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एक ऐसा सॉफ्टवेयर जो बाघों की जिंदगी बचाने के साथ-साथ गैरकानूनी कामों पर भी लगा रहा है लगाम

एक ऐसी तकनीक जिसकी मदद से कम संख्या में बचीं वन्य जीव प्रजातियों को बचाया जा रहा है शिकारियों से...

6th Feb 2018
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तकनीकी विकास के साथ-साथ हमें हमेशा पर्यावरण और ईकोसिस्टम के पहलुओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो इस जिम्मेदारी को समझते हैं। आज हम बात करने जा रहे हैं, राजस्थान के राजा बृज भूषण और उनके दोस्त रविकांत सिंह की। दोनों ने मिलकर मई, 2010 में ‘बाईनॉमियल सॉल्यूशन्स’ नाम से एक कंपनी की शुरूआत की, जो आईटी और अन्य क्षेत्रों की कंपनियों को भी तकनीकी सपोर्ट देती है...

कंपनी के सीईओ रविकांत सिंह

कंपनी के सीईओ रविकांत सिंह


पिछली बार बाघों की औपचारिक गणना 2014 में हुई थी, जिसके मुताबिक देश में कुल 2,226 बाघ थे। सरकार के प्रयासों के सकारात्मक प्रभाव को देखते हुए और राज्यों के सर्वे से मिले आंकड़ों के मुताबिक, 2018 की गणना में बाघों की संख्या 3,000 के पार होने की संभावना है।

तकनीकी विकास के साथ-साथ हमें हमेशा पर्यावरण और ईकोसिस्टम के पहलुओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो इस जिम्मेदारी को समझते हैं। आज हम बात करने जा रहे हैं, राजस्थान के राजा बृज भूषण और उनके दोस्त रविकांत सिंह की। दोनों ने मिलकर मई, 2010 में ‘बाईनॉमियल सॉल्यूशन्स’ नाम से एक कंपनी की शुरूआत की, जो आईटी और अन्य क्षेत्रों की कंपनियों को भी तकनीकी सपोर्ट देती है।

कंपनी ने वन्यजीव संरक्षण की समस्या को खासतौर पर ध्यान में रखते हुए, ई-आई तकनीक (सॉफ्टवेयर) का विकास किया, जिसकी मदद से देश के कई नैशनल पार्कों और वाइल्डलाइफ सेंचुरीज में बेहद कम संख्या में बचीं वन्य जीव प्रजातियों (खासतौर पर बाघ) को शिकारियों से बचाया जा रहा है। साथ ही, अवैध खनन और लकड़ी की तस्करी जैसे गैर-कानूनी कामों पर भी लगाम लगाई जा रही है।

पिछली बार बाघों की औपचारिक गणना 2014 में हुई थी, जिसके मुताबिक देश में कुल 2,226 बाघ थे। सरकार के प्रयासों के सकारात्मक प्रभाव को देखते हुए और राज्यों के सर्वे से मिले आंकड़ों के मुताबिक, 2018 की गणना में बाघों की संख्या 3,000 के पार होने की संभावना है। इस बढ़ोतरी के बावजूद, अभी भी बाघ संरक्षण का मुद्दा गंभीर ही बना हुआ है और इस दिशा में सचेत रहने की जरूरत है। इस क्रम में ई-आई जैसी तकनीक सरकार के लिए काफी मददगार साबित हो रही है। कंपनी, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के साथ मिलकर काम कर रही है। फिलहाल असम के काजीरंगा, भोपाल के रातापानी और उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट में इस तकनीक की मदद ली जा रही है। सबसे पहले यह सिस्टम उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट नैशनल पार्क में लगाया गया था।

कैसे काम करता है सिस्टम?

ई-आई तकनीक में मोशन डिटेक्शन फिल्टर, अलर्टिंग और वेब ऐप्लीकेशन्स को जोड़ा गया है। थर्मल कैमरे की मदद से जानवर या मानव शरीर की ऊष्मा के जरिए इमेज तैयार की जाती है। वहीं मोशन डिटेक्शन से जंगल में होने वाली हर गतिविधि का पता लगाया जाता है। कैमरे हर पल निगरानी में रहते हैं और सामान्य फिल्म को फिल्टर करते रहते हैं। किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविध की आशंका पर अलर्टिंग पार्ट तत्काल कंट्रोल रूम को सूचित करता है। कंट्रोल रूम से क्षेत्र के और अन्य अधिकारियों के पास मोबाइल और वेबसाइट पर फोटो सहित अलर्ट भेजा जाता है और जल्द से जल्द संभव कार्रवाई की जाती है। कंट्रोल रूम से इन कैमरों को रिमोट के जरिए कंट्रोल भी किया जा सकता है।

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थर्मल और इन्फ्रा-रेड क्षमता वाले ये कैमरे ऊंचे टावरों पर लगाए गए हैं, जो 10 किलोग्राम से अधिक वजन वाले किसी भी जानवर को कैप्चर करने में सक्षम हैं। ये कैमरे 360 डिग्री व्यू लेने में भी सक्षम हैं। नाइट विजन के साथ-साथ इनमें खराब मौसम में काम करने की क्षमता भी है। ई-आई की मदद से न सिर्फ जानवरों का मूवमेंट, बल्कि समूह में उनकी संख्या और औसत गति का भी पता लगाया जा सकता है। यह एक कारगर मॉनिटरिंग सिस्टम है। इस सिस्टम की एक और खास बात यह है कि इसे सोलर पावर की मदद से ऑपरेट किया जा रहा है।

क्या है रवि-राजा का बैकग्राउंड?

रविकांत सिंह इंजीनियर हैं और आईटी इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से भी ज्यादा का अनुभव है। रविकांत कंपनी के सीईओ हैं। वहीं दूसरी ओर, कंपनी के सीटीओ राजा बृज भूषण कई ऐडवरटाइजिंग, ट्रैवल और सोशल मीडिया कंपनियों को तकनीकी सेवाएं दे चुके हैं। राजा ने कई सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए भी काम किया है। राजा के पास विदेश में गूगल और आईपीआर लैब्स में काम करने का भी अनुभव है।

मिल रही है तारीफें

काम अगर सकारात्मक हो तो पहचान मिलना लाजमी है। राजा-रवि की इस जोड़ी के काम को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा चुका है। ई-आई तकनीक के लिए कंपनी ने इंटरनैशनल वाइल्डलाइफ क्राइमटेक चैलेंज अवॉर्ड जीता है। दिल्ली के विज्ञान भवन की प्रदर्शनी में इस तकनीक को प्रधानमंत्री मोदी के सामने रखा गया, जिसके दौरान इस तकनीक की जमकर तारीफ हुई।

यह भी पढ़ें: प्रशासन से हार कर खुद शुरू किया था झील साफ करने का काम, सरकार ने अब दिए 50 लाख 

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