हो, वो वंचितों को मदद देने से पीछे नहीं हटते थे। आदित्य का मानना है कि वह अपने पिता के मिशन का समर्थन कर रहे हैं। इस फाउंडेशन के माध्यम से लगभग 150 लड़कियों को फायदा हुआ है। 

शहीद सुशील कुमार शर्मा 26/11 को छत्रपति शिवाजी टर्मिनल्स (सीएसटी) पर तैनात थे। उन्हें आतंकवादियों की एक गोली लग गई। जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई। उस दिन वो जल्दी घर जाना चाहते थे क्योंकि उनके बेटे का जन्मदिन मनाना था। 26/11 के हमलों के एक महीने बाद सुशील कुमार शर्मा के परिवार ने मध्य प्रदेश के ग्वालियर में अपने गृहनगर में एक संगठन का शुभारंभ किया। जिसे शहीद सुशील कुमार शर्मा फाउंडेशन का नाम दिया गया। यह फाउंडेशन कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की लड़कियों को नि: शुल्क शिक्षा प्रदान करता है, साथ ही चित्रकारी और आत्मरक्षा के गुर भी सिखाता है।

आज आदित्य 21 साल के हैं। उन्होंने इस सामाजिक संगठन शुरू करने का फैसला किया क्योंकि उनके पिता देश सेवा के लिए प्रतिबद्ध थे। जब भी संभव हो, वो वंचितों को मदद देने से पीछे नहीं हटते थे। आदित्य का मानना है कि वह अपने पिता के मिशन का समर्थन कर रहे हैं। इस फाउंडेशन के माध्यम से लगभग 150 लड़कियों को फायदा हुआ है। मुंबई में सुशील के जन्मदिन पर ये लोग झुग्गियों में जाते हैं और बच्चों को स्कूल के बैग, मिठाई, रंग और स्टेशनरी बांटकर आते हैं। आदित्य के मुताबिक, मैं सिर्फ अपने पिता की तरह हूं, किसी की खुशियों का कारण बनना अच्छा लगता है। प्यार बांटने में अच्छा लगता है।

आदित्य इलेक्ट्रॉनिक और दूरसंचार इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र हैं। उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए वो इंडियन एक्सप्रेस को बताते हैं, हमलों के एक हफ्ते तक मैं सुन्न रहा। पिता जी की लंबी अनुपस्थिति मुझे साल रही थी। जब सच्चाई से मेरा सामना हुआ तो मैं गुस्से से भर गया। मेरे अंदर बहुत गुस्सा था, खासकर उन लोगों के खिलाफ जिन्होंने मेरे पिता को मारा था। उस वक्त अपने आप को प्रेरित करना सबसे बड़ी चुनौती थी और जब मैंने ऐसा करना सीखा, तो मुझे एहसास हुआ कि दुनिया प्रेम से भरी है और हमारा काम इसे फैलाना था।

आदित्य को विदेश में पोस्ट ग्रेजुएट अध्ययन की उम्मीद है। जबकि उनके भाई सिद्धांत, जो कि आदित्य से पांच साल बड़े हैं, पुणे में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ कार्यरत हैं। उनकी मां रागिनी शर्मा अब सीएसएमटी में एक सहायक टिकट कलेक्टर हैं। आदित्य के मुताबिक, मेरे पिता के निधन के बाद, हमें कुछ वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। भावनात्मक रूप से, मेरा भाई टूट गया था। जब भी ये विषय उठता है तब तब वह रोता है। मेरे लिए, मुझे अपने आप को व्यक्त करने में कठिनाइयां महसूस होती थी। मेरी स्कूली शिक्षा समाप्त होने के बाद यथार्थ ने मुझे और चोटिल किया। मुझे अपने परिवार के समर्थन के लिए एक अच्छे वेतन के साथ नौकरी पाने के लिए अच्छी तरह से अध्ययन करना पड़ा।

मैं जल्द ही बड़ा हो गया था। रेलवे स्टेशन, जहां उनके पिता की मृत्यु हो गई थी वो अब हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा है। इस शहर के लोगों ने मुझे समर्थन दिया है और मेरी मदद की है। देश में मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की कमी है लेकिन इसमें कुछ भी नफरत रखने का कोई फायदा नहीं है। मां आराम से रहें, यह मेरे जीवन के केंद्रीय लक्ष्यों में से एक है। ऐसे दिन होते हैं जब हम दोनों परेशान होते हैं, लेकिन हम सिर्फ एक-दूसरे को पकड़ते हैं, विश्वास करते हैं कि हर दिन एक नई सुबह होती है। 

ये भी पढ़ें: शिक्षा व्यवस्था के सुधार के लिये आवश्यक है धन से अधिक धुन

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