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एनजीओ को डॉलर बांटकर सहनशील बनाने का तिलिस्म!

10th Nov 2017
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अमेरिका के विदेश मंत्रालय के लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं श्रम ब्यूरो ने अपने नोटिस में कहा है कि वह अपने 4,93,827 डॉलर के कार्यक्रम के जरिए भारत में धर्म से प्रेरित भेदभाव एवं हिंसा को कम करना चाहता है।

सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो)

सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो)


असहिष्णुता तो असहिष्णुता है, वह दो लोगों के बीच हो, दो जातियों, दो समुदायों, दो सम्प्रदायों, दो धर्मों अथवा दो देशों के बीच। तो सवाल ये भी है कि क्या अब एनजीओ इसे दूर करेंगे, अमेरिका की नजर में इसके लिए सबसे सुपात्र आखिर एनजीओ ही क्यों?

प्रोफेसर रमेश प्रताप सिंह के मुताबिक असहिष्णुता शब्द का अर्थ है, सामाजिक व्यवहार में सहनशील न होना। प्रोफेसर मुकुल श्रीवास्तव भी असहिष्णुता का शाब्दिक अर्थ वर्तमान स्थितियों में धर्म या विचारधारा को सहन न कर पाना बताते हैं।

अमेरिका को भारत में असहिष्णुता बढ़ने की बड़ी चिंता है। उसने भारत के गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को करीब पांच लाख डॉलर देने की घोषणा की है। यह घोषणा सही है तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच भारत में असहिष्णुता इस हद तक बढ़ चुकी है कि उसमें दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरिका की ओर से इस तरह के आर्थिक हस्तक्षेप करने की नौबत आ गई है? गौरतलब है कि अमेरिका के विदेश मंत्रालय के लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं श्रम ब्यूरो ने अपने नोटिस में कहा है कि वह अपने 4,93,827 डॉलर के कार्यक्रम के जरिए भारत में धर्म से प्रेरित भेदभाव एवं हिंसा को कम करना चाहता है।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य धर्म से प्रेरित हिंसा एवं भेदभाव को कम करने के लिए नागरिक सुरक्षा में सुधार करना और सामाजिक सहिष्णुता बढ़ाना है। तब फिर यह भी उल्लेखनीय हो जाता है कि क्या भारत में ही असहिष्णुता बढ़ रही है, अमेरिका में नहीं? अथवा दुनिया का ऐसा कौन सा देश है, जहां असहिष्णुता से इनकार किया जा सकता है। और तो और, पूरी दुनिया को थर्रा देने वाली सूचनाओं के जिम्मेदार उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच आखिर किस बात को लेकर इतनी असहिष्णुता बढ़ रही है?

असहिष्णुता तो असहिष्णुता है, वह दो लोगों के बीच हो, दो जातियों, दो समुदायों, दो सम्प्रदायों, दो धर्मों अथवा दो देशों के बीच। तो सवाल ये भी है कि क्या अब एनजीओ इसे दूर करेंगे, अमेरिका की नजर में इसके लिए सबसे सुपात्र आखिर एनजीओ ही क्यों? दरअसल, एनजीओ, एक ऐसा नेटवर्क है, जो पैसा लेकर समाज सेवा करने का दम भरता है। भीतर की हकीकत कुछ और है। मौजूदा केंद्र सरकार भी एनजीओ नेटवर्क की हकीकतों को लेकर कार्रवाई की हद तक हस्तक्षेप किया है।

अब आइए, पहले ये जानते हैं कि असहिष्णुता के मायने क्या हैं? असहिष्णुता का अर्थ है सहन न करना। सब लोग जानते हैं कि सहिष्णुता आवश्यक है और चाहते हैं कि समाज में सहिष्णुता बनी रहे। सहिष्णुता एक भावनात्मक शक्ति है। भाव इन्द्रिय चेतना और मन से परे होता है। मन भाव से संचालित होता है और इन्द्रियां भी भाव से संचालित होती हैं। भाव सबसे ऊपर है। जो व्यक्ति सहिष्णुता का विकास करना चाहे, उसे अपने शारीरिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। इसी तरह हमारी सामाजिक बनावट में कहीं से असंतुलन उत्पन्न होता है, किसी स्तर पर उसकी मुखर प्रतिक्रियाएं सामने आने लगती हैं, असहिष्णुता बढ़ने की आशंका पैदा हो जाती है।

