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रेखा उन हजारों महिलाओं के लिए मिसाल हैं जिन्हें लगता है सांवला रंग एक रोड़ा है

प्रज्ञा श्रीवास्तव
30th Aug 2017
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रेखा, नाम सुनते ही दृष्टिपटल पर सुनहरे सौंदर्य की देवी उभर जाती हैं। रेखा वो नाम जो अभिनय के हर आयामों में रची बसी है, अदाकारी की हर सूइयों से चलायमान है। सौंदर्य और प्रेम का साकार रूप हैं रेखा। उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में सांवले रंग, भारी बदन और हिन्दी बोलने में सहज न होने की वजह से दर्शकों से और फिल्म बिरादरी से काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, पर अपनी हार को जीत में बदलने के लिए रेखा ने अपना जज्बा कायम रखा।

फोटो साभार: मीराबाई फिल्म्स

फोटो साभार: मीराबाई फिल्म्स


रेखा ने जैसे समय को मात दे दी है, वो आज भी उतनी ही चपल और फुर्त हैं जैसे एक युवा रमणी होती है। 'निर्जरा', ये शब्द मानो रेखा के लिए पर्यायवाची शब्द बन गया है।

रेखा, नाम सुनते ही दृष्टिपटल पर सुनहरे सौंदर्य की देवी उभर जाती हैं। रेखा वो नाम जो अभिनय के हर आयामों में रची बसी है, अदाकारी की हर सूइयों से चलायमान है। सौंदर्य और प्रेम का साकार रूप हैं रेखा। रेखा के नाम से मशहूर हिंदी सिनेमा की सदाबहार अदाकारा भानुरेखा गणेशन की खूबसूरती और बेजोड़ अदाकारी आज भी बरकरार है। 

सदाबहार अभिनेत्री रेखा हिन्दी फिल्म जगत की शान हैं। उनके चेहरे की चमक आज भी अन्य अभिनेत्रियों की शान को फीका कर देती है। अपने हिस्से आए हर किरदार को दमदार बनाने वाली रेखा के आंचल में कई बड़े पुरस्कार आए। वो राजकीय पुरस्कार पद्मश्री से भी सम्मानित हैं। रहस्यमयी रेखा जैसी खूबसूरती पाना आज भी कई अभिनेत्रियों की हसरत है।

फोटो साभार: ट्विटर

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स्वप्निल भविष्य की ओर

चेन्नई में तमिल अभिनेता जेमिनी गणेशन और तमिल अभिनेत्री पुष्पावली के घर 11 अक्टूबर, 1954 को जन्मीं रेखा गणेशन को बचपन से ही अभिनय का शौक था, जिसे उन्होंने बड़ी कठिनाइयां झेलकर पूरा किया। कहते हैं, मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। रेखा के लिए भी अभिनय की मंजिल इतनी आसान नहीं रही। वह पहली बार बड़े पर्दे पर 1966 में आई फिल्म रंगुला रत्नम में बाल कलाकार के तौर पर आईं, लेकिन एक सफल अभिनेत्री बनने का सफर और मुश्किलें बाकी थीं।

रेखा को शुरुआत में सांवले रंग, भारी बदन और हिन्दी बोलने में सहज न होने की वजह से दर्शकों से और फिल्म बिरादरी से काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, पर अपनी हार को जीत में बदलने के लिए रेखा ने अपना जज्बा कायम रखा। उन्होंने अपनी काया ही पलट कर दी। कुछ दक्षिण भारतीय फिल्में करने के बाद रेखा ने बंबई की ओर रुख किया और हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया। उन्होंने 1970 में आई फिल्म सावन भादो के साथ आगाज किया और रातों रात मशहूर हो गईं।

फिल्मों से पहचान बनाने वाली रेखा ने स्वयं को फिल्मों की पहचान बनाया। वह एक ऐसी अभिनेत्री बनकर उभरीं, जिन्होंने हर किस्म के महिला किरदारों को सशक्त बनाया। रेखा ने कला और व्यावसायिक दोनों ही तरह की फिल्मों में शोहरत पाई है। उनके अभिनय में नएपन और विविधता ने बहुत जल्द उन्हें हिन्दी सिने जगत की सबसे कामयाब अभिनेत्रियों में मुकाम दिया।

क्योंकि प्रेम ही जीवन है

एक इंटरव्‍यू में उनकी खूबसूरती के बारे में पूछे जाने पर रेखा ने कहा, 'ये सब प्‍यार की वज‍ह से है। मेरे माता-पिता ने एक दूसरे से बहुत प्‍यार किया। फिर मेरा जन्‍म हुआ, मैं उनके प्‍यार में बड़ी हुई। अब मैं महसूस करती हूं कि प्‍यार मेरे डीएनए में है।' रेखा मानती हैं कि प्‍यार में एक बच्‍चे सी मासूमियत होती है और सकारात्‍मकता आपकी पूरी जिंदगी को खूबसूरत बनाती है।

सितारे पहुंचे बुलंदियों पर

साल 1978 में प्रदर्शित फिल्म घर रेखा के सिने करियर के लिए अहम फिल्म साबित हुई। इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिए वह पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित की गई। साल 1980 में रिलीज फिल्म खूबसूरत रेखा की एक और सुपरहिट फिल्म रही। ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिये वह सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गई।

साल 1981 में रेखा की एक और महत्वपूर्ण फिल्म उमराव जान रिलीज हुई। फिल्म में उन्होंने उमराव जान का किरदार निभाया था। इस किरदार को रेखा ने इतनी संजीदगी से निभाया कि दर्शक आज भी उसे भूल नहीं पाए हैं। इस फिल्म के सदाबहार गीत आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। साल 1988 में प्रदर्शित फिल्म खून भरी मांग रेखा की सुपरहिट फिल्मों में शुमार की जाती है। राकेश रौशन के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिये रेखा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गईं।

नब्बे के दशक में रेखा ने फिल्मों में काम करना काफी हद तक कम कर दिया। साल 1996 में आई फिल्म खिलाड़ियों का खिलाड़ी में उन्होंने गैंगस्टर माया का किरदार निभाकर दर्शकों की वाहवाही लूटी। फिल्म में दमदार अभिनय के लिए वह सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित की गईं। 2010 में उन्हें देश के चौथे सबसे बडे नागरिक सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया गया। रेखा ने अपने चार दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 175 फिल्मों में अभिनय किया है।

रेखा ने जैसे समय को मात दे दी है, वो आज भी उतनी ही चपल और फुर्त हैं जैसे एक युवा रमणी होती है। 'निर्जरा', ये शब्द मानो रेखा के लिए पर्यायवाची शब्द बन गया है।

ये भी पढ़ें- श्रीदेवी जिनके लिए तालियां फिल्म शुरू होने से लेकर खत्म होने तक रूकने का नाम नहीं लेतीं थीं

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