प्रोफेसर पवन अग्रवाल असहिष्णुता का मतलब विद्रोह करार देते हैं। वह कहते हैं कि अगर आप किसी धर्म, जाति आदि के विचारों को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं तो आप असहिष्णु हो रहे हैं। प्रोफेसर रमेश प्रताप सिंह के मुताबिक असहिष्णुता शब्द का अर्थ है, सामाजिक व्यवहार में सहनशील न होना। प्रोफेसर मुकुल श्रीवास्तव भी असहिष्णुता का शाब्दिक अर्थ वर्तमान स्थितियों में धर्म या विचारधारा को सहन न कर पाना बताते हैं।

वरिष्ठ साहित्यकार अखिलेश असहिष्णुता का मतलब बताते हैं, जो आपसे भिन्न हो, उसे बर्दाश्त न करना यानि जिसके विचार आपसे मिलते न हों, उसे अगर आप बर्दाश्त न कर सकें। इसमें केवल धर्म या जाति विशेष ही नहीं बल्कि दूसरे मुद्दे भी हो सकते हैं। केंद्र में भाजपा की सरकार सत्तासीन होने के बाद वर्ष 2015 में हमारे देश की संसद के अंदर 'असहिष्णुता' पर कई दिनो तक जोरदार बहस चल चुकी है। संसद के बाहर सृजनधर्मी, फ़िल्म कलाकार, शिक्षाविद, यहां तक कि वैज्ञानिक, इतिहासकार भी कथित असहिष्णुता पर चिंता जताते रहे हैं। असहिष्णुता के प्रतिकार में असहिष्णुता पूर्वक ही देश के कई नामवर लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए।

देश-विदेश के सैकड़ों शिक्षाविद बढ़ती 'असहिष्णुता' पर संयुक्त बयान जारी कर चुके हैं। इतिहास सम्मत सच तो यह है कि भारत में असहिष्णुता कोई नई बात नहीं है। भारत के अतीत में हिंसा की कोई कमी नहीं रही है, चाहे धर्म-जाति-वर्ण को लेकर अथवा राजनीतिक प्रतिशोधों में। भारत में सहिष्णुता-असहिष्णुता के प्रश्न पर अमेरिका एनजीओ को पैसा क्यों देना चाहता है? इसके पीछे आखिर उसकी असली मंशा क्या है? आजद भारत की बदलती तस्वीर में क्या है इसका योगदान? क्या है गैर सरकारी संगठन का काम? समाज की समस्याओं को हल करने में क्या है इनका रोल? एनजीओ अपने कामों को कितना बखूबी दे रहे हैं अंजाम?

इन सारे सवालों के जवाब अच्छी तरह से भारत सरकार जान चुकी, बता चुकी है और अमेरिका भी बखूबी जानता, समझता है। हकीकत देखिए कि अमेरिका के स्कूली छात्र तक सामूहिक संहार करते रहते हैं और वह भारत में सहिष्णुता बढ़ाने की कृपादर्शी हो रहा है। जब अमेरिका कहता है कि वह पैसा उन एनजीओ को देगा, जो धार्मिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देने वाले विचार और योजनाएं पेश करेंगे। जब समाज में आर्थिक विषमता सारी बीमारियों, सारे वैचारिक प्रदूषणों की असली वजह है तो उसे खत्म करने की दिशा में वह चुप क्यों रहता है। अदना से अदना अनपढ़ को भी पता है कि धार्मिक स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी है आर्थिक स्वतंत्रता।

देश में करोड़ो बेरोजगार दर-दर फिर रहे हैं, लाखों लोग कटोरे लेकर दिन रात सड़कों के किनारे, मंदिरों, मस्जिदों के सामने बैठे रहते हैं, आर्थिक गुलामी औरतों की आबरू तक सुरक्षित नहीं रहने दे रही है, सरकारी इमदादों के लिए हमेशा पूरी दुनिया में मार-काट मची रहती है, फिर धार्मिक स्वतंत्रता को हवा देने के बहाने एनजीओ को डॉलर बांटने की अमेरिकी पेशकश के मायने साफ समझ में आ जानी चाहिए। मतलब साफ है, नफरत के नाम पर बांटते रहो, नफरत की फसल काटते रहो, राज करते रहो!

यह भी पढ़ें: 3 रुपये रोजाना कमाने वाले मजूमदार आज हैं 255 करोड़ की कंपनी के मालिक

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